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सोमनाथ और इतिहास: हिन्दू समाज के दीर्घकालीन संघर्ष का प्रतिबिम्ब है सोमनाथ
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सार
एक ही मंदिर को बार-बार तोड़ आस्था पर कुठाराघात करने का सबसे बड़ा उदाहरण सोमनाथ का शिव मंदिर है। सोमनाथ मंदिर के साथ हुई यह बर्बरता कोई कपोल कल्पना नहीं है अपितु ऐतिहासिक तथ्य है जिसे जानना आवश्यक है।
सोमनाथ का यह नगर प्रथम शताब्दी ईस्वी से बसाहट का केंद्र था।
- फोटो : ANI
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विस्तार
नववर्ष 2026 के आगमन के साथ ही भारत के गुजरात राज्य में स्थित सोमनाथ मंदिर सम्पूर्ण राष्ट्र के आकर्षण का केंद्र बन गया है। वैसे तो बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वपथम स्थान सोमनाथ का ही है परन्तु इस समय इसकी महत्वता सांस्कृतिक संघर्ष से जुड़ी है। भारतीय इतिहास में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़े जाने का विषय कोई आश्चर्यजनक यही है परन्तु एक ही मंदिर को बार-बार तोड़ आस्था पर कुठाराघात करने का सबसे बड़ा उदाहरण सोमनाथ का शिव मंदिर है। सोमनाथ मंदिर के साथ हुई यह बर्बरता कोई कपोल कल्पना नहीं है अपितु ऐतिहासिक तथ्य है जिसे जानना आवश्यक है।
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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग व अन्य संस्थाओं द्वारा किए गए पुरातत्विक अध्ययनों से यह ज्ञात होता है की सोमनाथ का यह नगर प्रथम शताब्दी ईस्वी से बसाहट का केंद्र था। इसी स्थान पर शिव की आराधना के लिए मंदिर का निर्माण चौथी शताब्दी ईस्वी के पूर्व वलभी शासकों द्वारा करवाया गया था। कालांतर में हिन्दू शासकों व आम जनता के द्वारा इस मंदिर को भव्यता प्रदान की गई। इसी भव्यता व हिन्दू समाज की अटूट आस्था ने 11वीं शताब्दी ईस्वी में भारत पर कुदृष्टि रखने वालों को आकृष्ट किया, इन्हीं में सर्वप्रमुख था गजनी का सुल्तान महमूद।
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दस्तावेजों में उल्लेख है की महमूद को सोमनाथ बुलाने के लिए सन्देश एक स्थानीय फ़क़ीर ने दिया था। गजनी से चला महमूद 42 दिनों की यात्रा कर जनवरी 1026 में सोमनाथ आ पहुंचा। मंदिर को तोड़ने के पूर्व स्थानीय समाज ने उसका अपनी क्षमता अनुसार प्रतिरोध किया, इस संघर्ष में पचास हजार से अधिक हिन्दुओं का बलिदान हुआ। गजनी के द्वारा सोमनाथ मंदिर को तोड़े जाने का विवरण केवल भारतीयों ने ही नहीं अपितु मुस्लिम लेखकों ने भी किया है।
मुस्लिम यात्री अल बरुनी के अनुसार "महमूद के आदेश पर सोमनाथ के शिवलिंग को तोड़ दिया गया, शिवलिंग के एक भाग को गजनी भेजने का आदेश दिया गया जहां उसे एक मस्जिद के प्रवेश द्वार पर लगाया गया जिससे नित्य उसे पैरों तले रौंदा जा सके।"
इस बर्बरता का उल्लेख फरिश्ता नामक एक ने यात्री ने भी किया, उसने लिखा "सोमनाथ मंदिर में प्रवेश लेने पर जब महमूद ने विशाल शिवलिंग को देखा तो उसे तोड़ने का आदेश दिया, उसकी सेना ने शिवलिंग को तोड़ा व उसके आदेश पर शिवलिंग के कुछ टुकड़े गजनी व कुछ टुकड़े मक्का मदीना भेजे गए।" आस्था पर चोट करने के साथ ही मंदिर व नगर की अकूत सम्पदा को भी लूट लिया गया। कहा जाता है की 200 लाख दीनार जितनी धनराशी महमूद द्वारा लूटी गई। आश्चर्य का विषय यह है की मुस्लिम यात्रियों के लिखे जाने के बावजूद भी भारतीय इतिहासकार रोमिला थापर ने यह कह दिया की सोमनाथ के मंदिर को महमूद ने कभी तोड़ा ही नहीं।
खैर मंदिर तोड़कर लौट रहे महमूद पर परमदेव नामक हिन्दू राजा ने हमला बोल दिया। युद्ध से बचकर निकलते हुए महमूद सिंध होता हुआ गजनी लौट गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार महमूद के जाने के बाद उसके स्थानीय गवर्नर मीठा खान ने बचे हुए मंदिर को पूर्ण रूप से ज़मीदोज़ कर दिया। परन्तु हिन्दू राजाओं का संघर्ष जारी रहा, कुछ ही समय बाद ग्यारहवीं शताब्दी में भीमदेव नामक शासक ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। 1100 ईस्वी के अभिलेख के अनुसार सिद्धराज नामक एक राजा ने सोमनाथ के दर्शन किये थे, इससे यह स्पष्ट होता है की इस काल में मंदिर अपने वैभव के साथ विद्यमान था। परन्तु मंदिर अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहा। सन 1292 में एक बार पुनः मंदिर पर आक्रमण हुआ। इस बार खिलजियों के एक सेनानायक अल्फ खान ने सोमनाथ की अस्मिता को अपनी बर्बरता से रौंदा। परन्तु कुछ ही समय बाद पुनः मंदिर का निर्माण करवाया गया, इस बार खंगार नामक हिन्दू राजा ने यह पुनीत कार्य करवाया। विध्वंस और निर्माण का यहाँ सिलसिला चलता रहा और 1392 ईस्वी में मुजफ्फर खान नामक सेनानायक ने मंदिर का पुनः विध्वंस किया।
सोमनाथ मंदिर के साथ यह बर्बरता मुगल काल में भी जारी रही। औरंगजेब ने भी सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने का फरमान जारी किया था। धर्म व संस्कृति के साथ होने वाली यह बर्बरता अंततः समाप्त हुई होलकर रानी अहिल्याबाई के काल में। सदियों से चले आ रहे विध्वंस पर अहिल्याबाई ने मरहम लगाया और 18 वीं शताब्दी में सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण करवाया गया। पुनर्निर्माण का यह काल जारी रहा और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सम्पूर्ण भारतीय समाज द्वारा मिलकर सोमनाथ मंदिर को भव्यता प्रदान की गई।
सन् 2026 इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सोमनाथ मंदिर ने बर्बरता से लड़ते हुए 1000 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। अटूट आस्था का प्रतीक सोमनाथ का यह मंदिर 1000 वर्षों से अनेकों आक्रमण झेलता हुआ भी आज अडिग खड़ा है, यह हिन्दू संस्कृति की निरंतरता का परिचायक है। जिस गजनी के सुल्तान ने सोमनाथ का पहली बार विध्वंस किया था उसका किला व नगर आज खंडहर स्वरुप है वहीँ समोनाथ भव्यता के साथ विद्यमान है।