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जीवन धारा: सत्य तो हमारे भीतर ही छिपा है, अपने मन पर विजय पाना ही सार्थक सूत्र

Thu, 20 Aug 2026 09:30 AM IST
ज्योति भास्कर पॉल ब्रंटन (ब्रिटिश दार्शनिक)
पॉल ब्रंटन (ब्रिटिश दार्शनिक) Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 20 Aug 2026 09:30 AM IST
सार

जिस सत्य व शांति की खोज हम बाहरी दुनिया में करते हैं, उसका एक सूक्ष्म संकेत हमारे अस्तित्व की गहराई में मौन उपस्थिति के रूप में हमेशा मौजूद रहता है। बस उसे खोजने की जरूरत है।

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Jeevan Dhara truth lies hidden within us  conquer your mind
सत्य तो हमारे भीतर ही छिपा है - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मैंने दुनिया के तमाम मुल्कों की यात्रा की। महानगरों की भीड़ देखी, प्राचीन मंदिरों की निस्तब्धता में समय बिताया, रेगिस्तानों के सन्नाटे से लेकर पर्वतों की ऊंचाइयों तक का अनुभव किया। विद्वानों से प्रश्न किए, साधुओं के चरणों में बैठा और रहस्यवादियों की शिक्षाओं को सुना। इन सभी के पीछे सवाल सिर्फ एक ही था-सत्य कहां है?

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मनुष्य की सबसे पुरानी और सबसे गहरी आकांक्षा सत्य की खोज ही रही है। वह जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी रूप में उसकी खोज करता रहता है। कोई उसे धर्म में खोजता है, कोई विज्ञान में, तो कोई प्रेम में, कोई सत्ता में और कोई ज्ञान में। मैं भी उसी खोज का एक यात्री था। लंबे समय तक मुझे लगता रहा कि सत्य कहीं बाहर छिपा है। मुझे लगता था कि कोई खास जगह होगी, कोई आश्रम, जहां पहुंचकर यह रहस्य खुल जाएगा। इसी विश्वास ने मुझे दूर-दूर तक भटकाया। लेकिन, धीरे-धीरे एक विचित्र तथ्य मेरे सामने प्रकट होने लगा। जिन व्यक्तियों में मैंने वास्तविक शांति देखी, वे किसी बाहरी उपलब्धि के कारण शांत नहीं थे। उनकी आंखों में जो स्थिरता थी, वह संसार से प्राप्त नहीं हुई थी। वे किसी वस्तु के मालिक होने के कारण संतुष्ट नहीं थे, बल्कि वे स्वयं के स्वामी होने के कारण संतुष्ट थे। अधिकांश लोग मानते हैं कि यदि पर्याप्त धन, सम्मान, ज्ञान या अनुभव मिल जाए, तो हमें वह सत्य मिल जाएगा, जिसकी हमें तलाश है।
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बाहरी संसार का स्वभाव परिवर्तनशील है। आज जो वस्तु हमें खुशी देती है, कल वही हमें उदासीन बना देती है। इच्छाएं और परिस्थितियां बदलती रहती हैं। यदि सत्य इन सब पर निर्भर होता, तो वह भी उतना ही अस्थिर होता, पर सत्य का स्वभाव अस्थिर नहीं हो सकता। यहीं से मेरी समझ में एक नया द्वार खुला। मैंने महसूस किया कि जिस सत्य व शांति की खोज मैं बाहरी दुनिया में कर रहा था, उसका एक सूक्ष्म संकेत मेरे भीतर शुरू से ही था। वह मेरे अस्तित्व की गहराई में स्थित एक मौन उपस्थिति थी। समस्या यह थी कि मेरा ध्यान हर दिशा में भटक रहा था, सिवाय उस दिशा के, जहां वह वास्तव में मौजूद था। मनुष्य की स्थिति कुछ ऐसी है, जैसे कोई व्यक्ति अपनी ही जेब में रखी चीज को पूरे घर में खोजता फिरे। फिर, अचानक उसे पता चलता है कि जो वह खोज रहा था, वह तो उसके पास ही थी।
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जब मैंने भारत के महान संतों से यह प्रश्न पूछा कि सत्य कहां है, तो उनके उत्तर अलग-अलग थे, लेकिन संकेत एक ही दिशा में था। भीतर की यात्रा साहस मांगती है। जो व्यक्ति इस साहसपूर्ण यात्रा को स्वीकार कर लेता है, वह धीरे-धीरे एक अद्भुत खोज करता है। वह पाता है कि उसके विचार बदलते रहते हैं, पर वह स्वयं विचार नहीं है। उसका शरीर समय के साथ बदलता है, पर उसकी चेतना का मूल केंद्र बना रहता है और उसी केंद्र में एक ऐसी शांति विद्यमान है, जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। यही वह बिंदु है, जहां सत्य की पहली झलक मिलती है।


अपने मन पर विजय पाएं
धन, सम्मान, ज्ञान और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, पर भीतर की चेतना में स्थित शांति स्थिर रहती है। जीवन का सार उपलब्धियों को पाने में नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और मन पर विजय पाने में है। जब हम दूसरों से तुलना करना, इच्छाओं के पीछे भागना और बाहरी संसार से संतोष की अपेक्षा करना छोड़ देते हैं, तभी भीतर की मौन उपस्थिति का अनुभव होता है।

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