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परशुराम की पितृ-भक्ति की पराकाष्ठा, क्यों याद की जाती है ये कथा?
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विस्तार
भृगुवंशी महर्षि ऋचीक का विवाह राजा गाधि की कन्या सत्यवती से हुआ था। एक दिन सत्यवती ने ऋचीक से कहा, ‘स्वामी! मेरी माता और मैं, दोनों पुत्र प्राप्त करना चाहती हैं। कोई उपाय बताइए।’ यह सुनकर महर्षि ऋचीक ने यज्ञ किया और दो अलग-अलग पात्रों में अभिमंत्रित पायस तैयार किया। उन्होंने एक पात्र में ब्रह्मतेज प्रतिष्ठित किया और दूसरे पात्र में क्षात्रतेज का आह्वान किया। फिर वह सत्यवती से बोले, ‘ब्रह्मतेज वाला चरु तुम ग्रहण करना, और क्षात्रतेज वाला अपनी माता को देना।’किंतु, सत्यवती की माता ने चालाकी की और दोनों पात्रों की अदला-बदला कर दी। परिणामस्वरूप, सत्यवती ने क्षात्रतेज से युक्त गर्भ धारण किया, जबकि उसकी माता का गर्भ ब्रह्मतेज से युक्त हो गया। कुछ समय बाद उन दोनों के लक्षणों को देखकर ऋचीक ने सत्यवती से इसका कारण पूछा, तो उसने पूरी घटना बता दी। तब ऋचीक ने कहा, ‘तुमने बड़ी भूल की है। अब तुम्हारे गर्भ से क्षत्रिय पुत्र होगा और तुम्हारी माता ब्रह्मतेज-युक्त पुत्र को जन्म देंगी।’ यह सुनकर सत्यवती को बड़ा दुख हुआ। उसका दुख देखकर ऋचीक ने अपने तपोबल से कुछ परिवर्तन किया और बोले, ‘क्षात्रतेज का प्रभाव सत्यवती के पुत्र की अपेक्षा उसके पौत्र में प्रकट होगा!’
समय आने पर सत्यवती ने जमदग्नि को और उसकी माता ने विश्वामित्र को जन्म दिया। बाद में जमदग्नि का विवाह रेणुका से हुआ। जमदग्नि और रेणुका के चार पुत्र हुए-रुमण्वान, सुहोत्र, वसु और विश्वावसु। उसी दौरान भूदेवी, क्षत्रिय राजाओं के अत्याचारों से पीड़ित थी। उन्होंने भगवान विष्णु से मदद मांगी, तो विष्णु जी ने भूदेवी को आश्वासन दिया कि वह जमदग्नि के पुत्र के रूप में अवतार लेकर अधर्मी क्षत्रियों का विनाश करेंगे।
इस घटना के कुछ समय बाद रेणुका ने पुनः गर्भ धारण किया और विष्णु के अंशावतार परशुराम को जन्म दिया। पहले उस बालक का नाम ‘राम’ रखा गया था। वह असाधारण तेज, बल और प्रतिभा से संपन्न था। आगे चलकर राम ने परशु (फरसा) को अपना अस्त्र बनाया, इसलिए वह परशुराम के नाम से विख्यात हुए।
जब परशुराम लगभग चौदह वर्ष के थे, तो एक दिन रेणुका जल लेने नर्मदा नदी के तट पर गईं। उसी समय राजा चित्ररथ भी अपनी पत्नियों के साथ जलविहार कर रहे थे।
प्रेमी युगल को देखकर रेणुका के मन में क्षणभर के लिए आकर्षण और विकार उत्पन्न हो गया और उन्हें आश्रम लौटने में विलंब हो गया।
रेणुका जब लौटीं, तो जमदग्नि भी आश्रम में ही थे। योगबल से उन्होंने रेणुका की मन:स्थिति जान ली। रेणुका के मन में पर-पुरुष के प्रति आकर्षण का भाव देखकर जमदग्नि को क्रोध आ गया। उन्होंने तुरंत अपने सभी पुत्रों को आदेश दिया कि वे अपनी माता का वध कर दें! पहले चार पुत्रों ने पिता का आदेश मानने से मना कर दिया। परंतु, परशुराम सच्चे पितृभक्त थे और उनके आध्यात्मिक बल को भी जानते थे। उन्होंने पितृभक्ति की पराकाष्ठा लांघते हुए परशु उठाकर अपनी माता का सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर, पिता की आज्ञा न मानने के लिए अपने भाइयों को भी मार डाला। जब जमदग्नि का क्रोध शांत हुआ, तो उन्हें अपने प्रमाद पर दुख हुआ। उन्होंने परशुराम से कहा, ‘वत्स! मैं तुम्हारी पितृभक्ति से प्रसन्न हूं। वर मांगो।’ परशुराम ने अपनी माता और भाइयों को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा।’ जमदग्नि ने तत्काल अपने तपोबल से रेणुका और चारों पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया।
कुछ समय बाद माहिष्मती के राजा कार्त्तवीर्य अर्जुन के सैनिकों ने जमदग्नि के आश्रम पर हमला किया और ऋषि की हत्या कर दी। परशुराम से अर्जुन का अपराध सहन नहीं हुआ। उन्होंने समस्त क्षत्रियों का नाश करने की प्रतिज्ञा की। कहते हैं, परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन कर दिया था। इसी कारण, परशुराम की अद्वितीय पितृभक्ति की कथा सदैव याद की जाती है।