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बंगाल की राजनीति: टीएमसी का वजूद भाजपा के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?
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सार
पश्चिम बंगाल में पिछले एक दशक के दौरान भाजपा और टीएमसी के बीच स्पष्ट राजनीतिक ध्रुवीकरण विकसित हुआ है। भाजपा ने राज्य में अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक वृद्धि इसी द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा के आधार पर दर्ज की।
ममता बनर्जी और पीएम मोदी
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
यह प्रश्न पहली नजर में विरोधाभासी लग सकता है। आखिर कोई दल अपने प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के अस्तित्व को क्यों बनाए रखना चाहेगा?
लेकिन राजनीति में प्रतिद्वंद्वी का पूरी तरह समाप्त हो जाना हमेशा लाभकारी नहीं होता। कई बार एक मजबूत और स्पष्ट विरोधी का बने रहना राजनीतिक दृष्टि से अधिक उपयोगी साबित होता है।
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पश्चिम बंगाल में पिछले एक दशक के दौरान भाजपा और टीएमसी के बीच स्पष्ट राजनीतिक ध्रुवीकरण विकसित हुआ है। भाजपा ने राज्य में अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक वृद्धि इसी द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा के आधार पर दर्ज की। सत्ता-विरोधी भावना, भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक हिंसा तथा पहचान आधारित राजनीति जैसे मुद्दों ने भाजपा को मुख्य विपक्षी शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यदि भविष्य में टीएमसी का संगठनात्मक या राजनीतिक क्षरण होता है, तो यह आवश्यक नहीं कि उसका पूरा लाभ स्वतः भाजपा को ही मिले। टीएमसी के सामाजिक आधार, कार्यकर्ता नेटवर्क और मतदाता समर्थन का एक हिस्सा विशेषकर वामपंथी दलों की ओर भी स्थानांतरित हो सकता है।
ऐसी स्थिति में भाजपा को एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के बजाय कई प्रतिस्पर्धी राजनीतिक शक्तियों का सामना करना पड़ सकता है। भाजपा के लिए वह परिदृश्य अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल माना जा सकता है जिसमें मुकाबला मुख्यतः भाजपा बनाम टीएमसी के रूप में प्रस्तुत हो।
इससे चुनावी विमर्श अधिक स्पष्ट रहता है और मतदाताओं के सामने विकल्प भी अपेक्षाकृत सरल रूप में दिखाई देते हैं। बंगाल में हाल के वर्षों में द्विध्रुवीय राजनीति ने भाजपा के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
किस ओर जाएगी बंगाल की राजनीति?
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि यदि टीएमसी के भीतर किसी वैकल्पिक नेतृत्व या गुट को कानूनी और संस्थागत मान्यता मिलती है, तो इससे पार्टी का एक स्वरूप राजनीतिक रूप से जीवित रह सकता है।
ऐसी स्थिति में बंगाल की राजनीति पूरी तरह पुनर्संरचित होने के बजाय एक नए संतुलन की ओर बढ़ सकती है। भाजपा के लिए यह स्थिति इसलिए भी सुविधाजनक हो सकती है क्योंकि इससे विपक्षी राजनीति का केंद्र पूरी तरह वामपंथी हाथों में नहीं जाएगा।
एक अन्य तर्क यह है कि टीएमसी के कमजोर होने से राज्य में वामपंथी राजनीति के पुनरुत्थान की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। पिछले डेढ़ दशक में टीएमसी ने सामाजिक कल्याण, जनआंदोलन और राजनीतिक लामबंदी जैसे अनेक ऐसे राजनीतिक औजारों का इस्तेमाल किया जिन्हें कभी वामपंथी राजनीति की पहचान माना जाता था।
परिणामस्वरूप वामपंथी दलों के लिए अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को पुनर्गठित करना कठिन हुआ। भाजपा और वामपंथी दलों के बीच वैचारिक संघर्ष का इतिहास भी लंबा रहा है।
इसलिए भाजपा के कुछ रणनीतिकारों की दृष्टि में टीएमसी की उपस्थिति वामपंथी पुनरुत्थान के विरुद्ध एक अवरोधक की भूमिका निभा सकती है। हालांकि यह आकलन राजनीतिक परिस्थितियों और शक्ति संतुलन के अनुसार बदल भी सकता है।
टीएमसी का अस्तित्व भाजपा के लिए उपयोगी?
राष्ट्रीय स्तर पर भी टीएमसी का अस्तित्व भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उपयोगी हो सकता है। टीएमसी भाजपा की प्रमुख आलोचक रही है, लेकिन वह कांग्रेस-नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधनों के भीतर भी अक्सर स्वतंत्र राजनीतिक रुख अपनाती रही है।
इससे विपक्षी एकता के प्रयासों में समय-समय पर अंतर्विरोध उभरते रहे हैं। भाजपा के दृष्टिकोण से बिखरा हुआ विपक्ष सामान्यतः एकजुट विपक्ष की तुलना में कम चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इसके अतिरिक्त, भाजपा लंबे समय से बंगाल में स्वयं को परिवर्तन और टीएमसी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
यदि टीएमसी राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो जाए, तो भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति और राजनीतिक नैरेटिव दोनों को नए सिरे से परिभाषित करना पड़ सकता है। इसलिए यह संभव है कि भाजपा का लक्ष्य केवल टीएमसी को सत्ता से दूर रखना हो, न कि उसका पूर्ण राजनीतिक उन्मूलन।
राजनीति में कई बार ऐसी स्थिति सबसे लाभकारी मानी जाती है जिसमें प्रतिद्वंद्वी इतना मजबूत न हो कि सत्ता में बना रहे, लेकिन इतना कमजोर भी न हो जाए कि उसकी जगह कोई नया और अप्रत्याशित प्रतिद्वंद्वी उभर आए।
इसी संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि बंगाल की वर्तमान राजनीतिक संरचना में टीएमसी का वजूद, भाजपा की प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद, उसके लिए एक सीमा तक राजनीतिक रूप से उपयोगी साबित हो सकता है।
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