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चंद्रमा ने किया गुरु-पत्नी का अपहरण: अत्यधिक ऐश्वर्य विवेक को ढक देता है
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चंद्रमा ने किया गुरु-पत्नी का अपहरण
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
भगवान ब्रह्मा ने जब प्रजा की सृष्टि का विचार किया, तो उनके मन के संकल्प से महर्षि अत्रि प्रकट हुए। अत्रि अत्यंत धर्मनिष्ठ थे। एक बार उन्होंने निश्चय किया कि वह ऐसा तप करेंगे, जिससे संपूर्ण जगत का हित हो। उन्होंने तीन हजार दिव्य वर्षों तक कठोर तपस्या की। दोनों भुजाएं ऊपर उठाए वह वृक्ष, पर्वत और शिलाखंड की भांति अचल खड़े रहे। उन्होंने न किसी को कष्ट दिया, न कोई इच्छा व्यक्त की। वह केवल सोम स्वरूप दिव्य शक्ति का ध्यान करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे। उनके तप की तीव्रता इतनी बढ़ गई कि उनका संपूर्ण शरीर ही सोममय हो गया।एक दिन उनके नेत्रों से जलधारा के रूप में अद्भुत तेज प्रकट हुआ। वह प्रकाश इतना दिव्य था कि दसों दिशाएं आलोकित हो उठीं। उस तेज को देखकर दिशाओं की देवियां प्रसन्न हो गईं और उन्होंने उसे अपने गर्भ में धारण कर लिया। परंतु, वह तेज इतना प्रबल था कि वह उसे अधिक समय तक संभाल न सकीं। अंततः, वह दिव्य गर्भ दिशाओं के उदर से निकलकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जब वह तेजस्वी गर्भ पृथ्वी पर आया, तब समस्त धरती उसके प्रकाश से जगमगा उठी। ब्रह्मा जी ने संसार के कल्याण हेतु उस दिव्य बालक को अपने रथ पर स्थापित कर लिया। महर्षि अत्रि के उस तेजस्वी पुत्र का नाम सोम पड़ा। उसे चंद्रमा भी कहते हैं। ब्रह्मा जी के सात मानस पुत्रों, भृगु आदि महर्षियों ने वेद-मंत्रों द्वारा चंद्रमा की स्तुति की, जिससे चंद्रमा का तेज और बढ़ गया। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें रथ पर बैठाकर इक्कीस बार पृथ्वी की परिक्रमा कराई। यात्रा के दौरान चंद्रमा का तेज जहां-जहां पृथ्वी पर गिरा, वहां विविध प्रकार की औषधियां उत्पन्न हो गईं। उन्हीं औषधियों से तीनों लोकों तथा जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज प्राणियों का पालन होने लगा। इस प्रकार चंद्रमा समस्त सृष्टि के पोषक बन गए। बाद में, ब्रह्मा जी ने उन्हें बीजों, औषधियों, जल और ब्राह्मणों का अधिपति बनाया। अभिषेक के पश्चात चंद्रमा की शोभा और बढ़ गई।
चंद्रमा का प्रकाश तीनों लोकों में फैलने लगा। प्रजापति दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया। ये सत्ताइस कन्याएं आगे सत्ताइस नक्षत्रों के रूप में प्रसिद्ध हुईं। चंद्रमा ने अपने वैभव और सामर्थ्य के प्रभाव से एक भव्य राजसूय यज्ञ किया।
उसमें उन्होंने एक लाख गाय दान कीं। ऋषि, देवता और समस्त लोक उनका सम्मान करते थे। परंतु, अत्यधिक ऐश्वर्य कभी-कभी विवेक को ढक देता है। धीरे-धीरे चंद्रमा के मन में अहंकार उत्पन्न हो गया। उन्होंने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के अनुपम सौंदर्य को देख उसका अपहरण कर लिया। इस घटना से देवताओं और दैत्यों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसे तारकामय युद्ध कहा गया। एक ओर बृहस्पति और भगवान शिव थे, तो दूसरी ओर शुक्राचार्य और चंद्रमा का पक्ष। युद्ध से तीनों लोक संकट में पड़ गए। अंततः ब्रह्मा जी को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने युद्ध रुकवाया तथा तारा को वापस बृहस्पति के पास भेज दिया। परंतु, उस समय तारा गर्भवती थी। इससे यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि गर्भस्थ बालक का पिता कौन है-बृहस्पति या चंद्रमा?
ब्रह्मा जी के आदेश पर तारा ने स्वीकार किया कि वह बालक चंद्रमा का पुत्र है। उस तेजस्वी पुत्र का नाम बुध रखा गया। उनका विवाह वैवस्वत मनु की पुत्री इला से हुआ और उनसे पुरूरवा नामक महान राजा का जन्म हुआ। कुछ समय बाद चंद्रमा, राजयक्ष्मा नामक रोग से पीड़ित हो गए। उनका तेज क्षीण होने लगा और उनका चंद्रमंडल मुरझाने लगा। तब वह अपने पिता महर्षि अत्रि की शरण में पहुंचे, जिन्होंने अपने तपोबल से उनका रोग दूर कर दिया। रोगमुक्त होकर चंद्रमा पुनः पूर्ण तेजस्वी हो उठे और अपनी शीतल किरणों से संसार का पोषण करने लगे। इस प्रकार चंद्रदेव जगत के लिए जीवन और शीतलता का आधार बने।