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Blog: वर्तमान का लुत्फ उठाएं; जो हमारे पास, वही हमारी सच्ची पूंजी
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सार
जीवन की संध्या में यह समझना बेहद जरूरी है कि आज का दिन भी उतना ही मूल्यवान है, जितना कल था। जो आज हमारे पास है, वही हमारी सच्ची पूंजी है। इसलिए, वर्तमान का पूरा आनंद उठाएं।
लंबी उम्र
- फोटो : Freepik.com
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विस्तार
उम्र के हर पड़ाव पर कुछ न कुछ छूटता ही जाता है। कुछ लोग छूट जाते हैं, कुछ सपने पीछे रह जाते हैं, कुछ मौके बिना दस्तक दिए निकल जाते हैं। कभी-कभी तो हम खुद का भी कोई पुराना, परिचित-सा हिस्सा खो देते हैं। जीवन में जो दरारें पड़ती हैं, वे खामोश होती हैं और उन्हीं दरारों से बहुत-सी कीमती चीजें फिसल जाती हैं। हम चाहें भी तो उन्हें वैसा का वैसा वापस नहीं पा सकते।
दुख स्वाभाविक है और जीवन किसी के लिए नहीं रुकता है। बुजुर्ग होने का सबसे गहरा सबक यही है कि दुख में रुके रहना भी एक विकल्प है, और आगे बढ़ जाना भी। यही परिपक्वता है। यही वह बिंदु है, जहां समझ उम्र से आगे निकल जाती है।
उम्र के साथ सामाजिक दायरा भी छोटा होने लगता है, मित्र कम हो सकते हैं या परिवार बिखर सकता है, लेकिन जो लोग अंत तक साथ रहते हैं, वही असली धन होते हैं। उनका स्नेह, उनकी उपस्थिति, उनका शांत साथ-यही जीवन को अर्थ देता है।
अतीत की यादें बेशक सुंदर होती हैं। वे हमें बताती हैं कि हमने जिया है, महसूस किया है, प्रेम किया है। पर यदि हम केवल उन्हीं में उलझे रहेंगे, तो वर्तमान चुपचाप हमारे हाथ से निकल जाएगा। जीवन की संध्या में यह समझना बेहद जरूरी है कि आज का दिन भी उतना ही मूल्यवान है, जितना कल था। इसलिए, जो आज हमारे पास है, वही हमारी सच्ची पूंजी है। उम्र बढ़ना केवल शरीर का धीमा होना नहीं है। यह भावनात्मक स्पष्टता का समय है, एक शांत बुद्धिमत्ता का दौर। यह वह उम्र है, जब हम जान जाते हैं कि हर खाली जगह को भरा नहीं जा सकता, लेकिन हर खालीपन के साथ जिया जा सकता है।
जीवन में खोने का दुख बना रहेगा, लेकिन जीने का साहस उससे बड़ा हो सकता है। जो नहीं है, उसकी कमी स्वीकार करना और जो है, उसकी कद्र करना, यही उम्र का सबसे सुंदर उपहार है। जब यह समझ भीतर उतर जाती है, तब जीवन की दरारें हमें तोड़ती नहीं, बल्कि वे हमें और अधिक मानवीय, संवेदनशील और भीतर से मजबूत बना देती हैं।
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दुख स्वाभाविक है और जीवन किसी के लिए नहीं रुकता है। बुजुर्ग होने का सबसे गहरा सबक यही है कि दुख में रुके रहना भी एक विकल्प है, और आगे बढ़ जाना भी। यही परिपक्वता है। यही वह बिंदु है, जहां समझ उम्र से आगे निकल जाती है।
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उम्र के साथ सामाजिक दायरा भी छोटा होने लगता है, मित्र कम हो सकते हैं या परिवार बिखर सकता है, लेकिन जो लोग अंत तक साथ रहते हैं, वही असली धन होते हैं। उनका स्नेह, उनकी उपस्थिति, उनका शांत साथ-यही जीवन को अर्थ देता है।
अतीत की यादें बेशक सुंदर होती हैं। वे हमें बताती हैं कि हमने जिया है, महसूस किया है, प्रेम किया है। पर यदि हम केवल उन्हीं में उलझे रहेंगे, तो वर्तमान चुपचाप हमारे हाथ से निकल जाएगा। जीवन की संध्या में यह समझना बेहद जरूरी है कि आज का दिन भी उतना ही मूल्यवान है, जितना कल था। इसलिए, जो आज हमारे पास है, वही हमारी सच्ची पूंजी है। उम्र बढ़ना केवल शरीर का धीमा होना नहीं है। यह भावनात्मक स्पष्टता का समय है, एक शांत बुद्धिमत्ता का दौर। यह वह उम्र है, जब हम जान जाते हैं कि हर खाली जगह को भरा नहीं जा सकता, लेकिन हर खालीपन के साथ जिया जा सकता है।
जीवन में खोने का दुख बना रहेगा, लेकिन जीने का साहस उससे बड़ा हो सकता है। जो नहीं है, उसकी कमी स्वीकार करना और जो है, उसकी कद्र करना, यही उम्र का सबसे सुंदर उपहार है। जब यह समझ भीतर उतर जाती है, तब जीवन की दरारें हमें तोड़ती नहीं, बल्कि वे हमें और अधिक मानवीय, संवेदनशील और भीतर से मजबूत बना देती हैं।