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जीवन धारा: अस्तित्व भी एक रहस्य ही है, क्या विज्ञान हर प्रश्न का उत्तर दे सकता है?
वर्नर हाइजेनबर्ग
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 15 Jun 2026 06:58 AM IST
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जीवन धारा
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विस्तार
जब कोई युवा मन पहली बार विज्ञान के संसार में प्रवेश करता है, तो उसे लगता है कि उसने प्रकृति के रहस्यों की चाबी पा ली है। वह देखता है कि बिजली आकाशीय देवताओं का क्रोध नहीं, बल्कि विद्युत आवेशों का नतीजा है। ग्रहों की गति किसी अदृश्य शक्ति की मनमानी से नहीं, बल्कि गणितीय नियमों से संचालित होती है। जीवन की अनेक प्रक्रियाएं रसायन और जीव विज्ञान के सिद्धांतों से समझी जा सकती हैं। इस पहले अनुभव में विज्ञान मनुष्य को एक अद्भुत आत्मविश्वास देता है। उसे लगता है कि जिन प्रश्नों के उत्तर पहले धर्म, मिथक या दर्शन में खोजे जाते थे, वे अब प्रयोगशालाओं और समीकरणों में मिल सकते हैं। और यहीं एक सूक्ष्म खतरा भी उपस्थित होता है।विज्ञान का पहला घूंट अक्सर मनुष्य को यह भ्रम दे देता है कि वास्तविकता पूरी तरह समझी जा सकती है। जैसे कि जो कुछ है, वह केवल पदार्थ है, ब्रह्मांड एक विशाल मशीन मात्र है, और रहस्य नाम की कोई चीज नहीं बची। इस अवस्था में ईश्वर, आत्मा, या आध्यात्मिकता जैसी अवधारणाएं उसे फिजूल लगने लगती हैं। विज्ञान ने अनेक अंधविश्वासों को चुनौती दी है। लेकिन विज्ञान की यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। जब शोधकर्ता प्रकृति के रहस्यों तक पहुंचने का प्रयास करता है, तब उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे विनम्रता में बदलने लगता है। प्रकृति हमारी सहज धारणाओं से कहीं अधिक रहस्यमय है। ज्ञान बढ़ने का अर्थ प्रश्नों की गहराई बढ़ना है। हम जान सकते हैं कि तारे कैसे बनते हैं, लेकिन यह प्रश्न बना रहता है कि ऐसा ब्रह्मांड है ही क्यों, जिसमें तारे बन सकें। विज्ञान जितना गहरा होता जाता है, उतना ही स्पष्ट होता जाता है कि वास्तविकता का अंतिम आधार यांत्रिक व्याख्या से परे है। विज्ञान अपनी सर्वोच्च सफलता में हमें विनम्र बनाता है। वह हमें यह दिखाता है कि ज्ञान और रहस्य विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हैं। सच्चा वैज्ञानिक वह है, जो जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक विस्मित होता जाता है। यह एक ऐसी गहराई है, जिसमें प्रत्येक खोज हमें और अधिक गहराई की ओर ले जाती है। इसलिए मैंने कहा था कि प्राकृतिक विज्ञान का पहला घूंट मनुष्य को नास्तिक बना सकता है, लेकिन गिलास के तल में ईश्वर उसकी प्रतीक्षा कर रहा होता है। यहां ईश्वर शब्द से मेरा आशय उस अंतिम रहस्य से है, जो समस्त अस्तित्व के पीछे विद्यमान है, उस गहन व्यवस्था से है, जो ब्रह्मांड को अर्थ और संरचना प्रदान करती प्रतीत होती है, उस विस्मय से है, जो तब उत्पन्न होता है, जब हम समझते हैं कि हमारी बुद्धि वास्तविकता को छू तो सकती है, पर उसे पूरी तरह अपने अधिकार में नहीं ले सकती। प्रारंभिक ज्ञान कभी-कभी अहंकार उत्पन्न करता है। पर जब वह ज्ञान परिपक्व होता है, जब मनुष्य वास्तविकता की अथाह जटिलता और रहस्य का सामना करता है, तब उसका अहंकार टूटने लगता है। और उसी विनम्रता में वह अनुभव करता है कि अस्तित्व केवल तथ्यों का संग्रह नहीं है, वह एक रहस्य भी है।