ऑपरेशन सिंदूर और पांचवां रणक्षेत्र: भारत की अगली चुनौती
इतिहास इस बारे में एकमत है। जब कोई राज्य-प्रायोजित साइबर समूह पारंपरिक तरीकों से किसी सैन्य प्रहार का मुकाबला नहीं कर पाता, तो वह असममित हथियारों की ओर मुड़ता है।
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ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया को एक स्पष्ट संदेश दिया, भारत अपने लक्ष्यों की पहचान में सटीक, कार्रवाई में निर्णायक और दबाव का सामना करने में सक्षम है। इन हमलों ने न सिर्फ सैन्य बल, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता का भी परिचय दिया, एक ऐसी परिपक्वता जो भारत की रणनीतिक सोच में नए अध्याय की शुरुआत करती है। लेकिन जो शक्तियां भारत के सामने खड़ी हैं, वे सिर्फ अपने अगले पारंपरिक कदम की गणना नहीं कर रहीं। वे पहले से ही एक ऐसे क्षेत्र में सक्रिय हैं जहां मिसाइलें और लड़ाकू विमान बेकार हो जाते हैं। जहां निशाना कोई इमारत नहीं, बल्कि बिजली का ग्रिड है, किसी अस्पताल की पूरी व्यवस्था है, कोई वित्तीय नेटवर्क है, या डेढ़ अरब लोगों का भरोसा है। यह है साइबर क्षेत्र-इक्कीसवीं सदी का नया रणक्षेत्र और इस टकराव का अगला दौर यहीं लड़ा जाएगा। भारत को उसी दृढ़ता के साथ इसके लिए तैयार होना होगा, जो उसने भौतिक मोर्चे पर दिखाई।
असममित जवाब की पटकथा पहले से लिखी जा रही
इतिहास इस बारे में एकमत है। जब कोई राज्य-प्रायोजित साइबर समूह पारंपरिक तरीकों से किसी सैन्य प्रहार का मुकाबला नहीं कर पाता, तो वह असममित हथियारों की ओर मुड़ता है। साइबर क्षेत्र एक ऐसा हथियार है, जो आसानी से उपलब्ध है, जिसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी से आसानी से बचा जा सकता है और जिसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
राज्य-समर्थित साइबर समूहों को भारत की वायु शक्ति से टक्कर नहीं लेनी। उन्हें सिर्फ किसी अस्पताल के नेटवर्क में सुरक्षा की एक छोटी-सी चूक ढूंढनी है, बिजली वितरण प्रणाली में एक असुरक्षित सर्वर खोजना है, या किसी वित्तीय संस्था में एक कमजोर पासवर्ड मिल जाना काफी है। यह अटकल नहीं, बल्कि एक परखी हुई प्रवृत्ति है।। जब भी किसी क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ा है, उसके बाद नागरिक बुनियादी ढांचे पर साइबर हमले हुए हैं, यह एक परखी हुई प्रवृत्ति है।
आवश्यक सेवाओं पर विघटनकारी हमले, दहशत फैलाने के लिए दुष्प्रचार अभियान, सरकारी प्लेटफॉर्मों को निशाना बनाकर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करना, और रक्षा व खुफिया संगठनों पर लगातार घुसपैठ की कोशिशें, यह सब इसी पैटर्न का हिस्सा है। भारत को इस पैटर्न के सामने का इंतजार नहीं करना चाहिए। अभी से तैयारी करनी होगी।
किसी बड़े शहर में झूठा आपातकालीन अलर्ट भेज दिया जाए। बुनियादी ढांचे के ध्वस्त होने की नकली वीडियो मैसेजिंग प्लेटफार्मों पर वायरल हो जाए। किसी बड़ी खबर के साथ तालमेल बिठाकर बैंकिंग सेवाएं एकसाथ ठप कर दी जाएं। ये भविष्य की कल्पनाएं नहीं हैं, ये वे तकनीकें हैं जिन्हें राज्य-समर्थित साइबर समूह दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहले ही आजमा चुके हैं। भारत अब उनकी प्राथमिकता सूची में है।
भारत ने जो बनाया है, उसका भी श्रेय दें
यह सोचना गलत होगा कि भारत इस चुनौती के सामने शून्य खड़ा है। पिछले एक दशक में देश ने राष्ट्रीय साइबर क्षमता में गंभीर निवेश किया है। CERT-In एक कार्यशील घटना-प्रतिक्रिया ढांचा प्रदान करता है। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC) की स्थापना विशेष रूप से सबसे संवेदनशील प्रणालियों की सुरक्षा के लिए की गई थी। वर्ष 2019 में गठित रक्षा साइबर एजेंसी साइबर क्षमता को सैन्य सिद्धांत में एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति ने एक आधारभूत ढांचा तैयार किया है। ये वास्तविक संस्थाएं हैं और इनका श्रेय मिलना चाहिए।
भारत के पास एक और चीज है जो कई देशों के पास नहीं है, विशालता। लाखों की संख्या में प्रौद्योगिकी कार्यबल, एक जीवंत सुरक्षा अनुसंधान समुदाय, कंप्यूटर विज्ञान में गहरी शैक्षणिक क्षमता और एक तेजी से परिपक्व होता निजी क्षेत्र का सुरक्षा उद्योग। वास्तविक साइबर शक्ति बनाने की बुनियादी क्षमता इस देश में मौजूद है। सवाल यह है कि क्या इसे उस तत्परता के साथ संगठित, निर्देशित और प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा रहा है, जो इस समय की मांग है।
जहां अभी भी कमियां हैं
ईमानदार आकलन आत्मसंतोष से बेहतर होता है। कई कमजोरियां अभी भी हैं जिन्हें विरोधी जरूर परखेंगे। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे का स्वामित्व बिखरा हुआ है। बिजली, पानी, परिवहन, स्वास्थ्य और वित्त, ये सब केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी संचालकों में बंटे हुए हैं। इन सभी के बीच सुरक्षा के मानक बेहद असमान हैं। कुछ अच्छी तरह सुरक्षित हैं, कुछ इतने उजागर हैं कि किसी राजनीतिक संकट के कुछ घंटों के भीतर एक दृढ़ विरोधी उनका फायदा उठा सकता है। यह जानना कि कौन-सी प्रणालियां सबसे कमज़ोर हैं और संकट की स्थिति में उनकी रक्षा की एक स्पष्ट योजना होना, यह उस स्तर का समन्वय मांगता है जो अभी उस पैमाने पर भारत में मौजूद नहीं है।
राज्य-स्तरीय साइबर क्षमता कुछ बड़े महानगरों के बाहर अभी भी सीमित है। साइबर खतरा सिर्फ दिल्ली और मुंबई तक नहीं सीमित है। किसी छोटे शहर का बिजली सबस्टेशन, पुराने सॉफ्टवेयर पर चलता एक क्षेत्रीय अस्पताल, पहले से निर्धारित (डिफाॅल्ट) पासवर्ड वाला एक राज्य सरकार का पोर्टल, ये सभी वास्तविक प्रवेश बिंदु हैं जिन्हें दुश्मन सक्रिय रूप से चिह्नित करते हैं। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा उतनी ही मजबूत होती है जितनी उसकी सबसे कमजोर राज्य-स्तरीय कड़ी।
घटना-प्रतिक्रिया की गति में तत्काल सुधार जरूरी है। किसी साइबर घुसपैठ के बाद और एक समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया के सक्रिय होने के बीच का अंतर अभी भी बहुत बड़ा है। साइबर संघर्ष में घंटे मायने रखते हैं। वर्ष 2022 में AIIMS दिल्ली पर हुए रैनसमवेयर हमले ने देश के सबसे महत्वपूर्ण अस्पतालों में से एक को हफ्तों के लिए गंभीर रूप से बाधित कर दिया था। उस घटना ने न सिर्फ तकनीकी कमजोरियां उजागर कीं, बल्कि यह भी दिखाया कि एक परखे हुए, त्वरित-प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल का अभाव है जो नुकसान को तुरंत काबू कर सके और सेवाएं बहाल कर सके। यह सबक संस्थागत रूप लेना चाहिए, महज एक टिप्पणी बनकर भूल नहीं जानी चाहिए।
सरकारी-निजी समन्वय को भी कहीं अधिक गहरा होना होगा। भारत का अधिकांश महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचा सरकार के स्वामित्व में नहीं है। दूरसंचार नेटवर्क, क्लाउड प्लेटफार्म, भुगतान प्रणालियां, लॉजिस्टिक्स और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी, ये सब काफी हद तक निजी क्षेत्र के हाथों में हैं। ऐसी राष्ट्रीय साइबर नीति जो इन्हें पूरी तरह एकीकृत नहीं करती, स्वाभाविक रूप से अधूरी रहेगी। भारत को अनिवार्य खतरा-सूचना साझाकरण, संयुक्त संकट अभ्यास और राष्ट्रीय साइबर आपातकाल में निजी क्षेत्र की जिम्मेदारियों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल की आवश्यकता है।
साइबर पर भी लागू हो 'सिंदूर मानक'
ऑपरेशन सिंदूर को संभव बनाने वाली चीज सिर्फ हथियार नहीं थे। वह था सिद्धांत, तैयारी, राजनीतिक स्पष्टता और संस्थागत तत्परता। साइबर क्षेत्र के लिए भी यही सामग्री चाहिए। पहले सिद्धांत की बात। भारत को अपनी साइबर प्रतिरक्षा नीति को अधिक स्पष्ट, सुव्यवस्थित और सार्वजनिक रूप से इस प्रकार प्रस्तुत करने की आवश्यकता है कि दुश्मन उसे समझें और गंभीरता से लें। अस्पष्टता नहीं, चुप्पी नहीं। स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि भारतीय महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर किसी भी हमले की कीमत चुकानी पड़ेगी और भारत के पास उसका जवाब देने की क्षमता तथा इच्छाशक्ति दोनों मौजूद हैं, और प्रतिक्रिया की सीमा परिभाषित है। प्रतिरक्षा साइबर क्षेत्र में उतनी ही कारगर होती है जितनी कहीं और, लेकिन सिर्फ तब, जब दुश्मन यह विश्वास करे कि क्षमता वास्तविक है और इरादा विश्वसनीय।
AI से संचालित साइबर रक्षा में निवेश राष्ट्रीय प्राथमिकता बनना चाहिए। AI साइबर घुसपैठ का पता लगाने, उसका विश्लेषण करने और प्रतिक्रिया देने के लिए उपलब्ध समय को तेजी से संकुचित कर रहा है। सिस्टम लॉग का विश्लेषण करता एक मानव विश्लेषक AI-सहायता प्राप्त हमले की गति से मेल नहीं खा सकता। भारत के रक्षात्मक ढांचे को उस गति के अनुरूप होना होगा। इसका अर्थ है महत्वपूर्ण प्रणालियों में AI-संचालित खतरा-पहचान में निवेश करना, उन प्रणालियों को भारत-विशिष्ट खतरे के पैटर्न पर प्रशिक्षित करने के लिए डेटासेट बनाना और संकट की स्थिति में इन्हें प्रभावी ढंग से संचालित करने की संस्थागत विशेषज्ञता विकसित करना।
भारत को आक्रामक साइबर क्षमता के बारे में भी गंभीरता से सोचना चाहिए, अपनी प्रतिरक्षा संरचना के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में। यह किसी आक्रामकता का आह्वान नहीं है। हर बड़ी शक्ति जो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीरता से लेती है, आक्रामक साइबर उपकरण विकसित और संचालित करती है। भारत को ऐसी आक्रामक साइबर क्षमता भी विकसित करनी होगी जो किसी भी विरोधी को भारत के विरुद्ध साइबर हमले की कीमत चुकाने पर मजबूर कर सके। सिर्फ इस क्षमता का अस्तित्व और विरोधियों का उसके प्रति आश्वस्त होना ही एक प्रभावी प्रतिरक्षात्मक सिद्ध हो सकता है। भारत को इसका विवरण प्रकाशित नहीं करना है। उसे बस उसी गंभीरता से यह क्षमता बनानी है जो उसने पारंपरिक सैन्य आधुनिकीकरण में लगाई है।
राष्ट्रीय सुरक्षा अविभाज्य है
ऑपरेशन सिंदूर ने सिद्ध किया कि भारत के पास भौतिक क्षेत्र में खुद की रक्षा करने की इच्छाशक्ति और क्षमता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक संकेत है। लेकिन इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा एक मोर्चे पर मजबूत और दूसरे पर कमजोर नहीं हो सकती, जो दुश्मन आसमान में भारत से मुकाबला नहीं कर सकता, वह नेटवर्क में अपनी पकड़ ढूंढेगा। जो देश अपनी सीमाएं सुरक्षित करता है लेकिन अपने अस्पतालों, बिजली ग्रिडों और वित्तीय प्रणालियों को कमजोर छोड़ देता है, उसने अपनी सुरक्षा समस्या केवल आधी सुलझाई है।
भारत के पास वास्तविक साइबर शक्ति बनाने की प्रतिभा, संस्थागत नींव और रणनीतिक प्रेरणा, तीनों मौजूद हैं। इस समय की मांग है कि ऑपरेशन सिंदूर में दिखाई गई तत्परता वही सटीकता, तैयारी और संकल्प, डिजिटल क्षेत्र में भी उसी गंभीरता के साथ उतारी जाए। पांचवां रणक्षेत्र तकनीशियनों की संकीर्ण चिंता नहीं है। यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की अगली निर्णायक चुनौती है और तैयारी की खिड़की अभी खुली है, अगले हमले के बाद नहीं, जब अपर्याप्त तैयारी की कीमत चुकानी पड़े। भारत ने दुनिया को दिखाया है कि जब वह तैयार होता है तो क्या कर सकता है। अब काम यह सुनिश्चित करना है कि यह तत्परता हर उस मोर्चे तक पहुंचे जहां भारत की सुरक्षा को सीधी चुनौती दी जा सकती है।
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