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गांधीजी की गंगा-चिंता: सदी पुरानी समस्या, आज भी बरकरार

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 01 Oct 2025 07:28 PM IST
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सार

राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में करोड़ों सनातनी हिंदुओं की आस्था की प्रतीक गंगा की सफाई का बीड़ा उठाते हुए 1986 में गंगा एक्शन प्लान शुरू किया, जिस पर 2014 तक करीब 4,000 करोड़ रुपये खर्च हुए।

mahatma gandhi concern for the Ganga: A century old problem that persists even today
महात्मा गांधी जयंती। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

महात्मा गांधी जब अप्रैल 1915 में कुंभ मेले के अवसर पर गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक मुंशी राम से मिलने हरिद्वार पहुंचे, तो वे इस महान व्यक्तित्व और कुंभ की भव्यता से अभिभूत हुए, लेकिन पतित पावनी गंगा की दशा देखकर उन्हें गहरा कष्ट हुआ। गंगा की भौतिक गंदगी से अधिक उन्हें नैतिक गिरावट ने व्यथित किया।

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गांधीजी की इस यात्रा और उनकी डायरी में दर्ज यात्रा-वृत्तांत के बाद एक पूरी सदी बीत चुकी है, लेकिन राजीव गांधी के गंगा एक्शन प्लान से लेकर नरेंद्र मोदी के नमामि गंगे तक हजारों करोड़ रुपये व्यय होने के बावजूद, करोड़ों लोगों के पाप धोने वाली गंगा का अपना मैल घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है।
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एक रिपोर्ट के अनुसार, 1986 से 2014 तक गंगा सफाई पर लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे। यही नहीं, गंगा के प्रति सौ साल पहले का लोगों का व्यवहार आज भी वैसा ही है। योजनाकारों ने केवल भौतिक गंदगी पर ध्यान दिया और गांधीजी की उन चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया, जिनके समाधान के बिना गंगा की स्थायी पवित्रता बहाल नहीं हो सकती।

हजारों करोड़ डूबने के बाद भी गंगा का मैल नहीं घटा

राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में करोड़ों सनातनी हिंदुओं की आस्था की प्रतीक गंगा की सफाई का बीड़ा उठाते हुए 1986 में गंगा एक्शन प्लान शुरू किया, जिस पर 2014 तक करीब 4,000 करोड़ रुपये खर्च हुए।

गंगा के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक महत्व को देखते हुए, 2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “अगर हम इसे साफ करने में सफल हुए, तो यह देश की 40 प्रतिशत आबादी के लिए बड़ी मदद होगी। इसलिए गंगा सफाई एक आर्थिक एजेंडा भी है।”

पीएम मोदी के लिए गंगा की पवित्रता बहाल करना सपना ही नहीं, संकल्प भी है। इसलिए भारत सरकार ने मई 2015 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया, जिसका प्रारंभिक बजट 20,000 करोड़ रुपये था, जो बढ़कर 22,238.49 करोड़ और फिर 25,000 करोड़ तक पहुंच गया।

2025 तक इस कार्यक्रम के तहत 212 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) में से 136 पूरे हो चुके हैं, जिनकी कुल क्षमता 3,780 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) है। वित्त वर्ष 2024-25 में ही 3,184 करोड़ रुपये व्यय हुए, और उत्तर प्रदेश, बिहार तथा दिल्ली में 7 बड़े सीवरेज प्रोजेक्ट पूरे हुए।

हालांकि, 2024-25 तक आवंटित धनराशि का केवल 69 प्रतिशत ही उपयोग हो पाया। प्रधानमंत्री ने 2019 तक गंगा सफाई का लक्ष्य रखा था, जो 2020 और फिर 2026 तक बढ़ा दिया गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी तक नमामि गंगे के कुल बजट से 5,979 करोड़ खर्च हो चुके थे, लेकिन 5 राज्यों में शुरू की गई 261 परियोजनाओं में से केवल 76 ही पूरी हुईं।

सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि गंगा और उसके तटीय क्षेत्रों का भूजल लगातार जहरीला होता जा रहा है। 2025 में महाकुंभ के दौरान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने गंगा के 5 स्टेशनों पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी की, जहां बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) में वृद्धि दर्ज हुई, जो जैविक प्रदूषण का संकेत है।

फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर भी चिंताजनक रहा, हालांकि स्नान के लिए सुरक्षित सीमा (2,500 यूनिट/100 एमएल) के भीतर रहा। गंगा में प्रतिदिन लगभग 3,000 एमएलडी सीवेज डाला जा रहा है, जो स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा रहा है।

गांधीजी का हरिद्वार दौरा और गंगा की दशा

गांधीजी जब 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, तो उनके मित्र चार्ल्स एंड्र्यूज ने उन्हें तीन महान व्यक्तियों से मिलने की सलाह दी: रवींद्रनाथ टैगोर, शिक्षाविद् सुशील कुमार रुद्रा और गुरुकुल हरिद्वार के मुंशी राम। पहले वे शांतिनिकेतन गए, फिर हरिद्वार।

गांधीजी पाखंड और अंधविश्वास से दूर थे, लेकिन उनके संस्कारों में हिंदू धर्म की गहरी श्रद्धा थी, खासकर गंगा के प्रति। 5 अप्रैल 1915 को हरिद्वार पहुंचने पर कुंभ मेला चल रहा था, जहां लाखों श्रद्धालु जुटे थे।

भौतिक और नैतिक गंदगी ने गांधीजी को व्यथित किया

हरिद्वार की आध्यात्मिकता से गांधीजी प्रभावित हुए, लेकिन भौतिक गंदगी, पाखंड और अंधविश्वास ने उन्हें दुखी किया। उनकी डायरी में दर्ज बातें आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने लिखा: “ऋषिकेश और लक्ष्मण झूला के प्राकृतिक दृश्य मुझे बहुत पसंद आए... लेकिन मनुष्य की कृतियों से चित्त को शांति नहीं मिली।

हरिद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों और गंगा के किनारों को गंदा करते थे। गंगा के पवित्र जल को बिगाड़ने में उन्हें संकोच नहीं होता। शौच के लिए लोग आम जगहों पर बैठ जाते, जो मेरे चित्त को चोट पहुंचाती।” गांधीजी ने गंगा प्रदूषण को शिक्षा के अभाव से जोड़ा और स्वच्छता को धर्म से जोड़कर देखा।

काशी की गंदगी और पाखंड ने भी गांधीजी को झकझोरा

गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर 1902 में कलकत्ता से राजकोट जाते हुए गांधीजी काशी रुके। वहां की गंदगी और भिखारियों ने उन्हें प्रभावित नहीं किया। डायरी में उन्होंने लिखा: “सुबह काशी उतरा। एक पंडे के यहां ठहरा... गंगा स्नान के बाद विश्वनाथ दर्शन गए, लेकिन वहां सड़े फूलों की दुर्गंध और गंदगी देखकर दुख हुआ। मंदिर की फर्श पर मैल-कचरा जमा था।” आगे वे लिखते हैं: “दोबारा गया, लेकिन गंदगी और हो-हल्ला वैसा ही था।”

गांधीजी की भौतिक और नैतिक मलिनता पर चिंता

हरिद्वार जैसे तीर्थों पर गांधीजी ने लिखा: “ये स्थान कभी पवित्र थे, लेकिन अब मनुष्यकृत गंदगी ने इन्हें दूषित कर दिया। गंगा की धारा और हिमालय के शिखरों ने मुझे मोहा, लेकिन मनुष्य की करतूतों ने हृदय को चोट पहुंचाई।” वे गंगा तट पर खुले में शौच से व्यथित थे और लिखते हैं: “धर्म के नाम पर गंगा गंदली की जा रही है।

तट पर जहां ध्यान लगाना चाहिए, वहां मल-मूत्र त्याग हो रहा है। शास्त्रों में नदियों को गंदा करने की मनाही है। विज्ञान बताता है कि मल से अच्छी खाद बन सकती है।” पूजा सामग्री डालने पर उन्होंने विरोध किया: “फूल, गुलाल, चावल डालना प्रथा है, लेकिन यह जल बिगाड़ता है। शहर के गटर नदी में बहाना अपराध है।”

नमामि गंगे की सफलता के लिए गांधीजी की सीख अनिवार्य

1915 के कुंभ में 17 लाख श्रद्धालु जुटे थे, लेकिन अब महाकुंभ में करोड़ों आते हैं। 2010 हरिद्वार कुंभ और 2013 प्रयागराज कुंभ में मुख्य स्नान पर 1-1.5 करोड़ लोगों ने डुबकी लगाई। उत्तराखंड सरकार ने 9 करोड़, उत्तर प्रदेश ने 7 करोड़ का दावा किया। हर साल 1.5-2 करोड़ कांवड़िए आते हैं।

2025 महाकुंभ में प्रदूषण बढ़ा, जहां बीओडी और फीकल कोलीफॉर्म स्तर चिंताजनक रहे। गांधीजी होते तो क्या लिखते! कोई प्रशासन इतने लोगों के लिए पर्याप्त शौचालय नहीं बना सकता। गंगा पवित्रता के लिए भौतिक गंदगी के साथ नैतिक गिरावट और अंधविश्वास की सफाई जरूरी है।

गांधीजी की स्वच्छता शिक्षा को अपनाकर, जैसे उन्होंने हवा प्रदूषण पर जोर दिया, गंगा को बचाया जा सकता है। अन्यथा, 2025 में भी गंगा में विषाक्त धातुओं का स्तर सुधरा तो सही, लेकिन समग्र प्रदूषण जारी रहेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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