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मुड़-मुड़ के देख: हर ज्ञान पुस्तकालय में नहीं मिलता; बढ़ती उम्र केवल क्षय का नाम नहीं
वेंडेल बेरी
Published by: Pavan
Updated Fri, 22 May 2026 07:35 AM IST
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सार
जवान मन हमेशा दुनिया को जीतना चाहता है, पर वृद्ध मन समझता है कि दुनिया को जीतने से अधिक कठिन काम स्वयं को समझना है। वृद्धावस्था मनुष्य को धीमा अवश्य कर देती है, पर उसी धीमेपन में जीवन की सबसे गहरी समझ जन्म लेती है।
हर ज्ञान पुस्तकालय में नहीं मिलता
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बुजुर्ग होना धीरे-धीरे यह सिखाता है कि जीवन केवल जोड़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि टूटने और बिखरने की भी एक लंबी यात्रा है। बचपन में दुनिया एक संपूर्ण चित्र जैसी लगती है, रिश्ते सरल होते हैं, सपने साफ होते हैं, और समय इतना बड़ा लगता है, मानो कभी खत्म ही नहीं होगा। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मनुष्य समझने लगता है कि हर बीतता हुआ वर्ष अपने साथ कुछ न कुछ छीनकर ले जाता है। चेहरे की चमक धीमी पड़ने लगती है, शरीर की शक्ति कम होने लगती है, पुराने लोग एक-एक करके स्मृतियों में बदलने लगते हैं, और जीवन में लोगों की भीड़ के बीच भी एक अकेलापन जन्म लेने लगता है। फिर भी बढ़ती उम्र केवल क्षय का नाम नहीं है।
मनुष्य के संस्कार, उसका समाज और उसका अनुभव यदि सही दिशा में काम करे, तो वृद्धावस्था सुंदर बन जाती है, क्योंकि उम्र हमें वह दिखाती है, जो युवावस्था के शोर में दिखाई नहीं देता। जवान मन हमेशा दुनिया को जीतना चाहता है, लेकिन वृद्ध मन समझता है कि दुनिया को जीतने से अधिक कठिन काम स्वयं को समझना है। एक बुजुर्ग व्यक्ति की आंखों में वर्षों की यात्राएं होती हैं, उसके मौन में अनेक हानियां, क्षमाएं और स्वीकार छिपे होते हैं। वृद्धावस्था मनुष्य को धीमा अवश्य कर देता है, पर उसी धीमेपन में जीवन की सबसे गहरी समझ जन्म लेती है। तभी तो वृद्ध लोग छोटी-छोटी चीजों में भी अर्थ खोज लेते हैं।
अक्सर दुनिया यह भूल जाती है कि हर युवा चेहरा एक दिन वृद्ध जरूर होगा। जिस समाज में बुजुर्ग लोगों को बोझ समझा जाने लगे, वहां संवेदना धीरे-धीरे मरने लगती है, क्योंकि बुजुर्ग केवल उम्रदराज व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे समय के साक्षी होते हैं। बुजुर्गों ने जीवन को उसके सबसे कठिन रूपों में देखा होता है, इसलिए उनके पास ऐसे अनुभव और ज्ञान का भंडार होता है, जिन्हें किसी पुस्तकालय में जाकर हासिल नहीं किया जा सकता है। उम्र बढ़ने का सबसे सुंदर अर्थ यही है कि मनुष्य धीरे-धीरे समझ जाता है कि जीवन का सार प्रतियोगिता में नहीं, बल्कि संबंधों, स्मृतियों और प्रेम में छिपा है।
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मनुष्य के संस्कार, उसका समाज और उसका अनुभव यदि सही दिशा में काम करे, तो वृद्धावस्था सुंदर बन जाती है, क्योंकि उम्र हमें वह दिखाती है, जो युवावस्था के शोर में दिखाई नहीं देता। जवान मन हमेशा दुनिया को जीतना चाहता है, लेकिन वृद्ध मन समझता है कि दुनिया को जीतने से अधिक कठिन काम स्वयं को समझना है। एक बुजुर्ग व्यक्ति की आंखों में वर्षों की यात्राएं होती हैं, उसके मौन में अनेक हानियां, क्षमाएं और स्वीकार छिपे होते हैं। वृद्धावस्था मनुष्य को धीमा अवश्य कर देता है, पर उसी धीमेपन में जीवन की सबसे गहरी समझ जन्म लेती है। तभी तो वृद्ध लोग छोटी-छोटी चीजों में भी अर्थ खोज लेते हैं।
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अक्सर दुनिया यह भूल जाती है कि हर युवा चेहरा एक दिन वृद्ध जरूर होगा। जिस समाज में बुजुर्ग लोगों को बोझ समझा जाने लगे, वहां संवेदना धीरे-धीरे मरने लगती है, क्योंकि बुजुर्ग केवल उम्रदराज व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे समय के साक्षी होते हैं। बुजुर्गों ने जीवन को उसके सबसे कठिन रूपों में देखा होता है, इसलिए उनके पास ऐसे अनुभव और ज्ञान का भंडार होता है, जिन्हें किसी पुस्तकालय में जाकर हासिल नहीं किया जा सकता है। उम्र बढ़ने का सबसे सुंदर अर्थ यही है कि मनुष्य धीरे-धीरे समझ जाता है कि जीवन का सार प्रतियोगिता में नहीं, बल्कि संबंधों, स्मृतियों और प्रेम में छिपा है।