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नई चिंता: ईरान में अस्थिरता भारत के लिए एक बहुआयामी चुनौती
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सार
- भारत के हितों की बात करें तो ईरान केवल एक भौगोलिक पड़ोसी या व्यापारिक साझीदार नहीं है, यह हमारे वेस्ट एशिया विजन की धुरी है।
- यदि ईरान जलता है तो उसकी तपिश भारत तक जरूर आएगी। भारत को न केवल अपने हितों की रक्षा करनी है, बल्कि इस क्षेत्र में स्थिरता के लिए एक उत्तरदायी वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभानी है।
ईरान में आर्थिक संकट
- फोटो : amarujala.com
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विस्तार
ईरान के 31 में से 27 प्रांतों में जनता सड़कों पर है। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके करीबियों के पलायन की योजना पर काम करने की खबरें हैं। सोशल मीडिया ईरान में एक बार फिर जनविद्रोह की खबरों से भरा पड़ा है। दरअसल, नववर्ष 2026 का सूर्य ईरान के लिए केवल एक नई सुबह लेकर नहीं आया है, बल्कि यह उस इस्लामिक सत्ता के अस्तित्व पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है, जो वर्ष 1979 की क्रांति के बाद से कायम है।
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भारत के हितों की बात करें तो ईरान केवल एक भौगोलिक पड़ोसी या व्यापारिक साझीदार नहीं है, यह हमारे वेस्ट एशिया विजन की धुरी है। चाबहार से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक ईरान की हर एक लहर का प्रभाव नई दिल्ली के गलियारों में महसूस किया जा रहा है। ईरान की ढहती मुद्रा और अमेरिका-इजरायल का बढ़ता सामरिक दबाव इस बात का संकेत है कि मध्य-पूर्व में सत्ता का संतुलन एक निर्णायक मोड़ पर है।
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ईरान में वर्तमान में जो विद्रोह हम देख रहे हैं, वह रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। इसकी जड़ें वर्ष 2022 के 'स्त्री, जीवन, स्वतंत्रता' आंदोलन में हैं, लेकिन इस साल का यह विद्रोह उससे कहीं अधिक व्यापक और घातक है। ईरान की अर्थव्यवस्था वर्तमान में फ्री-फॉल की स्थिति में है। इसी माह ईरानी रियाल का मूल्य गिरकर 1.47 मिलियन प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है।
बढ़ती महंगाई और उत्पन्न संकट
जब मुद्रा इतनी तेजी से गिरती है तो वह केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं रह जाती, बल्कि एक सामाजिक ज्वालामुखी बन जाती है। 60 प्रतिशत से अधिक की महंगाई ने ईरान के मध्यम वर्ग को खत्म कर दिया है। ईरानी जनता अब मानती है कि उनकी गरीबी का कारण केवल अमेरिकी प्रतिबंध नहीं, बल्कि शासन के भीतर व्याप्त भारी भ्रष्टाचार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का अर्थव्यवस्था पर एकाधिकार है।
गुरुवार को ईरान में इंटरनेट और संचार ब्लैकआउट शासन की कमजोरी का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब कोई सरकार सूचना के मार्ग बंद करती है तो वह डरी हुई होती है। कई अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्ट दावा कर रही हैं कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके करीबियों ने पलायन की योजना पर काम शुरू कर दिया है। खामेनेई की मास्को निकलने की खबरों ने जोर पकड़ा हुआ है।
शासन के भीतर यह भगदड़ इसलिए है, क्योंकि इस बार सुरक्षा बलों (बसीज और पुलिस) के भीतर से भी विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं।
ईरान संकट में अमेरिका और इजरायल की भूमिका
ईरान के इस संकट में बाहरी शक्तियों, विशेषकर अमेरिका और इजरायल की भूमिका ने आग में घी डालने का काम किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने वाशिंगटन की नीति को प्रतिबंधों से बदलकर सक्रिय हस्तक्षेप की ओर धकेल दिया है। फिर वेनेजुएला में अमेरिका द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने एक मिसाल पेश की है। ट्रंप ने तेहरान को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उन्होंने अपने नागरिकों पर बल प्रयोग किया तो अमेरिका उनके बचाव में आएगा। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में अमेरिकी बेड़े की बढ़ती मौजूदगी यह संकेत दे रही है कि अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों या नेतृत्व पर सीधे प्रहार के लिए लॉक्ड एंड लोडेड है।
ईरान में अस्थिरता भारत के लिए एक बहुआयामी चुनौती है। भारत की विदेश नीति हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता पर टिकी रही है, लेकिन नए साल का संकट भारत को एक पक्ष चुनने या अपनी रणनीति को पूरी तरह बदलने के लिए मजबूर कर सकता है। चाबहार बंदरगाह भारत की मध्य एशिया तक पहुंचने की एकमात्र उम्मीद है, जो पाकिस्तान को दरकिनार करती है।
भारत ने चाबहार में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है। यदि ईरान में गृहयुद्ध छिड़ता है या शासन पूरी तरह बदलता है तो इस परियोजना का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा।
इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, जो मुंबई से मॉस्को तक जाता है, ईरान के माध्यम से गुजरता है। इस मार्ग की सुरक्षा और सुचारुता भारत की व्यापारिक रणनीति के लिए अनिवार्य है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी से प्राप्त करता है।
दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट के संकरे मार्ग से गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो भारत में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। 120-150 डॉलर प्रति बैरल तेल का मतलब है, भारतीय राजकोषीय घाटे का अनियंत्रित होना और आम जनता पर महंगाई का बोझ होगा।
खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि ईरान में अस्थिरता पूरे क्षेत्र (खासकर इराक और लेबनान) में फैलती है तो भारत को इतिहास का सबसे बड़ा निकासी अभियान चलाना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इजरायल और ईरान, दोनों के साथ बेहतर संबंध बनाए रखे हैं, लेकिन अब भारत को अपनी बैलेंसिंग एक्ट को और अधिक धारदार बनाना होगा।
भारत को अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि यदि ईरान में शासन बदलता भी है तो वह भारत के हितों के प्रतिकूल न हो। भारत को अपनी छवि शासन के मित्र के बजाय ईरान के लोगों के मित्र के रूप में पेश करनी होगी, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी बदलाव में भारत प्रासंगिक बना रहे। भारत को इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर पर काम तेज करना होगा, ताकि ईरान पर हमारी निर्भरता कम हो सके।
ईरान का वर्तमान संकट केवल एक देश की समस्या नहीं है। यह 20वीं सदी के अंत में बनी इस्लामिक थियोक्रेसी और 21वीं सदी की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच का टकराव है। भारत के लिए यह समय बहुत सावधानी से चलने का है। भारत को अपनी नौसेना को अरब सागर में और अधिक सक्रिय करना होगा। अपने सामरिक पेट्रोलियम रिजर्व को भरना होगा और अपनी कूटनीति को प्रो-एक्टिव बनाना होगा।
यदि ईरान जलता है तो उसकी तपिश भारत तक जरूर आएगी। भारत को न केवल अपने हितों की रक्षा करनी है, बल्कि इस क्षेत्र में स्थिरता के लिए एक उत्तरदायी वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभानी है। ईरान का भविष्य अभी भी कोहरे में है, लेकिन भारत का स्पष्ट मार्ग राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए।
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