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भोजशाला विवादः राम के बाद अब सरस्वती, मजहब नहीं सिखाता...
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सार
यह महज संयोग है कि मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला विवाद पर इंदौर हाईकोर्ट का फैसला जुमे को आया । अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े विवाद के बाद भोजशाला से लेकर काशी के ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि- शाही ईदगाह विवाद अदालतों तक पहुंच चुके हैं। भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट के ताजा फैसले पर अभी सुप्रीम कोर्ट में अपील की राह खुली है। इसी अंदेशे को देखते हुए हिंदू पक्ष ने कैविएट भी दाखिल कर दी है । उधर, काशी-मथुरा जैसे विवाद अदालतों में विचाराधीन हैं।
भोजशाला विवाद की पूरी कहानी
- फोटो : Amarujala.com
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विस्तार
9 नवंबर 2019 को जब राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था, तो एकाएक कई निर्मूल आशंकाएं बलवती हुईं। आशंकाओं को दरकिनार करते हुए धर्मनिरपेक्ष देश के नागरिकों (दोनों पक्षों) ने फैसले को सिर आंखों से लगाया और 6 दिसंबर 1992 (बाबरी विध्वंस) जैसे टकराव की नौबत नहीं आई। आपसी सौहार्द के बूते ही करीब पांच सौ साल बाद दिव्य राममंदिर का सपना साकार हो सका।
रामलला तिरपाल से अब भव्य मंदिर में दर्शन दे रहे हैं। राम मंदिर फैसले के साथ ही विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों ने उन्मादी नारा दिया था- यह तो अंगड़ाई (झांकी) है, काशी-मथुरा बाकी है। हालांकि राम मंदिर के बाद भोजशाला विवाद पर आए हाईकोर्ट के ताजा फैसले से फिर एक बार उन्माद की जगह सौहार्द और न्यायिक मार्ग के जरिये धर्म का रास्ता प्रशस्त हुआ है।
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हाईकोर्ट ने पुरातत्व सर्वे रिपोर्ट को आधार बनाकर भोजशाला को मंदिर घोषित कर दिया है और वहां तुष्टीकरण या आक्रोश को रोकने के लिए जो हर जुमे नमाज की व्यवस्था बनी थी, उस पर भी रोक लगा दी है ।
भाईचारे की मिसाल बनी भोजशाला
चार महीने पहले 23 जनवरी 2026 को सरस्वती पूजा और रमजान की नमाज एक साथ पड़ी। धार के भोजशाला में हिंदुओं का दावा है वाग्देवी सरस्वती मंदिर है और उन्हें वहां पूजा का अधिकार है। हिंदू वहां हर मंगलवार को सरस्वती की पूजा- अर्चना करते हैं और मुसलमान हर जुमे को नमाज अता करते रहे हैं। इस दौरान अक्सर वहां तनातनी बनी रहती है।
2016 के बाद दस साल बाद फिर जब सरस्वती पूजा और नमाज का मौका एक दिन आ गया तो देश की सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप कर अलग-अलग पूजा और नमाज की व्यवस्था करानी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप, प्रशासन और सरकार की सतर्कता और दोनों पक्षों के धर्मालंबियों की सूझ से दस साल के अंतराल में उनकी आस्था में कोई अड़चन नहीं आई। यह दोनों धर्मों के भाईचारे की मिसाल बनी।
न्यायिक रास्ते से इंसाफ
भोजशाला का यह विवाद भी सदियों पुराना है। हिंदुओं का दावा है कि 11 वीं सदी में धार भोजशाला में राजाभोज ने संस्कृत शिक्षा केंद्र की स्थापना की थी जिसे आक्रांताओं ने तोड़कर 1902 में मस्जिद का निर्माण कर लिया । 122 साल बाद यह विवाद 2024 में अदालत पहुंचा। पुरातत्व के सर्वे में संस्कृत अध्ययन केंद्र और मंदिर के साक्ष्य मिले जिसे आधार मानते हुए इंदौर हाईकोर्ट ने न केवल इसे मंदिर घोषित कर दिया बल्कि 2023 के उस फैसले पर भी रोक लगा दी कि वहां हर जुमे की नमाज होगी।
इंदौर हाईकोर्ट ने राम मंदिर फैसले को नजीर मानते हुए भोजशाला (धार) विवाद में भी मुस्लिम पक्ष के लिए इच्छा व उनकी मांग पर वैकल्पिक जमीन के लिए राज्य सरकार को गौर करने की व्यवस्था दी है । संदेश साफ है कि सभी को अपने-अपने धर्मों के लिए जो सांविधानिक व्यवस्था बनी हुई है, उसकी अनदेखी न हो।
हालांकि, मुस्लिम पक्ष के लिए हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपील का कानूनी दरवाजा अभी खुला है। न्यायिक लड़ाई पर किसी को एतराज भी नहीं होना चाहिए क्योंकि राम मंदिर से लेकर भोजशाला तक की लड़ाई में न्यायिक रास्ते से ही इंसाफ हुआ, वह भी बिना किसी टकराव के।
यूं भी धर्मस्थल, उपासना और इतिहास से जुड़े विवादित मामले देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के सामने फिर से एक बार भाईचारे की मिसाल पेश करने की जवाबदेही है। सियासी सौदागरों को वोट की रोटी सेंकने का मौका देने के बजाय यदि दोनों पक्ष आपसी रजामंदी से धर्म का रास्ता अख्तियार कर लें तो इससे बड़ी बात और हो ही नहीं सकती।
काशी-ज्ञानवापी व श्रीकृष्ण जन्मभूमि- शाही ईदगाह विवाद
अयोध्या राम मंदिर निर्माण और भोजशाला विवाद के ताजा फैसले के बाद अब काशी में ज्ञानवापी मस्जिद और श्रीकृष्ण जन्मभूमि में शाही ईदगाह से जुड़े विवाद में अदालत के फैसले की ओर दोनों पक्षों की निगाहें टिक गई हैं । ज्ञानवापी का विवाद भी सदियों पुराना है। हिंदू पक्ष का दावा है कि महादेव का मंदिर तोड़कर आक्रांताओं ने मस्जिद बना ली।
2021 में पांच महिलाओं ने श्रृंगार गौरी पूजा के लिए अदालत का रूख किया। सुप्रीम कोर्ट ने सीलबंद सर्वे के आधार पर नोटिस जारी किया। यह विवाद अभी अदालत में विचाराधीन है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि केशव कटरा से सटे शाही ईदगाह का विवाद भी अदालत में विचाराधीन है।
काशी और मथुरा विवाद में भी फैसले के बाद दोनों पक्षों के लिए सर्वोच्च अदालत का रास्ता बचा रहेगा लेकिन धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के नाम पर आपसी कटुता कतई बर्दाश्त लायक नहीं । ऐसे में अदालत के फैसलों को दोनों पक्ष सहमति से मानकर एक-दूसरे की आस्था का सम्मान करें तो इससे अच्छी मिसाल कुछ हो भी नहीं सकती। यूं भी मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
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