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विश्व साहित्य का आकाश: शरत का स्वतंत्रता का दावा
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सार
हिन्दी भाषियों के लिए शरत् उनके बेहद अपने हैं, उनकी आधिकारिक जीवनी किसी बांग्ला लेखक ने नहीं बल्कि हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकार विष्णु प्रभाकर ने लिखी है। जीवन भर भटकने वाले लेखक की जीवनी केलिए विष्णु प्रभाकर भी खूब भटके, अंतत: ‘आवारा मसीहा’ जैसी अप्रतिम जीवनी लिखी।
शरत् चंद्र और उनकी रचनाएं
- फोटो : Freepik.com
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विस्तार
शरत् चंद्र की ख्याति एक भावुक लेखक के रूप में है, जो स्त्रियों और गरीबों का चित्रण कर पाठक को खूब रुलाते हैं। इसमें शक नहीं नारी हृदय के बेजोड़ चितेरा हैं शरत् चट्टोपाध्याय। कदाचित हिन्दी का कोई पाठक होगा जिसने शरत् को न पढ़ा हो, भले ही उसने हिन्दी के उपन्यास पढ़ें हों, न पढ़े हों।
हिन्दी भाषियों के लिए शरत् उनके बेहद अपने हैं, उनकी आधिकारिक जीवनी किसी बांग्ला लेखक ने नहीं बल्कि हिन्दी के प्रतिष्ठित रचनाकार विष्णु प्रभाकर ने लिखी है। जीवनभर भटकने वाले लेखक की जीवनी के लिए विष्णु प्रभाकर भी खूब भटके, अंतत: ‘आवारा मसीहा’ जैसी अप्रतिम जीवनी लिखी।
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देवदास उपन्यास
शरत् चंद्र की पहचान बना उनका ‘देवदास’ जिस पर अब तक कई फिल्में बन चुकी हैं। उनकी ‘बिराज बहु’, ‘बड़ी दीदी’, ‘चरित्रहीन’, ‘गृहदाह’, ‘श्रीकांत’ और ‘शेष प्रश्न’ की खूब चर्चा होती है। मगर उन्होंने एक और खास किताब लिखी है, जिसका कथानक इन उपन्यासों से बिल्कुल भिन्न है, सामाजिक राजनैतिक है।
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15 सितम्बर 1876 को देबानंदपुर में मोती लाल चट्टोपाध्याय एवं भुवनमोहिनी के घर जन्मे शरत् चंद्र के भीतर देश प्रेम की ज्वाला थी। वे रंगून (बर्मा) और भारत में आवाजाही के दौरान विप्लवियों के संपर्क में थे। सामाजिक उपन्यास लेखक राजनैतिक रूप से भी खूब जागरुक था। शरत् देश की गरीबी, विस्थापन से खूब परिचित थे। सदा जीवन का अर्थ जानने केलिए बेचैन रहते थे।
स्वतंत्रता उन्हें बहुत प्रिय थी। वे व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता के साथ संपूर्ण मानव की स्वतंत्रता का स्वप्न देखते थे। 1857 की क्रांति उनके जन्म के मात्र दो दशक पहले ही हुई थी। भले ही यह क्रांति सफल नहीं हुई, मगर स्वतंत्रता की ललक देश में चारों ओर जोर-शोर से हिलोर ले रही थी।
इस ललक को शरत् ने शब्द दिए अपनी किताब ‘पथेर दाबी’ (राह का दावा या मांग) में। 16 जनवरी 1938 को गुजरे शरत के करीब नब्बे वर्ष बाद भी उनकी इस किताब को याद करना, पढ़ना अर्थपूर्ण है। खासकर आज के संदर्भ में जब राष्ट्रीयता, देश प्रेम, सांस्कृतिक अस्मिता, ‘वंदे मातरम्’ को लेकर चारो ओर हो-हल्ला मचा हुआ है। ‘पथेर दाबी’ उपन्यासकार शरत् का विप्लवी कार्य है।
उपन्यास में उन्होंने नायक सव्यसाची को स्वतंत्रता केलिए अपना सब कुछ बलिदान करते दिखाया है। बर्मा-भारत के एक गुप्त विद्रोही संगठन का मुख्य नेता सव्यसाची विप्लवी है, मगर वह मारकाट द्वारा परिवर्तन में विश्वास नहीं करता है, मात्र सत्ता परिवर्तन नहीं चाहता है। सव्यसाची केलिए विप्लव का मतलब है, संपूर्ण परिवर्तन।
1926 में प्रकाशित ‘पथेर दाबी’
‘बंगबनी’ पत्रिका में शृंखलारूप में प्रकाशित ‘पथेर दाबी’ जब किताब बन कर आई, उस समय देश अंग्रेजों के जुल्म में पिस रहा था। गरीबी चरम पर थी। सत्ता कभी अपनी आलोचना सहन नहीं कर सकती है और 1926 में प्रकाशित ‘पथेर दाबी’ में सिलसिलेवार एवं तर्कपूर्ण ढ़ंग से दिखाया गया है कि जिस नैतिकता की दुहाई देकर ब्रिटिश शासन कर रहे हैं, वह दावा कितना खोखला है।
शरत् यहां विद्रोह की नैतिकता और अर्थ पर भी प्रश्न उठाते हैं। शरत् बेचैन करने वाले प्रश्न उठाते हैं, मगर सरल समाधान प्रस्तुत नहीं करते हैं। हल प्रस्तुत करना उपन्यासकार का दायित्व नहीं है। यह काम वह पाठक पर छोड़ता है।
सामाजिक यथार्थ एवं गहन भावनाओं द्वारा शरत् एक ऐसे नायक सव्यसाची को खड़ा करते हैं, जो बहुत बुद्धिमान है, देशभक्ति से ओतप्रोत है, बहुभाषीय है। सव्यसाची वेश बदलने में भी पारंगत है, अत: अंग्रेज अधिकारियों की आंख में धूल झोंक कर वह उनकी नाक के ठीक नीचे अपना संगठन चलाता रहता है। वह लोगों के अपना निर्णय लेने का पक्षधर है।
उपन्यासकार उसे देवता नहीं बनाता है। वह मनुष्य है, उसमें विरोधाभास और कमजोरियां हैं। वह अतिचारी नहीं है, बल्कि समझदार, अनुशासित विप्लवी व्यक्ति है। हां सव्यसाची अपने आदर्श की कीमत चुकाता है, बुद्धिमान नायक का अपने उद्देश्य के प्रति संपूर्ण समर्पण है, इस कारण वह अकेला है, उसे अपनी कोमल भावनाओं को दबाना पड़ता है।
दमन नीति पर काम करने वाले सत्ताधारियों को ऐसे असुविधाजनक प्रश्न पूछने वाला कार्य भला कैसे अच्छा लगता? शरत् जानते थे, शब्दों से हथियार का काम लिया जा सकता है। ‘शब्द बम’ की चुनौती ने अंग्रेजों को तत्काल कार्यवाही करने को तैयार किया। उन्हें हथियारबंद विद्रोह से अधिक परेशानी ‘पथेर दाबी’ किताब से हुई और अपनी शक्ति-सत्ता स्थापित करते हुए ब्रिटिश सरकार ने किताब ‘पथेर दाबी’ कानूनन प्रतिबंधित कर दी।
जैसा कि प्रतिबंधित किताबों के साथ होता है, ‘पथेर दाबी’ का प्रभाव-प्रचार और बढ़ा। यह चोरी-छिपे खूब पढ़ी जाने लगी। विशेष रूप से विप्लवी संगठनों में इसका पठन और चर्चा होने लगी। युवा स्वतंत्रता सैनानियों ने इसे न केवल साहित्यिक कृति के रूप में ग्रहण किया वरन यह उनके लिए प्रेरक बन गई। सव्यसाची उनके लिए निर्भय विद्रोही आदर्श नायक बन गया।
अभी कहीं पढ़ा बांग्ला निर्देशक सुजित मुखर्जी इस पर फिल्म बनाने वाले हैं। वे अच्छे निर्देशक हैं, आशा है, फिल्म अच्छी बनेगी। मगर मैंने 1977 में करीब ढ़ाई घंटे की बांग्ला फिल्म देखी है। फिल्म इसी ‘पथेर दाबी’ पर आधारित है, मगर फिल्म का नाम नायक के नाम पर ‘सव्यसाची’ है। इसे पियुष बोस ने निर्देशित किया है, स्क्रीनप्ले भी उन्होंने ही लिखा है।
नायक सव्यसाची की भूमिका उत्तम कुमार ने की है। कवि शशि तरुण कुमार चटर्जी बने हैं। साथ में अनिल चटर्जी (ब्रजेंद्र), सुप्रिया चौधुरी (रोज दाउद), किरण लाहिरी, जयश्री राय, सुलता चौधुरी आदि हैं। फिल्म के कई फ्रेम में पृष्ठभूमि में विवेकानंद की फोटो है, पार्श्व में वंदे मातरम् के नारे हैं। फिल्म करिश्मैटिक, आवेशित स्वतंत्रता सैनानी को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करते दिखाती है।
अंत की ओर आते हुए फिल्म में सव्यसाची कवि से कहता है, तुम विप्लव गीत गाओ, मनुष्य के दुख:-दर्द, कष्ट का गान करो। फिल्म का संदेश है, ‘तब तक न रुको, जब तक समस्त मानव मुक्ति न हो जाए।’
शरत् के समस्त साहित्यिक कार्य में ‘पथेर दाबी’ बिल्कुल भिन्न है। यह राजनैतिक उपन्यास ब्रिटिश सरकार केलिए खुली चुनौती थी। उन्हें मनोविज्ञान का ज्ञान था वे दिखाते हैं कैसे उपनिवेशवाद ने आत्म-सम्मान पोंछ डाला था, भारतीयों में खुद को लेकर हीन भावना भर दी थी। उन्होंने देश के लोगों को आपस में लड़ाया और उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध अविश्वास से भर दिया था।
यह उपन्यास शरत् की राजनैतिक आस्था की आंतरिक ज्वाला का उदाहरण है। यह उपन्यास मात्र प्रोपगंडा नहीं है, इसे गंभीर साहित्य की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
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