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जीवन धारा: हर इंसान की अपनी अलग दुनिया होती है

कार्ल जैस्पर्स Published by: Nirmal Kant Updated Thu, 23 Apr 2026 06:41 AM IST
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सार

लोग सुनना ही नहीं चाहते। वे अपने विचारों से इतने बंधे होते हैं कि तर्क, तथ्य और सच्चाई भी उन तक पहुंच नहीं पाती। उनके भीतर एक अजीब-सी दूरी होती है-एक ऐसा बचाव, जो उन्हें दूसरों के करीब आने ही नहीं देता।

jeevan dhara every person has unique world perspective life column
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

जब मैंने सच में सोचना शुरू किया, तब मैं स्वयं यह नहीं समझ पाया कि मेरे भीतर कौन-सी भावना अधिक प्रबल थी-ज्ञान पाने की गहरी प्यास या मनुष्यों से जुड़ने की तीव्र आकांक्षा। धीरे-धीरे मुझे यह अनुभव हुआ कि ज्ञान अपने आप में पूर्ण नहीं होता, उसका वास्तविक अर्थ तभी प्रकट होता है, जब वह मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ने का माध्यम बनता है। लेकिन किसी दूसरे मनुष्य के साथ सच्ची सहमति और समझ स्थापित करना बेहद कठिन कार्य है। जीवन के आरंभिक दिनों से ही मैं लोगों के बीच समझ की कमी देखकर आश्चर्यचकित और कभी-कभी निराश हो जाता था। अक्सर ऐसा लगता था, मानो लोग सुनना ही नहीं चाहते, वे अपने विचारों से इतने बंधे होते हैं कि तर्क, तथ्य और सच्चाई भी उन तक पहुंच नहीं पाती। उनके भीतर एक अजीब-सी दूरी होती है-एक ऐसा बचाव, जो उन्हें दूसरों के करीब आने नहीं देता।
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कभी-कभी लोग अपनी भावनाओं को बिना किसी गहराई के, बिना किसी सच्चे संबंध के, यों ही प्रकट कर देते हैं, मानो उनके सामने कोई है ही नहीं। यह खुलापन भी एक प्रकार की दूरी ही बन जाता है, क्योंकि उसमें आत्मा का वास्तविक स्पर्श नहीं होता। और जब कोई व्यक्ति आसानी से मेरी बात मान लेता था, तब भी मुझे संतोष नहीं मिलता था, क्योंकि वह सहमति सच्ची समझ से नहीं, बल्कि केवल मान लेने की प्रवृत्ति से उत्पन्न होती थी। वह दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि केवल एक सतही सहयोग भर होता था।
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मैंने सच्ची मित्रता के सुंदर क्षणों को भी जिया है, जहां अपनापन था, सहजता थी, और एक गहरा जुड़ाव था। लेकिन ऐसे क्षण स्थायी नहीं रहे। कई बार ऐसा भी लगा कि हर व्यक्ति अपनी अलग दुनिया में जी रहा है, जहां पहुंचना लगभग असंभव है। युवावस्था में यह अनुभव और गहरा होता गया कि अकेलापन केवल अकेले होने में नहीं, बल्कि लोगों के बीच रहते हुए भी हो सकता है। यह सबसे कठिन और पीड़ादायक अकेलापन होता है, जब चारों ओर लोग हों, पर भीतर से कोई जुड़ाव न हो। फिर भी, मेरे भीतर सबसे प्रबल इच्छा यही रही कि मैं दूसरों से जुड़ सकूं। मुझे लगा कि यदि जीवन भर की यह अधूरी यात्रा केवल एक भी व्यक्ति के साथ सच्चे रूप में पूरी हो जाए, तो वही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

सच्चे जुड़ाव की पहचान यही है कि हम हर व्यक्ति के प्रति खुले रहें, उससे जुड़ने के लिए तैयार रहें, और जब तक यह जुड़ाव न बन पाए, तो उसका दुख हमें भीतर तक महसूस हो। दूसरों से जुड़ना केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है। यह तो अपने वास्तविक स्वरूप को तथा अपनी सच्चाई को बिना किसी ढोंग के प्रस्तुत करने का एक निरंतर प्रयास है। ऐसा करते हुए ही हम सच्चे अर्थों में किसी दूसरे मनुष्य से जुड़ने के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।     
- क्वेश्चन ऑफ जर्मन गिल्ट के अनूदित अंश

सूत्र-  खुद को खुलकर प्रस्तुत करें
जब मनुष्य यह समझ लेता है कि ज्ञान का सच्चा मूल्य केवल जानकारी में नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने में है, और जब वह साहसपूर्वक अपनी सच्चाई को बिना किसी भय या दिखावे के दूसरों के सामने रखता है, तभी वह वास्तविक जुड़ाव का अनुभव करता है, जहां न अकेलापन बचता है, न दूरी, बल्कि एक गहरा मानवीय संबंध जन्म लेता है।
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