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देव की डायरी: देशहित में लगातार व्यस्त रहें !

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Sat, 13 Jun 2026 05:49 PM IST
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सार

खाली बैठा हुआ आदमी इस देश में उतना ही संदिग्ध है जितना स्टेशन पर बिना टिकट खड़ा हुआ यात्री... और खाली बैठे-बैठे सोचने वाला आदमी बाजार के लिए उतना ही खतरनाक है जितना मिठाई की दुकान के लिए उपवास।

social satire Remain constantly engaged in the interest of the nation
देशहित - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार

देश में बहुत-सी समस्याएं हैं। महंगाई है, बेरोजगारी है, प्रदूषण है, भ्रष्टाचार है। लेकिन इन सबसे बड़ी समस्या है, कहीं कोई आदमी खाली न बैठ जाए। सरकारें बदलती रहती हैं, योजनाएं बदलती रहती हैं, फिर भी कभी इस राष्ट्रीय चिंता में कोई परिवर्तन नहीं आया है।



आप किसी आदमी से पूछिए, "क्या कर रहे हो?" वह तुरंत कुछ न कुछ करने लगता है।

अगर वह सचमुच कुछ नहीं कर रहा था, तो आपका प्रश्न सुनते ही मोबाइल निकाल लेगा। मोबाइल नहीं होगा तो जेब टटोलने लगेगा। जेब में कुछ नहीं होगा तो घड़ी देख लेगा। घड़ी भी नहीं होगी तो माथे पर चिंता की एक शिकन पैदा कर लेगा ताकि लगे कि कोई महत्वपूर्ण काम भीतर चल रहा है। खाली बैठा हुआ आदमी इस देश में उतना ही संदिग्ध है जितना स्टेशन पर बिना टिकट खड़ा हुआ यात्री।
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उससे पूछा जाता है, "सब ठीक तो है?" जैसे खाली बैठना कोई बीमारी हो।

मैं एक दिन घर की बालकनी में बैठा था। कुछ नहीं कर रहा था। केवल सामने के पेड़ को देख रहा था।
पत्नी ने पूछा, "किस सोच में हो?"

मैंने कहा, "किसी में नहीं।" वह घबरा गई।
‘मनुष्य सोच में न हो’, यह तो समझ में आता है। लेकिन ‘मनुष्य किसी सोच में भी न हो’, यह खतरनाक स्थिति है।
 
थोड़ी देर बाद बेटा आया। उसने पूछा, "वाई-फाई चला गया क्या?"
मैंने कहा, "नहीं।" उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं मानव सभ्यता के विकास में बाधा डाल रहा हूं।

आज का आदमी पैदा नहीं होता, सक्रिय कर दिया जाता है। जन्म लेते ही उसे किसी न किसी काम में लगा दिया जाता है। बचपन में पढ़ाई करो। जवान हो तो नौकरी करो। उम्रदराज हो जाओ तो स्वास्थ्य सुधारो। स्वास्थ्य सुधर जाए तो योग करो।
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योग से समय बचे तो मोटिवेशनल वीडियो देखो। वीडियो खत्म हो जाए तो यह चिंता करो कि अगला वीडियो कौन-सा देखना है।
लेकिन किसी भी हालत में खाली मत बैठो। खाली बैठने से आदमी सोचने लगता है।

...और सोचने वाला आदमी बाजार के लिए उतना ही खतरनाक है जितना मिठाई की दुकान के लिए उपवास। बाजार चाहता है कि आप लगातार व्यस्त रहें।

आप चल रहे हों तो जूते बेच देगा। बैठे हों तो कुर्सी बेच देगा।
सो रहे हों तो गद्दा बेच देगा। जाग रहे हों तो कॉफी बेच देगा।

लेकिन अगर आप केवल बैठे हुए हैं और कुछ नहीं कर रहे, तो बाजार के पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचता। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं मानी जाती। इसलिए आजकल व्यस्तता एक राष्ट्रीय पोशाक है।

एक सज्जन को मैं जानता हूं। दिन भर इतने व्यस्त दिखाई देते हैं कि देखकर थकान होने लगती है।

एक दिन मैंने पूछा, "आखिर करते क्या हैं?"
बोले, "यही तो समझ नहीं पा रहा हूं।" लेकिन व्यस्त थे।

हमारे समय का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि आदमी के पास समय कम है। संकट यह है कि आदमी को यह विश्वास दिला दिया गया है कि समय का कोई भी खाली टुकड़ा अपराध है। इसलिए वह अपने हर मिनट को लबालब भर देना चाहता है। वह अपने जीवन को ऐसे भर रहा है जैसे कोई पुराना गद्दा रूई से भरता है।

फर्क सिर्फ इतना है कि गद्दा भरने से आराम मिलता है और जीवन भरने से बेचैनी।

बाजार ने हमें सिखाया है कि जीना एक 'प्रोसेस' है और हम सब 'प्रोसेसर' हैं।

अगर प्रोसेसर घूम नहीं रहा, तो मतलब सिस्टम क्रैश हो गया है। इसलिए आदमी बिस्तर पर लेटे-लेटे भी अपनी उंगलियां चलाता रहता है, इस भ्रम में कि वह कुछ कर रहा है।

मुझे लगता है आने वाले समय में संविधान में एक नया मौलिक कर्तव्य जोड़ा जाएगा,"प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह हर समय किसी न किसी काम में लगा हुआ दिखाई दे।" और जो नागरिक दोपहर में किसी पेड़ को देखता हुआ, बिना मोबाइल छुए, चुपचाप बैठा पाया जाएगा, उसे राष्ट्र की उत्पादकता के विरुद्ध माना जाएगा।

लेकिन फिर भी अगर आपको कोई 'खाली' बैठा मिल जाए, तो उसे टोकिए मत। उसे प्रणाम कीजिए। वह इस दौर का सबसे बड़ा क्रांतिकारी है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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