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एग्जिट पोल्स : क्या वास्तव में मतदाता की चुप्पी को कोई पढ़ पाएगा?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Wed, 29 Apr 2026 08:14 PM IST
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सार

इन आंकड़ों के बीच कुछ असहज सवाल भी उभरते हैं, क्या एग्जिट पोल्स वास्तव में मतदाता की चुप्पी को पढ़ पाते हैं? क्या ग्रामीण भारत की आवाज इनमें पूरी तरह शामिल होती है? क्या ये आंकड़े निष्पक्ष विश्लेषण हैं, या राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का एक माध्यम बन चुके हैं?

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बंगाल एग्जिट पोल के नतीजे - फोटो : @अमर उजाला
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विस्तार

पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुद्दुचेरी के एग्जिट पोल्स सामने आते ही भारतीय राजनीति में एक बार फिर वही पुराना द्वंद्व उभर आया है, क्या ये आंकड़े सच के करीब हैं या फिर यह केवल एक अनुमानित राजनीतिक कथा है? इस बार का चुनाव इसलिए भी खास है, क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की साख, मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का शासन मॉडल और राहुल गांधी की राजनीतिक दिशा, सभी एक साथ कसौटी पर हैं।

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पश्चिम बंगाल में एग्जिट पोल्स का गणित जितना रोचक है, उतना ही उलझा हुआ भी। इंडिया टुडे–एक्सिस माय इंडिया तृणमूल कांग्रेस को लगभग 158 से 170 सीटें देता दिख रहा है, जबकि भाजपा को 110 से 120 के बीच रखा गया है। वहीं एबीपी सी वोटर का अनुमान भी लगभग इसी के आसपास है, जहां तृणमूल 152 से 164 और भाजपा 109 से 121 के बीच बताई गई है। इसके उलट रिपब्लिक–सीएनएक्स का सर्वे भाजपा को 138 से 148 सीटों के साथ आगे दिखाता है और तृणमूल को 128 से 138 के बीच रखता है। इतने भिन्न आंकड़े एक ही राज्य के लिए क्या यह बताता है कि जमीन पर मुकाबला वास्तव में बेहद करीबी है या यह कि एग्जिट पोल्स अभी भी बंगाल की जटिल राजनीति को ठीक से समझ नहीं पा रहे?
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तमिलनाडु में तस्वीर अपेक्षाकृत साफ नजर आती है, जहां लगभग सभी एजेंसियां एमके स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक गठबंधन की वापसी की ओर इशारा कर रही हैं। इंडिया टुडे–एक्सिस माय इंडिया द्रमुक+ को 175 से 190 सीटों तक ले जाता दिख रहा है, जबकि अन्नाद्रमुक+ को 40 से 55 के बीच सीमित करता है। न्यूज 18–आईपीएसओएस भी लगभग इसी रेंज में द्रमुक+ को 160 से 180 और विपक्ष को 50 से 70 सीटों के बीच रखता है, लेकिन क्या यह स्पष्ट बढ़त वास्तव में जनसमर्थन का प्रतिबिंब है या फिर विपक्ष की कमजोर चुनौती का परिणाम?

असम में एग्जिट पोल्स भाजपा के पक्ष में झुकते नजर आते हैं। इंडिया टुडे–एक्सिस माय इंडिया एनडीए को 75 से 85 सीटों तक पहुंचाता है, जबकि कांग्रेस-नीत गठबंधन को 40 से 50 के बीच रखता है। रिपब्लिक–सीएनएक्स का अनुमान भी लगभग इसी दिशा में है, जहां एनडीए को 74 से 84 सीटें और कांग्रेस को 45 से 55 सीटों के बीच दिखाया गया है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति यहां असरदार दिखती है, लेकिन क्या यह बढ़त वाकई इतनी ठोस है कि नतीजों में भी वैसी ही दिखाई दे?

केरल में एग्जिट पोल्स एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं, जहां मुकाबला बेहद करीबी बताया जा रहा है, लेकिन झुकाव कांग्रेस-नीत यूडीएफ की ओर है। एबीपी–सी वोटर यूडीएफ को 70 से 80 सीटों के बीच और एलडीएफ को 60 से 70 के बीच रखता है, जबकि इंडिया टुडे–एक्सिस माय इंडिया भी यूडीएफ को 68 से 75 और एलडीएफ को 65 से 72 के बीच दिखाता है। राहुल गांधी की सक्रियता के बीच यह सवाल उठता है, क्या केरल अपनी पारंपरिक सत्ता परिवर्तन की राजनीति पर लौट रहा है या यह केवल एक अनुमान है जो नतीजों में बदल भी सकता है और नहीं भी?

पुद्दुचेरी में एग्जिट पोल्स किसी एक पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं देते। रिपब्लिक–सीएनएक्स एनडीए को 16 से 20 सीटों तक और कांग्रेस गठबंधन को 10 से 14 के बीच दिखाता है, जबकि सी वोटर का अनुमान एनडीए को 14 से 18 और कांग्रेस+ को 12 से 16 सीटों के बीच रखता है। यहां सवाल यह है कि क्या छोटे राज्यों में एग्जिट पोल्स की अनिश्चितता और बढ़ जाती है, जहां स्थानीय समीकरण ज्यादा निर्णायक होते हैं?

एग्जिट पोल्स का इतिहास खुद इनके प्रति सावधानी बरतने की सलाह देता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में एक्सिस मार इंडिया जैसी एजेंसियों ने एनडीए की जीत का काफी हद तक सही अनुमान लगाया था, लेकिन 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में लगभग सभी एजेंसियां तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक बढ़त को पकड़ने में विफल रहीं तो क्या यह मान लिया जाए कि जब स्पष्ट लहर होती है, तब एग्जिट पोल्स सही साबित होते हैं, और जब मुकाबला जटिल होता है तब ये चूक जाते हैं?

इन आंकड़ों के बीच कुछ असहज सवाल भी उभरते हैं, क्या एग्जिट पोल्स वास्तव में मतदाता की चुप्पी को पढ़ पाते हैं? क्या ग्रामीण भारत की आवाज इनमें पूरी तरह शामिल होती है? क्या ये आंकड़े निष्पक्ष विश्लेषण हैं, या राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का एक माध्यम बन चुके हैं? इन पांच राज्यों के एग्जिट पोल्स एक अधूरी कहानी ही कहते हैं। वे संकेत देते हैं, लेकिन निर्णय नहीं सुनाते। भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह हर अनुमान को चुनौती देता है। अंतिम सच वही होता है, जो मतगणना के दिन सामने आता है और अक्सर वही सच सबसे ज्यादा चौंकाने वाला होता है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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