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जीवन का बदलाव भीतर से शुरू होता है: सकारात्मक चिंतन का अर्थ भागना नहीं, चुनौतियों के बीच उम्मीद बनाए रखना है
Wed, 24 Jun 2026 07:33 AM IST
Devesh Tripathi
नॉर्मन विन्सेंट पील
नॉर्मन विन्सेंट पील
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 24 Jun 2026 07:33 AM IST
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विस्तार
मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी शक्ति उसके भीतर चल रहे विचारों में होती है। ज्यादातर लोगों को लगता है कि उनका भविष्य परिस्थितियां तय करती हैं, पर मैंने अपने लंबे अनुभव में देखा है कि परिस्थितियों से भी ज्यादा ताकतवर वह मानसिक चित्र होता है, जिसे हम अपने भीतर संजो कर रखते हैं। आप अपने बारे में क्या सोचते हैं, यही सबसे महत्वपूर्ण है। मैं यह नहीं कह रहा कि केवल सकारात्मक सोच लेने भर से जीवन की समस्याएं खत्म हो जाएंगी। जीवन में संघर्ष आएंगे, निराशाएं भी पनपेंगी, असफलताओं का सामना भी करना पड़ेगा। लेकिन, यहां प्रश्न इस बात का नहीं है कि मुश्किलें आएंगी या नहीं, बल्कि यह है कि आप उनका सामना किस मानसिक स्थिति के साथ करेंगे। एक व्यक्ति किसी बाधा को देखकर कहता है-‘यह असंभव है।’ उसी बाधा को देखकर दूसरा कहता है-‘यह कठिन है, लेकिन कोई न कोई रास्ता जरूर निकल आएगा।’ दोनों की परिस्थितियां समान हो सकती हैं, पर उनके नतीजे निश्चित रूप से अलग होंगे। कारण यह है कि उनके विचार और सोचने का तरीका अलग है। याद रखें, मन में बार-बार दोहराया गया विचार चरित्र बन जाता है। चरित्र कर्मों को जन्म देता है और कर्म जीवन की दिशा तय करते हैं। मैंने ऐसे अनेक लोगों को देखा है, जो वर्षों तक भय के कारण अपनी क्षमताओं का उपयोग सिर्फ इसलिए नहीं कर पाए, क्योंकि उन्हें असफलता और आलोचना का डर था, वे भविष्य को लेकर भयभीत थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपने लिए सीमाएं बना लीं और फिर उन्हीं को वास्तविकता मान लिया। पर, मैंने यह भी देखा है कि जब ऐसे लोग अपने विचार बदलना शुरू कर देते हैं, तब उनका जीवन भी बदलने लगता है। मनुष्य का मन एक प्रकार की आंतरिक कार्यशाला है। वहां हमेशा कुछ न कुछ निर्मित हो रहा होता है। यदि वहां निराशा, भय और नकारात्मकता के भाव निर्मित होंगे, तो जीवन में वही दिखाई देंगे। अगर वहां आशा, साहस और विश्वास का निर्माण होगा, तो जीवन का स्वरूप भी उसी के अनुरूप बदलने लगेगा। इसलिए, अपने मन को सावधानी से प्रशिक्षित कीजिए। अपने विचारों को उद्देश्यहीनता में मत भटकने दीजिए। उन्हें उम्मीदों की किरण दिखाइए। रोजाना कुछ ऐसे विचारों को दोहराइए, जो आपको हर तरह से मजबूत बनाते हों। अपने आप से कहिए-मैं भय से बड़ा हूं, मैं असफलताओं से सीख सकता हूं, मेरे भीतर अब भी संभावनाएं हैं..।सकारात्मक चिंतन का अर्थ वास्तविकता से आंखें मूंद लेना कतई नहीं होता। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि समस्या को समस्या न माना जाए। इसका अर्थ है, समस्या को स्वीकार करते हुए भी आशा को न छोड़ना। जैसे किसी जहाज का कप्तान समुद्र के तूफान को रोक नहीं सकता, पर वह अपनी दिशा बनाए रख सकता है। ठीक उसी तरह आप जीवन की सभी परिस्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपनी मानसिक प्रतिक्रिया को अवश्य नियंत्रित कर सकते हैं।