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कहां जा रहे हम: कानपुर से कुरुक्षेत्र तक पिता द्वारा बच्चों की हत्याओं से कांप रही रूह, सो रहा समाज
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सार
दंड और न्याय व्यवस्था में सिर्फ सजा का ही प्रावधान नहीं होता, बल्कि ऐसे घृणित अपराध हो ही नहीं, ऐसे इंतजाम करना भी जरूरी होता है। पंचायतों और चौपालों की व्यवस्थाओं को और मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि लोग वहां आकर अपनी समस्याएं साझा कर परामर्श पा सकें।
कानपुर-कुरुक्षेत्र में हत्या के मामलों ने चौंकाया
- फोटो : stock.adobe
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विस्तार
वैसे तो हर दिन देश में विचलित करने वाली कई घटनाएं होती हैं, लेकिन यूपी के कानपुर में 11 साल की जुड़वां बेटियों की पिता द्वारा हत्या और हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दुर्लभ बीमारी की शिकार तीन साल की मासूम बेटी की हत्या के बाद दंपती द्वारा खुदकुशी की घटना ने झकझोर दिया है। हम विकसित भारत और विश्व गुरु बनने की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन भीतर से हमारा तथाकथित सभ्य समाज कैसी घृणित वारदातों को अंजाम दे रहा है।
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उक्त दोनों वारदातों के बाद देश के सामाजिक तथा पारिवारिक तानेबाने के ढहने के खतरे और संवेदनशीलता खत्म होने का संकेत मिल रहा है।
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि इस सब के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या समाज और सरकारें, मोहल्ला कमेटियां तथा अन्य धार्मिक और सामाजिक संगठन इस ओर मुंह मोड़ कर बैठे रहेंगे? या आम लोगों की जिंदगी की परेशानियों का समाधान निकालने के उपाय खोजेंगे? दंड और न्याय व्यवस्था में सिर्फ सजा का ही प्रावधान नहीं होता, बल्कि ऐसे घृणित अपराध हो ही नहीं, ऐसे इंतजाम करना भी जरूरी होता है।
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पंचायतों और चौपालों की व्यवस्थाओं को और मजबूत बनाने की जरूरत है, ताकि लोग वहां आकर अपनी समस्याएं साझा कर परामर्श पा सकें। सुलह और समझाइश की व्यवस्था भी पूरी तरह गोपनीय होने के साथ ही अत्यंत विश्वसनीय होना चाहिए।
पिता ने नींद में रेता रिद्धि-सिद्धि का गला
कानपुर के किदवई नगर में 18 अप्रैल शनिवार देर रात की घटना जघन्य और वीभत्स है। मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव पिता शशिरंजन मिश्रा ने अपनी दो जुड़वां बेटियों रिद्धि और सिद्धि को नींद में चाकू से गला रेत कर मार डाला। पिता शशिरंजन ने न केवल उनसे अगाध प्यार करने वाली मासूम बेटियों को मौत की नींद सुला दिया, बल्कि बच्चियों की मां रेशमा के कलेजे के भी मानो टुकड़े कर दिए। वह बेटियों को याद कर बिलख रही है। उसके आंसू नहीं सूख रहे हैं।
माना जा रहा है कि पति पत्नी के बीच रिश्तों में तनाव और शक ने बेटियों की जान ले ली। पूर्व में शशिरंजन पत्नी रेशमा की भी हत्या का प्रयास कर चुका था। इसके बाद से वह अपने 6 साल के बेटे गुन्नू के साथ अलग कमरे में और शशिरंजन बेटियों के साथ अलग कमरे में सोता था। शशिरंजन ने हत्या के बाद खुद तड़के 3 बजे पुलिस को सूचना देकर बुलाया।
पूछताछ में उसने यह भी कहा कि वह बेटियों की हत्या कर खुदकुशी करना चाहता था, लेकिन दोनों की जान लेने के बाद उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह शंकालु इतना था कि उसने पत्नी के बेडरूम को छोड़कर पूरे फ्लैट के अंदर सीसीटीवी कैमरे लगवा रखे थे। 12 साल पहले कानपुर के मैंस ब्यूटी पॉर्लर में मुलाकात के बाद पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी की रहने वाली रेशमा और शशिरंजन के बीच प्यार परवान चढ़ा और 2014 में उन्होंने प्रेम विवाह किया था।
बेटियों की हत्या और पति के जेल जाने के बाद अब पूरा परिवार बिखर गया है। रेशमा अब फिर बंगाल लौटने वाली है और मासूम गुन्नू यह खूनी खेल समझ पाने की स्थिति में नहीं है।
कुरुक्षेत्र में जन्मदिन पर दी बेटी को फांसी, दंपती ने भी दी जान
कानपुर की तरह ही हरियाणा के कुरुक्षेत्र के प्रेमनगर में 19 अप्रैल की रात को 3 साल की मासूम बेटी अद्विका को उसके जन्म दिन के मौके पर माता-पिता ने मार डाला। जतिंदर कुमार (30) और उनकी पत्नी मंजू उर्फ युक्ता (28) ने शनिवार रात पहले अद्विका को फंदे पर लटकाया और फिर दोनों ने भी फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली।
सोमवार 20 अप्रैल को अद्विका का जन्मदिन था। वह सेरेब्रल हाइपोक्सिया नामक जटिल बीमारी शिकार थी। इस बीमारी में बच्चे के मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इससे शारीरिक और मानसिक विकलांगता हो जाती है। मरीज को मिर्गी के दौरे पड़ते हैं। यह बीमारी लाइलाज मानी गई है। दंपती ने बेटी को मां की चुन्नी से तो खुद रस्सी से फांसी लगाई।
दंपती ने 18-20 पेज का सुसाइड नोट भी लिखा था। इसमें उन्होंने बेटी की बीमारी से परेशान होकर यह आत्मघाती कदम उठाने की बात लिखी है। ऐसी खुदकुशी को 'डाइडिक सुसाइड' कहा जाता है। ऐसी दशा में दुखी व्यक्ति अपने साथ के लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाता है या फिर हत्या करके खुद फांसी लगा लेता है।
थार से अद्विका का स्टीकर मत हटाना भाई.....
अद्विका के पिता जतिंदर कुमार ने अपने सुसाइड नोट में कनाड़ा में रह रहे छोटे भाई प्रतीक से आग्रह किया है कि एक महीने पहले खरीदी गई थार गाड़ी पर अद्विका का स्टीकर लगा हुआ है। उसे उसकी याद के तौर पर रख लेना। लैपटॉप से भी उसका फोटो मत हटाना। इन लाइनों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आत्मघाती कदम उठाते वक्त भी दंपती बेटी के विछोह से कितने दुखी और उसकी यादों को कितना संजोए हुए थे।
कब जागेंगे समाज, सरकार और रिश्तेदार
ये घटनाएं झकझोरने वाली और सोये समाज और परिजनों को जागने के लिए विवश करने वाली हैं। क्या इस आधुनिक और संचार क्रांति के युग में रिश्ते रोज-रोज तार-तार होते रहेंगे? कभी मां का तो कभी पिता और पत्नी का कत्ल होता रहेगा? और अब तो बच्चों के कत्ल होने लगे हैं। बच्चों के हत्यारे भी कोई और नहीं बल्कि पिता हैं?
निसंदेह ये घटनाएं देश के केंद्रीय सामाजिक कल्याण, महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ ही प्रदेश स्तर के इन विभागों के लिए चेतने और चौंकाने वाली हैं। यदि जल्द परिवारों में संवेदनशीलता बढ़ाने और रिश्तों में प्रगाढ़ता तथा विश्वास लाने के उपाय नहीं किए गए तो हम विकास के शीर्ष पर पहुंचकर भी मानव विकास सूचकांक में पिछड़ते चले जाएंगे।
बिखरते परिवार सबसे बड़ी वजह
समाजशास्त्रियों का कहना है कि पारिवारिक रिश्तों में तनाव तथा खुद की या बच्चों की बीमारी से दुखी होने जैसी समस्याएं सनातन हैं, लेकिन इनसे घबराकर या दुखी होकर आत्मघाती कदम उठाने की परंपरा नई है। इसे थामना होगा। टूटते रिश्तों को जोड़ना होगा और एक जाजम पर बैठकर शंकाओं, समस्याओं, का निवारण करने वाला तंत्र विकसित करना होगा। हमारी समाज व परिवार व्यवस्था विश्व में अदभुत थी, वह बीते कुछ दशकों से कमजोर हो गई है।
सोशल मीडिया में रिश्तों का दिखावा ज्यादा
दरअसल, मीडिया क्रांति ने सोशल मीडिया को बढ़ावा तो दिया, लेकिन इसमें व्यक्तिगत तौर पर रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। समाज और परिवारों में मिलनसारिता कम हो रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हालचाल जाने और समझे जा रहे हैं तथा दुख और खुशी का इजहार भी इन्हीं के जरिए हो रहा है। इससे व्यक्तिगत मिलन की व्यवस्था कमजोर और दुखदर्द व खुशी में साथ देने और रिश्ता निभाने की परंपरा कमजोर हो गई है।
यह पाश्चात्य सोच भारतीय समाज को खोखला कर रही है। हमने कई परिवारों में मनोरोगी, विकलांग, गंभीर बीमारियों से ग्रस्त बच्चों, बूढ़ों और युवाओं को देखा है और अब भी देख रहे हैं, लेकिन एकल परिवारों के चलते अब हर समस्या को निजी मानकर उससे जूझने का सिलसिला तेज हो गया है।
हम सूचनाओं को साझा तो करते हैं, लेकिन अपने या दूसरों के दुखदर्द को अपना समझ कर उन्हें हल करने में कंजूसी बरतने लगे हैं। संकट के समय साथ निभाने और खड़े रहकर हौसला और कंधा देने की हमारी सनातन परंपरा कमजोर हो रही है।
संघ का कुटुंब प्रबोधन है उपाय
देश के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 'आरएसएस' ने टूटते परिवारों और बिखरते समाज को पुन: संगठित करने के लिए कुटुंब प्रबोधन का अनूठा अभियान शुरू किया है। संघ के शताब्दी वर्ष में इसे नए सिरे से छेड़ा गया है। इसके तहत परिवार के लोग सप्ताह में कम से कम एक दिन एक घंटे एक साथ बैठें, साथ भोजन करें और इस दौरान टीवी और मोबाइल फोन बंद रखने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
इसके अलावा अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों के लिए सम्मेलन आयोजित जा रहे हैं। इनमें पारिवारिक मूल्यों और उनकी रक्षा की सीख दी जा रही है। संघ के लाखों स्वयंसेवक अपने परिवार और अपने आसपास के परिवारों तक पारिवारिक और सामाजिक विश्वास की बहाली में जुटे हैं। सभ्य, संस्कारित और संयुक्त परिवार ही भारत की पहचान हैं, इनकी पुनर्स्थापना नितांत जरूरी है, वरना आने वाली पीढ़ियां तबाह हो जाएंगी और सोशल मीडिया क्रांति के दौर में हमारा संगठित समाज जर्जर होकर बिखर जाएगा।
जरूरत पड़ने पर हमें सोशल मीडिया पर नकेल कसने में नहीं हिचकना होगा, क्योंकि अति सर्वत्र वर्जयेत। वैश्वीकरण के दौर में वही देश टिकेगा, जिसकी सामाजिक जड़ें मजबूत होंगी और परस्पर विश्वास कायम रहेगा।
हेल्पलाइन बन रही मददगार
बता दें, केंद्र सरकार ने खुदकुशी रोकने और आपात चिकित्सा सहायता के लिए जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 शुरू की है। इसके अलावा आप टेलिमानस हेल्पलाइन नंबर 1800914416 पर भी कॉल कर सकते हैं। यहां आपकी पहचान पूरी तरह से गोपनीय रखी जाती है और तत्काल मदद पहुंचाई जाती है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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