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जीवन धारा: जीवन का सबसे बड़ा युद्ध कौन-सा है, सूत्र- सपने देखो, आगे बढ़ो
नेपोलियन बोनापार्ट
Published by: Pavan
Updated Mon, 11 May 2026 08:33 AM IST
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सार
यदि कोई मुझसे पूछे कि जीवन का सबसे बड़ा युद्ध कौन-सा है, तो मैं कहूंगा- वह युद्ध जो मनुष्य अपने भीतर लड़ता है। अपने अहंकार से युद्ध। यदि मैं अपने भीतर की अधीरता को जीत पाता, तो मेरा जीवन अलग ही होता।
जीवन का सबसे बड़ा युद्ध कौन-सा है
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मैंने अपने जीवन में कई युद्ध जीते। राजाओं को झुकते देखा, साम्राज्यों को मिटते देखा और अपनी सेना को यूरोप की धरती पर विजयी कदमों से चलते देखा। एक समय ऐसा था, जब लोग मुझे अपराजेय कहते थे। मुझे खुद भी लगने लगा था कि मेरी इच्छा ही इतिहास की दिशा बदल सकती है। लेकिन आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि खुद पर होती है।
मैं शुरू से बेहद महत्वाकांक्षी था। महत्वाकांक्षा की ये आग मुझे चैन से बैठने नहीं देती थी। मेरे भीतर ऊपर उठने की एक बेचैनी थी। मैं निर्धन द्वीप कोर्सिका से आया था। मेरे पास कोई विरासत नहीं थी। अगर पास कुछ था, तो केवल मेरा यह विश्वास कि मनुष्य अपनी इच्छा से अपनी नियति बदल सकता है। और फिर मैंने इसी को अपना धर्म बना लिया। युद्धभूमियों पर मैंने जाना कि भय मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। उस समय मुझे सचमुच लगता था कि इच्छाशक्ति से सब कुछ जीता जा सकता है। और शायद उसी विश्वास ने मुझे ऊंचाइयों तक पहुंचाया। लेकिन ऊंचाइयां मनुष्य को एक भ्रम भी देती हैं।
लगातार विजय मिलने लगे, तो मनुष्य यह भूलने लगता है कि वह भी सीमित है। मैंने भी यही भूल की। मुझे लगने लगा था कि मैं समय और प्रकृति से भी बड़ा हो गया हूं। यही महत्वाकांक्षा का सबसे खतरनाक क्षण होता है, जब वह प्रेरणा से अहंकार में बदल जाती है। मैंने साम्राज्य जीते, लेकिन उस समय मैं स्वयं को नहीं जीत पाया था। संसार पर अधिकार करना आसान है, लेकिन अपनी इच्छाओं पर अधिकार करना बेहद मुश्किल है। एक राजा हजारों सैनिकों को आदेश दे सकता है, परंतु अपने भीतर उठती लालसाओं को काबू करना उससे कहीं ज्यादा कठिन है। प्रकृति ने मुझे बता दिया कि मनुष्य चाहे कितना भी महान क्यों न हो, वह अजेय नहीं है। मैंने अपने सैनिकों को भूख से मरते देखा। उस समय मैंने जाना कि महत्वाकांक्षा यदि विवेक से न जुड़ी हो, तो वह हजारों लोगों के दुख का कारण बन सकती है। उस हार ने मुझे भीतर से बदल दिया था। पराजय केवल सिंहासन ही नहीं छीनती, वह मनुष्य से उसका भ्रम भी छीन लेती है।
यदि कोई मुझसे पूछे कि जीवन का सबसे बड़ा युद्ध कौन-सा है, तो मैं कहूंगा- वह युद्ध जो मनुष्य अपने भीतर लड़ता है। अपने भय से युद्ध, अपने अहंकार से युद्ध। मैंने अनेक देशों को जीता, लेकिन यदि मैं अपने भीतर की अधीरता और अतृप्त महत्वाकांक्षा को जीत पाता, तो मेरा जीवन अलग ही होता। फिर भी मैं महत्वाकांक्षा को दोष नहीं दूंगा। महत्वाकांक्षा मनुष्य की ऊर्जा है। उसी से सभ्यताएं बनती हैं, नए विचार जन्म लेते हैं, साधारण मनुष्य असाधारण बनते हैं। अंततः मैंने समझा कि सबसे बड़ी अमरता मनुष्य के कर्मों और विचारों में होती है, साम्राज्यों में नहीं। साम्राज्य टूट जाते हैं। सेनाएं बिखर जाती हैं। विजय के जयघोष मौन हो जाते हैं। लेकिन जो मनुष्य अपने भीतर की सीमाओं को जीत लेता है, उसकी विजय समय भी नहीं मिटा सकता।
सूत्र - सपने देखो, आगे बढ़ो
महत्वाकांक्षा मनुष्य को ऊंचाइयों तक ले जाती है, लेकिन सच्ची विजय तब मिलती है,जब वह अपने भय, अहंकार और असंतुष्ट इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीख ले। स्वयं को जीतना सबसे कठिन और महान युद्ध है। शक्ति, साम्राज्य और प्रसिद्धि क्षणिक हैं, जबकि चरित्र, विवेक और आत्मसंयम ही मनुष्य को अमर बनाते हैं। इसलिए सपने देखो, आगे बढ़ो।
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मैं शुरू से बेहद महत्वाकांक्षी था। महत्वाकांक्षा की ये आग मुझे चैन से बैठने नहीं देती थी। मेरे भीतर ऊपर उठने की एक बेचैनी थी। मैं निर्धन द्वीप कोर्सिका से आया था। मेरे पास कोई विरासत नहीं थी। अगर पास कुछ था, तो केवल मेरा यह विश्वास कि मनुष्य अपनी इच्छा से अपनी नियति बदल सकता है। और फिर मैंने इसी को अपना धर्म बना लिया। युद्धभूमियों पर मैंने जाना कि भय मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। उस समय मुझे सचमुच लगता था कि इच्छाशक्ति से सब कुछ जीता जा सकता है। और शायद उसी विश्वास ने मुझे ऊंचाइयों तक पहुंचाया। लेकिन ऊंचाइयां मनुष्य को एक भ्रम भी देती हैं।
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लगातार विजय मिलने लगे, तो मनुष्य यह भूलने लगता है कि वह भी सीमित है। मैंने भी यही भूल की। मुझे लगने लगा था कि मैं समय और प्रकृति से भी बड़ा हो गया हूं। यही महत्वाकांक्षा का सबसे खतरनाक क्षण होता है, जब वह प्रेरणा से अहंकार में बदल जाती है। मैंने साम्राज्य जीते, लेकिन उस समय मैं स्वयं को नहीं जीत पाया था। संसार पर अधिकार करना आसान है, लेकिन अपनी इच्छाओं पर अधिकार करना बेहद मुश्किल है। एक राजा हजारों सैनिकों को आदेश दे सकता है, परंतु अपने भीतर उठती लालसाओं को काबू करना उससे कहीं ज्यादा कठिन है। प्रकृति ने मुझे बता दिया कि मनुष्य चाहे कितना भी महान क्यों न हो, वह अजेय नहीं है। मैंने अपने सैनिकों को भूख से मरते देखा। उस समय मैंने जाना कि महत्वाकांक्षा यदि विवेक से न जुड़ी हो, तो वह हजारों लोगों के दुख का कारण बन सकती है। उस हार ने मुझे भीतर से बदल दिया था। पराजय केवल सिंहासन ही नहीं छीनती, वह मनुष्य से उसका भ्रम भी छीन लेती है।
यदि कोई मुझसे पूछे कि जीवन का सबसे बड़ा युद्ध कौन-सा है, तो मैं कहूंगा- वह युद्ध जो मनुष्य अपने भीतर लड़ता है। अपने भय से युद्ध, अपने अहंकार से युद्ध। मैंने अनेक देशों को जीता, लेकिन यदि मैं अपने भीतर की अधीरता और अतृप्त महत्वाकांक्षा को जीत पाता, तो मेरा जीवन अलग ही होता। फिर भी मैं महत्वाकांक्षा को दोष नहीं दूंगा। महत्वाकांक्षा मनुष्य की ऊर्जा है। उसी से सभ्यताएं बनती हैं, नए विचार जन्म लेते हैं, साधारण मनुष्य असाधारण बनते हैं। अंततः मैंने समझा कि सबसे बड़ी अमरता मनुष्य के कर्मों और विचारों में होती है, साम्राज्यों में नहीं। साम्राज्य टूट जाते हैं। सेनाएं बिखर जाती हैं। विजय के जयघोष मौन हो जाते हैं। लेकिन जो मनुष्य अपने भीतर की सीमाओं को जीत लेता है, उसकी विजय समय भी नहीं मिटा सकता।
सूत्र - सपने देखो, आगे बढ़ो
महत्वाकांक्षा मनुष्य को ऊंचाइयों तक ले जाती है, लेकिन सच्ची विजय तब मिलती है,जब वह अपने भय, अहंकार और असंतुष्ट इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीख ले। स्वयं को जीतना सबसे कठिन और महान युद्ध है। शक्ति, साम्राज्य और प्रसिद्धि क्षणिक हैं, जबकि चरित्र, विवेक और आत्मसंयम ही मनुष्य को अमर बनाते हैं। इसलिए सपने देखो, आगे बढ़ो।