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जयंती विशेष : आखिरी जन्मदिन पर बापू क्या कर रहे थे?

Tue, 02 Oct 2018 01:46 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 02 Oct 2018 01:46 AM IST
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Mahatma Gandhi's 150th Birth Anniversary : What was Bapu doing on the last birthday?
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती

जो शख्स कभी सवा सौ साल जीना चाहता था और अपनी चाहत के लिए पूरी तरह आश्वस्त भी था। महज 78 वसंत के बाद ही उसकी हिम्मत टूट-सी गई है। बापू अब जीना नहीं चाहते। अपने जन्मदिन से एक दिन पहले एक अक्तूबर, 1947 को बापू शाम की प्रार्थना में कहते हैं, 'भगवान मुझे अपने पास बुला ले।' वह अपने प्यारे देश को हर दिन बर्बाद होता नहीं देख सकते। वह चाहते हैं सब कुछ खत्म हो, उससे पहले ही उनकी आंखें यह सब देखना बंद कर दें।

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दो अक्तूबर, 1947 की तारीख आने से कुछ घंटे पहले से ही गांधी आत्म शुद्धि के लिए चौबीस घंटे का व्रत शुरू कर चुके हैं। स्वतंत्र भारत में अपने पहले जन्म दिवस के दिन गांधी जी रोज की तरह ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं। नित्य क्रियाएं खत्म करके वह चरखा चलाते हैं फिर गीता के श्लोक पढ़ने के बाद बापू ध्यान में लीन हो जाते हैं।
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ध्यान करते वक्त वह शायद 78 बरस पहले का दिन सोच रहे हैं, जब वह पोरबंदर में पैदा हुए थे। वह अपनी माता पुतलीबाई की प्रसव पीड़ा को भी याद कर रहे हैं। निश्चित तौर पर उनके दिमाग में 1876 के उस दिन की स्मृतियां कौंध रही हैं जब उन्होंने पहली बार राजा हरिशचंद्र पर आधारित नाटक देखा था और उससे खूब प्रभावित हुए थे। उसी दिन मोहनदास के मन में यह ख्याल आया था कि हरिशचंद्र की तरह हर कोई सत्य का पुजारी आखिर क्यों नहीं हो सकता? कस्तूरबा से विवाह और इंग्लैंड जाकर वकालत की पढ़ाई, जीवन के हर अहम मोड़ को उन्होंने याद किया।

अपने मन से एक-दूसरे के प्रति नफरत मिटा दें

हां, दक्षिण अफ्रीका की रेलगाड़ी में हुए अपने साथ दुर्व्यवहार को वह भला कैसे भूल सकते हैं। 1915 में भारत वापसी के बाद के अपने प्रत्येक संघर्ष को वह याद कर रहे हैं। बापू की तबीयत ठीक नहीं है, वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद खांस रहे हैं। हालांकि यह उनका पहला जन्मदिन नहीं है, जब उनकी तबीयत खराब रही हो।

पचासवें जन्मदिन पर तो साबरमती में उनकी हालत इस कदर बिगड़ गई थी कि उनके पुत्रों को टेलीग्राम से सूचित किया गया कि उन्हें अपने पिता के पास आना चाहिए। लेकिन तब गांधी मरना नहीं चाहते थे, तब ईश्वर से उनकी प्रार्थनाएं और अपेक्षाएं अलग थीं और आज बिल्कुल अलग हैं। दिन चढ़ने के साथ कई लोग उन्हें जन्मदिन की बधाई देने के लिए आ रहे हैं। लोग उन्हें आजाद भारत का राष्ट्रपिता कहकर संबोधित कर रहे हैं।

गवर्नर-जनरल माउंटबेटन अपनी पत्नी लेडी एडविना के साथ पधारे हैं। देश के उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल उन लोगों में शामिल हैं, जो सबसे पहले सुबह ही शुभकामना संदेश के साथ बापू के पास पहुंचे हैं। प्रधानमंत्री नेहरू, उद्योगपति जीडी बिरला, राजकुमारी अमृत कौर, मुस्लिम-सिख समुदायों के शीर्ष नेता और कैबिनट के अन्य सदस्यों ने बापू को घेर रखा है। सभी बापू के लंबे जीवन की प्रार्थना कर रहे हैं। लेकिन बापू लोगों की शुभकामनाओं की फीकी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

शाम की प्रार्थना के वक्त बापू अपने अनुयायियों को संबोधित करते हुए कहते हैं, 'मैं जबसे भारत लौटा हूं, तभी से मैंने देश में सांप्रदायिक सौहार्द बनाने को अपना काम माना है, लेकिन आज हर कोई एक-दूसरे का दुश्मन बन बैठा है। मेरी सभी कोशिशें बेकार गईं। मुझे नहीं लगता कि अब मेरे जीने की कोई भी वजह बची है।

मैंने सवा सौ साल जीने का ख्वाब छोड़ दिया है। मैं आज से अपने 79वें साल में प्रवेश कर रहा हूं और यह मुझे दर्द दे रहा है। अगर आप लोग सच में मेरा जन्मदिन मनाना चाहते हैं, तो आप अपने मन से एक-दूसरे के प्रति नफरत मिटा दें। मैं आपसे बस यही चाहता हूं। ईश्वर हमारे साथ है।'

(वी राममूर्ति की पुस्तक महात्मा गांधी द लास्ट 200 डेज के अंश)
 

'मेरे विचार में हरिश्चंद्र और श्रवण आज भी जीवित हैं'

साधारणतः पाठशाला की पुस्तकों को छोड़कर और कुछ पढ़ने का मुझे शौक नहीं था। सबक याद करना चाहिए, उलाहना सहा नहीं जाता, शिक्षक को धोखा देना ठीक नहीं, इसलिए मैं पाठ याद करता था। लेकिन मन अलसा जाता, इससे अक्सर सबक कच्चा रह जाता। ऐसी हालत में दूसरी कोई चीज पढ़ने की इच्छा क्यों कर होती?

किंतु पिताजी की खरीदी हुई एक पुस्तक पर मेरी दृष्टि पड़ी, नाम था 'श्रवण-पितृभक्ति नाटक'। मेरी इच्छा उसे पढ़ने की हुई और मैं उसे बड़े चाव के साथ पढ़ गया। उन्हीं दिनों शीशे में चित्र दिखाने वाले भी घर-घर आते थे। उनके पास मैंने श्रवण का वह दृश्य भी देखा, जिसमें वह अपने माता-पिता को कांवर में बैठाकर यात्रा पर ले जाता है। दोनों चीजों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा, मन में इच्छा होती कि मुझे भी श्रवण के समान बनना चाहिए।

इन्हीं दिनों कोई नाटक कंपनी आई थी और उसका नाटक देखने की इजाजत मुझे मिली थी। हरिश्चंद्र का आख्यान था। उस नाटक को देखते हुए मैं थकता ही न था। उसे बार-बार देखने की इच्छा होती थी। लेकिन यूं बार-बार जाने कौन देता? पर अपने मन में मैंने उस नाटक को सैकड़ों बार खेला होगा। मुझे हरिश्चंद्र के सपने आते। हरिश्चंद्र की तरह सत्यवादी सब क्यों नहीं होते? यह धुन बनी रहती। 

हरिश्चंद्र पर जैसी विपत्तियां पड़ीं, वैसी विपत्तियों को भोगना और सत्य का पालन करना ही वास्तविक सत्य है। मैंने यह मान लिया था कि नाटक में जैसी लिखी हैं वैसी विपत्तियां हरिश्चंद्र पर पड़ी होंगी। हरिश्चंद्र के दुख देखकर उसका स्मरण करके मैं खूब रोया हूं। आज मेरी बुद्धि समझती है कि हरिश्चंद्र कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं था। फिर भी मेरे विचार में हरिश्चंद्र और श्रवण आज भी जीवित हैं। मैं मानता हूं कि आज भी उन नाटकों को पढ़ूं तो मेरी आंखों से आंसू बह निकलेंगे।

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