सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Playback Singer Suman Kalyanpur Dies at 89, The Voice Often Mistaken for Lata Mangeshkar

स्मृति शेष सुमन कल्याणपुर: सिने संगीत के स्वर्ण युग का आखिरी ‘सुमन’ भी मुरझा गया

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Mon, 01 Jun 2026 12:22 PM IST
विज्ञापन
सार

Suman Kalyanpur Passed Away: पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी सुरीली आवाज की तुलना अक्सर लता मंगेशकर से की जाती थी। इसके बावजूद वह बाॅलीवुड और मराठी गानों की एक यादगार विरासत छोड़कर गई हैं।

Playback Singer Suman Kalyanpur Dies at 89, The Voice Often Mistaken for Lata Mangeshkar
सुमन कल्याणपुर की खूबी और खामी यही थी कि उनकी आवाज गानसरस्वती लता मंगेशकर से काफी कुछ मिलती थी। - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार

Remembering Suman Kalyanpur: सुमन कल्याणपुर के रूप में भारतीय सिने संगीत के स्वर्णयुग का आखिरी सुमन भी मुरझा गया। सुमन जी ने 89 की उम्र में आखिरी सांस ली। लता-आशा जैसी महान और युगांतरकारी पार्श्व गायिकाओं के दौर में भी सुमन कल्याणपुर ने बिना किसी शिकवे-शिकायत के अपने गायन की स्वर्णरेखा को यथासंभव दमकाए रखा। हिंदी सिने संगीत की दुनिया में उनका सफर यूं तो फिल्म ‘नसीब’ में गाए गीत ‘जिंदगी इम्तिहान लेती है’ के साथ ही खत्म हो गया था। लेकिन मराठी और अन्य भाषाओं में वो बाद में भी गाती रहीं।



लता जी और सुमनजी की आवाज में समानता

सुमन कल्याणपुर की खूबी और खामी यही थी कि उनकी आवाज गानसरस्वती लता मंगेशकर से काफी कुछ मिलती थी। उनकी नाजुक, मंद हवा के झोंके-सी, मिठास भरी आवाज सुनकर कई बार धोखा होता है कि ये गीत लता जी ने गाया है या सुमन कल्याणपुर ने। बावजूद समकालीन होने की इस कठिन चुनौती के सुमन कल्याणपुर ने कई ऐसे गीत गाए हैं, जो सिर्फ उन्हीं के खाते में क्रेडिट होंगे। मसलन ‘बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जलाके’ (शगुन), ‘ मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा’ (नूरमहल), ‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है’ ( रेशम की डोरी), ‘नन्हीं सी परी मेरी लाड़ली’ (दिल एक मंदिर), ‘न तुम हमे जानो न हम तुम्हे जानें’ ( बात एक रात की), ‘यूं ही दिल ने चाहा था रोना- रूलाना, तेरी याद तो बन गई एक बहाना’ ( दिल ही तो है) आदि।
विज्ञापन
विज्ञापन


सुमन कल्याणपुर की मुश्किल यह थी कि उन्हें लता मंगेशकर रूपी सूर्य की छाया में ही रहना और बढ़ना था। यह काफी हद तक वट वृक्ष के नीचे वसंत खिलाने जैसी चुनौती थी। स्वयं लता जी के सक्रिय रहते, उन जैसी आवाज, जिस में सुमन जी की आवाज में महज 19-20 का फर्क हो, को लेकर आगे बढ़ना यानी 24 कैरेट सोने के साथ 22 कैरेट सोने के स्वर्णाभूषण को एक पलड़े में रखने जैसा था।
विज्ञापन
Trending Videos


गायन शैली और स्वर से धोखा खा जाते थे लोग

यह निर्विवाद है कि सुमन जी और लता जी के स्वर की बुनावट और गायन शैली में इतना महीन फर्क है कि अच्छे-अच्छे कानसेन भी धोखा खा जाएं। सुमन जी और लता जी के आवाज की रेंज का बहुत सूक्ष्म अंतर तार सप्तक में जाकर महसूस होता है। इस अनोखे स्वर-साम्य के बावजूद सुमन कल्याणपुर और लता जी में कहीं कोई सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं थी। क्योंकि सुमन कल्याणपुर ने 1954 से जब हिंदी फिल्मों में गाना शुरू किया तब लता जी सिने जगत में दिग्गज पार्श्व गायिका के रूप में स्थापित हो चुकी थीं और खुद सुमन कल्याणपुर अपने काॅलेज जीवन में मंच से लता जी के गाए गीत गाया करती थीं।

दोनों की उम्र में भी आठ साल का अंतर था। खुद सुमन कल्याणपुर ने भी कभी अपने को लता जी का प्रतिस्पर्धी नहीं माना। लेकिन उनकी आवाज सुनकर समीक्षकों ने उन्हें ‘प्रतिलता’ भी कहा। चूंकि लता जी के सुरों का जलवा अपने शबाब पर था, इसलिए सुमन कल्याणपुर के हिस्से में वो ही गीत आते थे, जो लता जी गाने से मना कर देती थीं या फिर उनकी तगड़ी फीस के चलते छोटे संगीतकार लता जी की जगह सुमन को ले लेते थे।

कहते हैं कि लता मंगेशकर 60 के दशक में प्रति गाना 100 रू. चार्ज करती थीं, जो उस समय के हिसाब से बड़ी रकम थी। साठ के दशक के अंत में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच पार्श्वगायकों को राॅयल्टी देने के सवाल पर हुए बहुचर्चित विवाद के बाद दोनों ने कुछ समय के लिए साथ गाना बंद कर दिया था। ऐसे में संगीतकारों ने लता की आवाज की पूर्ति सुमन कल्याणपुर के स्वर से की।

सुमन जी ने सबसे ज्यादा 137 गाने मोहम्मद रफी के साथ गाए। जिनमें ‘दिल एक मंदिर है..’ ( दिल एक मंदिर), आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर ‘ (ब्रह्मचारी),’ ‘नाना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे’ ( जब-जब फूल खिले), ‘तुमने पुकारा और हम चले आए’ (राजकुमार),( पर्बतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, सुरमई उजाला है, चंपई अंधेरा है’(शगुन) आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

सुमन जी ने अपने समय के लगभग सभी बड़े पार्श्वगायकों के साथ गाया। उनमें मुकेश के साथ ‘मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है’ (साथी), ये किसने गीत छे़ड़ा’ ( मेरी सूरत तेरी आंखें), या मन्ना डे के साथ ‘तुम जो आ जाए तो प्यार आ जाए’ (सखी रोबिन), ‘न जाने कहां तुम थे, न जाने कहां हम थे ( जिंदगी और ख्वाब)’ फिर किशोर कुमार के साथ ‘ तेरा मेरा, मेरा तेरा मिल गया दिल-दिल से..’ (नागिन) आदि।फिल्म ‘गंगा की लहरें’ का अमर भजन ‘जय जय हे जगदम्बे माता, द्वार तिहारे जो भी आता, बिन मांगे सब कुछ पा जाता’ भी सुमन कल्याणपुर ने ही गाया है और इसे लिखा था शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने।

करियर का पहला गाना

सुमन कल्याणपुर ने अपना पहला फिल्मी गीत जाने माने पार्श्वगायक तलत महमूद के साथ 1954 में फिल्म ‘दरवाजा’ के लिए रिकॉर्ड किया था। लेकिन सुमन जी को शोहरत 60 के दशक की शुरुआत से मिलनी शुरू हुई। कई बड़े संगीतकारों ने उनकी आवाज का अपने कंपोजिशन में बेहतरीन उपयोग किया। सुमन कल्याणपुर ने हिंदी के अलावा मराठी में भी बहुत से कालजयी गीत गाए हैं। खासकर उनके गाए कई गैर फिल्मी भावगीत मराठी सुगम संगीत की अनमोल थाती हैं। इसके अलावा बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं के गीतों को उन्होंने स्वर दिया है।

सुमन कल्याणपुर के व्यक्तित्व की खूबी यही है कि एक उत्कृष्ट पार्श्व गायिका के रूप में उन्होंने अपनी साधना खामोशी के साथ जारी रखी। बिना किसी दौड़ में शामिल हुए बिना कुछ कुछ स्वांत: सुखाय सी।एक सच्ची कला साधक के रूप में सुमन कल्याणपुर समय की स्लेट पर अपनी रेखा बड़ी करती रहीं।

खास बात यही है कि उनकी आवाज लता जी जैसी होते हुए भी वो लता मंगेशकर की नकल करती नहीं लगतीं। वैसा ही माधुर्य, वैसी ही गहराई और वैसा ही जज्बा। भले ही सुनने वाले के कानों को धोखा हो जाए। अगले ही क्षण वो सावधान हो जाए कि यह लता नहीं, सुमन है।

लता जी से कुछ ही मुलाकातें

कहते हैं लता जैसी आवाज की धनी होते हुए भी सुमन जी और लता जी की सीधी भेंट पांच-छह बार ही हुई और वो भी बहुत थोड़े समय के लिए। सुमन कल्याणपुर अपनी इस सफल संगीत यात्रा का श्रेय अपने पिता शंकरराव हेमाडी और पति को देती थीं। कहते हैं कि अपनी पत्नी के करियर के लिए उनके पति रामानंद कल्याणपुर ने अपने बिजनेस को भी दांव पर लगा दिया था। सुमन कल्याणपुर का गाया फिल्म ‘शमा’ का एक मशहूर गीत है ‘दिल गम से जल रहा है, जले पर धुआं न हो, कोई इम्तिहां न हो।’

कई पुरस्कारों से हुईं विभूषित

पार्श्वगायन की प्रतिस्पर्धी दुनिया में सुमन जी ने जो भी गाया, दिल से गाया। शोहरत की बुलंदियों की अग्रिम पंक्ति में जगह न मिलने का गम दिल के किसी कोने में भले रहा हो, लेकिन वो कभी जुबां पर नहीं आया। सुमन कल्याणपुर को पार्श्वगायन में उनके विशिष्ट योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और महाराष्ट्र सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘महाराष्ट्र भूषण’ से उन्हें विभूषित किया।

सुमन कल्याणपुर का सफर

सुमन कल्याणपुर का मोहम्मद रफी और मुकेश के साथ गाया एक दर्द भरा गीत है ‘दिल ने फिर याद किया, बर्क़ सी लहराई है। फिर कोई चोट मुहब्बत की उभर आई है।‘’ इसी गीत में सुमनजी की दिल चीरती आवाज में ये पंक्ति है ‘ क्या बताएं तुम्हें हम शम्मा की किस्मत क्या है, गम में जलने के सिवा और मुहब्बत क्या है..’।‘

यह दर्द उस फिल्म की नायिका का ही नहीं, शायद उस पार्श्वगायिका का भी है, जिसकी किस्मत में सिने संगीत की सल्तनत में वो ओहदा शायद नहीं लिखा था, जिसकी वो हकदार थीं। लेकिन फिल्मी और असल हीरोइन में फर्क यही है कि असल जिंदगी की सुमन कल्याणपुर जैसी गंधर्व गायिका अपनी सीमाओं को भी अपनी ताकत बना लेती हैं। सुमन कल्याणपुर ने यही किया। उनके नाम पर सिने पार्श्वगायन का युग भले दर्ज न हो, लेकिन उस युग में उन्होंने अपना योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

--------------------------------------

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed