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उत्तराखंड: पहाड़ी राज्य में पहाड़ की खिसकती राजनीतिक शक्ति
सार
आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा संकट केवल पलायन का नहीं, बल्कि पलायन के कारण घटती जनसंख्या और उसके परिणामस्वरूप कम होती राजनीतिक ताकत का है। यदि समय रहते इस चुनौती को नहीं समझा गया तो आने वाले वर्षों में पहाड़ अपने ही राज्य में राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकता है।
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उत्तराखंड
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल उत्तर प्रदेश से अलग एक नया राज्य बनाने का आंदोलन नहीं था। इस आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा थी कि हिमालयी क्षेत्रों को अपनी राजनीतिक शक्ति मिले, अपने विकास की प्राथमिकताएं स्वयं तय करने का अधिकार मिले और पहाड़ की समस्याओं का समाधान पहाड़ की सोच के अनुरूप हो।
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अलग उत्तराखंड इसलिए मांगा गया था कि सत्ता के केंद्र में पहाड़ की आवाज पहुंचे, ताकि विकास का मॉडल मैदानों की आवश्यकताओं के बजाय पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार हो।
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दो दशक पहले राज्य निर्माण का यह सपना साकार हुआ, लेकिन आज विडंबना यह है कि वही पहाड़ धीरे-धीरे अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को खोने की कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है।
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आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा संकट केवल पलायन का नहीं, बल्कि पलायन के कारण घटती जनसंख्या और उसके परिणामस्वरूप कम होती राजनीतिक ताकत का है। यदि समय रहते इस चुनौती को नहीं समझा गया तो आने वाले वर्षों में पहाड़ अपने ही राज्य में राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकता है।
इसी गंभीर खतरे को सबसे पहले संगठित रूप से समाज के सामने रखने वालों में 'अपनी गणना अपने गांव' अभियान के मुख्य सूत्रधार एवं मुख्य संयोजक जोत सिंह बिष्ट प्रमुख हैं। उनका कहना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों की जनसंख्या लगातार घटती रही तो उत्तराखंड आंदोलन से प्राप्त राजनीतिक अधिकार भी धीरे-धीरे कमजोर होते जाएंगे।
जनगणना तय करती है सत्ता का गणित
भारत में जनगणना केवल आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है। यही वह आधार है, जिस पर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन होता है, पंचायतों और नगर निकायों का गठन तय होता है, केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले बजट का निर्धारण किया जाता है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, राशन, आंगनबाड़ी, विद्यालय और अनेक विकास योजनाओं का स्वरूप निर्धारित होता है। इसलिए जनगणना लोकतंत्र का आधार और विकास का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है।
उत्तराखंड राज्य बनने के समय विधानसभा की 70 सीटों का वितरण 1971 की जनसंख्या के आधार पर किया गया था। उस समय नौ पर्वतीय जिलों को 40 विधानसभा सीटें और चार मैदानी जिलों को 30 सीटें मिली थीं। वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन में यह संतुलन बदल गया।
पर्वतीय क्षेत्रों की सीटें घटकर 34 रह गईं, जबकि मैदानी जिलों की सीटें बढ़कर 36 हो गईं। 'अपनी गणना अपने गाँव' अभियान के अध्ययन के अनुसार यदि जनसंख्या की यही प्रवृत्ति आगे भी जारी रही तो भविष्य के परिसीमन में नौ पर्वतीय जिलों की सीटें घटकर लगभग 27 और चार मैदानी जिलों की सीटें बढ़कर 43 तक पहुंच सकती हैं।
यदि ऐसा हुआ तो इसका अर्थ केवल कुछ विधानसभा सीटों का कम होना नहीं होगा। इसका सीधा अर्थ होगा कि उत्तराखंड की नीतियों, बजट, विकास योजनाओं और राजनीतिक निर्णयों में पहाड़ की हिस्सेदारी लगातार कम होती जाएगी। विधानसभा में जितनी कम सीटें होंगी, उतनी ही कमजोर होगी पहाड़ की आवाज।
पलायन ने बदल दिया राजनीतिक भूगोल
उत्तराखंड के अधिकांश पर्वतीय जिलों में दशकों से पलायन जारी है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और बेहतर जीवन की तलाश में लाखों लोग मैदानों तथा देश के अन्य राज्यों में बस गए हैं। इसका प्रभाव अब गांवों की खाली होती चौपालों तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर सीधे-सीधे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर दिखाई देने लगा है।
2001 और 2011 की जनगणना के बीच अल्मोड़ा और पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों में जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक रही, जबकि देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में आबादी तेजी से बढ़ी। कई पर्वतीय गांवों की आबादी आज दो अंकों तक सिमट चुकी है।
यह केवल जनसांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि उत्तराखंड के बदलते राजनीतिक भूगोल की कहानी है। जनसंख्या घटने का असर केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहता। ग्राम पंचायतों के गठन, पंचायतों को मिलने वाले अनुदान, स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनबाड़ी, विद्यालयों, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, राशन और अनेक सरकारी योजनाओं का निर्धारण भी जनसंख्या के आधार पर किया जाता है।
अर्थात गांव की आबादी कम होगी तो विकास का हिस्सा भी कम होगा। विडंबना यह है कि पहाड़ का विकास रुकने से पलायन बढ़ता है और पलायन बढ़ने से विकास के संसाधन और कम हो जाते हैं। यही दुष्चक्र आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
'अपनी गणना अपने गाँव' क्यों जरूरी?
इसी चिंता से प्रेरित होकर 'अपनी गणना अपने गांव' अभियान शुरू किया गया। इसके मुख्य सूत्रधार एवं मुख्य संयोजक जोत सिंह बिष्ट का मानना है कि रोजगार या शिक्षा के लिए बाहर रहना किसी की मजबूरी हो सकती है, लेकिन यदि उत्तराखंड का प्रवासी समाज अपनी जन्मभूमि और अपनी जड़ों से जुड़ा है तो उसे जनगणना के समय अपने मूल गांव में अपनी गणना अवश्य करानी चाहिए।
जोत सिंह बिष्ट का तर्क है कि जनगणना केवल लोगों की गिनती नहीं, बल्कि भविष्य की विधानसभा सीटों, पंचायतों, बजट और विकास योजनाओं का आधार है। यदि प्रवासी उत्तराखंडी अपनी गणना अपने गांव में कराते हैं तो इससे पर्वतीय क्षेत्रों का वास्तविक जनसंख्या आधार सुरक्षित रहेगा और भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कमजोर होने की आशंका कम होगी।
अभियान का उद्देश्य किसी को स्थायी रूप से गांव लौटने के लिए बाध्य करना नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि उत्तराखंड का प्रवासी समाज अपने गांव से अपना लोकतांत्रिक रिश्ता बनाए रखे।
अभियान के तहत प्रवासियों से अपील की जा रही है कि जनगणना के दौरान वे अपने गांव पहुंचकर अपनी और अपने परिवार की गणना वहीं कराएं। यह अभियान केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का अभियान है। इसका उद्देश्य उत्तराखंड के भविष्य को सुरक्षित रखना है।
केवल जनगणना नहीं, भविष्य बचाने की लड़ाई
यह सही है कि उत्तराखंड की समस्याओं का स्थायी समाधान केवल जनगणना से नहीं होगा। इसके लिए रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, कृषि आधारित उद्योग, पर्यटन, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास मॉडल की आवश्यकता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व लगातार घटता गया तो इन समस्याओं के समाधान की आवाज भी कमजोर पड़ जाएगी।
जोत सिंह बिष्ट लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि उत्तराखंड आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि राजनीतिक प्रतिनिधित्व था। यदि वही प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगे तो राज्य निर्माण का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
उनके अनुसार 'अपनी गणना अपने गाँव' केवल जनगणना का अभियान नहीं, बल्कि उत्तराखंड के राजनीतिक भविष्य, लोकतांत्रिक अधिकारों और पर्वतीय अस्मिता की रक्षा का अभियान है।आज आवश्यकता इस बात की है कि इस विषय को केवल सरकारी प्रक्रिया समझकर न छोड़ा जाए। यह पूरे उत्तराखंड समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
जो लोग गांवों में रहते हैं और जो आजीविका के लिए बाहर हैं, दोनों की जड़ें एक ही मिट्टी से जुड़ी हैं। यदि गांव जनसंख्या के आंकड़ों से गायब होते गए तो आने वाले समय में वे राजनीतिक मानचित्र पर भी कमजोर पड़ जाएंगे।उत्तराखंड आंदोलन ने अलग राज्य दिया। अब उसे उसकी मूल भावना के साथ सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।
आने वाली जनगणना केवल आंकड़ों का संकलन नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि भविष्य के उत्तराखंड में पहाड़ की आवाज कितनी मजबूत रहेगी। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम केवल अपने पहाड़ों का भूगोल बचाना चाहते हैं, या उनका राजनीतिक भविष्य भी?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।