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बुढ़िया के ताल में सदियों पुराने राज: इमारत पहली नजर में रहस्यमय लगती है, ASI को मिलीं बौद्ध और जैन मूर्तियां!

Thu, 20 Aug 2026 09:24 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 20 Aug 2026 09:24 AM IST
सार

आगरा-कानपुर हाईवे से कुछ दूर जंगल के बीच खड़ी यह इमारत पहली नजर में रहस्यमय लगती है। इसके भीतर सदियों का इतिहास दफन है। बुढ़िया का ताल लाल बलुआ पत्थरों और ईंटों से निर्मित एक विशाल वर्गाकार तालाब है। लेकिन, अब इसके आसपास बबूल का जंगल है। 

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Uttar Pradesh Centuries-old secrets at Budhiya Ka Taal ASI discovers Buddhist and Jain idols
सदियों पुराने राज समेटे है बुढ़िया का ताल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

राष्ट्रीय राजमार्ग पर आगरा से कानपुर के लिए सफर करते हुए जब आप फिरोजाबाद के पास पहुंचते हैं, तो इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं होता कि कुछ देर में ही आपके सामने सदियों के राज समेटे एक ऐसी इमारत होगी, जो अतीत के अनजाने दौर में पहुंचा देगी।

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कच्चे रास्ते पर गांव की पगडंडी से होकर ही मुगल स्थापत्य कला के इस बेमिसाल नमूने तक पहुंचा जा सकता है। हैरान करने वाला अनुभव होता है, जब धूल भरे रास्ते से गुजरकर आप खुद को पुल पर खड़ा पाते हैं। जैसे-जैसे इमारत नजदीक आने लगती है, आपका ध्यान सहसा पुल के दोनों तरफ मौजूद बबूल के जंगल पर जाता है और आप सोचते हैं कि यहां पुल क्यों है?
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इस सवाल का जवाब पाने के लिए 400 साल या इससे भी पुराने दौर में लौटना होगा। 11वीं, 12वीं शताब्दी में आगरा के आसपास का इलाका बौद्ध व जैन मंदिरों के लिए विख्यात था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने जब इस बोधि ताल या बुढ़िया के ताल का उत्खनन किया, तो यहां से बौद्ध और जैन मूर्तियां मिलीं।
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कुछ दूरी पर स्थित फतेहपुर सीकरी के छबीली टोला में हुए उत्खनन के दौरान भी जैन तीर्थंकरों और यक्षिणियों की प्रतिमाएं मिली थीं। बुढ़िया का ताल ईंटों और लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित एक विशाल वर्गाकार तालाब है। इसके बीचोंबीच 1592 ईस्वी में बनी दो मंजिला अष्टभुजाकार इमारत है, जिस पर गुंबद बना हुआ है।

दूसरी मंजिल पर सीढ़ियों से जा सकते हैं। इमारत पर खड़े होकर आप सोचेंगे कि नीचे जाने के लिए सीढ़ियां क्यों बनी हुई हैं? दरअसल, अब भले ही आसपास बबूल का जंगल है, पर ब्रिटिश काल के अद्भुत कलाकार सीताराम की पेंटिंग (1814) में यह तालाब पानी से लबालब भरा नजर आता है। ये सीढ़ियां घाट की हैं। इस स्थान को मुगल बादशाह अकबर के दरबारी एत्माद खान का बताया जाता है। तालाब से कुछ दूरी पर एत्माद खान का मकबरा भी है।


इतिहास के पन्ने पलटें, तो पाएंगे कि यह स्थान ज्ञान का केंद्र था। तभी इसे 11वीं सदी में बोधि ताल कहा गया। बाद में, इसका अपभ्रंश बुढ़िया का ताल हो गया। 1773 ईस्वी में पेशवा बाजीराव ने यहां अपना पड़ाव डाला था। 1857 की क्रांति के दौरान जोरावर सिंह ने यहां से आजादी की अलख जगाई थी। कभी यह जगह जितनी शानदार थी, आज उतनी ही खस्ताहाल दिखती है। फिलहाल, तो इसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे घने जंगल में जादू से किसी जिन ने इमारत बना दी हो...जो पलक झपकते गायब भी हो सकती है।

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