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जीवन धारा: हमारे भीतर भी ब्रह्मांड रहता है, सूत्र- ज्ञान की लौ को जीवित रखिए

कार्ल सेगन Published by: Pavan Updated Mon, 01 Jun 2026 08:12 AM IST
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सार

केवल आप ब्रह्मांड में नहीं रहते, ब्रह्मांड भी आपके भीतर रहता है। और जब आप प्रश्न पूछते हैं, प्रेम करते हैं, खोजते हैं, तब यह विराट ब्रह्मांड पहली बार अपनी ही आंखों में देखना शुरू करता है।

The universe lives within us too, Sutra – keep the flame of knowledge alive
हमारे भीतर भी ब्रह्मांड रहता है - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

जब हम रात में तारों को टिमटिमाते देखते हैं, तो लगता है कि हम उनसे अलग हैं, पृथ्वी पर रहने वाले छोटे, सीमित और क्षणभंगुर जीव। लेकिन विज्ञान ने हमें एक अत्यंत विनम्र और साथ ही सबसे महान सत्य बताया है और वह यह कि हम उससे अलग नहीं हैं। हम उसी ब्रह्मांड की संतान हैं, जिसे हम देख रहे हैं। हमारे शरीर का हर परमाणु कभी किसी तारे के भीतर ही जन्मा था। हमारे रक्त का लौह, हड्डियों का कैल्शियम, हमारे मस्तिष्क के भीतर बहती बिजली की तरंगें ये सब उन तारों की अग्नि में बनी थीं, जिनका जन्म अरबों साल पहले विस्फोटों में हुआ था।


इस अर्थ में, मनुष्य केवल पृथ्वी का प्राणी नहीं है, वह तारों की धूल है, जिसने सोचने की क्षमता प्राप्त कर ली। और यही वह क्षण है, जहां ब्रह्मांड एक अद्भुत मोड़ लेता है। अरबों वर्षों तक आकाशगंगाएं घूमती रहीं। तारे जन्म लेते और मरते रहे। लेकिन कहीं कोई ऐसा नहीं था, जो कुदरत के इस विराट नाटक को देख सके, उससे प्रश्न पूछ सके। फिर एक छोटे से ग्रह पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न हुआ। धीरे-धीरे उस जीवन ने आंखें विकसित कीं, ताकि वह प्रकाश को देख सके। उसने मस्तिष्क विकसित किया, ताकि स्मृति बना सके, कल्पना कर सके व अंततः प्रश्न पूछ सके। और जब पहली बार किसी मानव ने पूछा होगा कि ये तारे क्या हैं? उसी क्षण ब्रह्मांड ने स्वयं को जानने की प्रक्रिया आरंभ कर दी।
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ब्रह्मांड के महासागर में पृथ्वी एक धूल-कण से ज्यादा कुछ नहीं है और मनुष्य उस धूल-कण पर कुछ क्षणों के लिए प्रकट होने वाली चेतना की चमक मात्र है। एक पुस्तकालय की कल्पना कीजिए, जो असंख्य पुस्तकों से भरा हो। अधिकांश पुस्तकें कभी पढ़ी नहीं गईं, लेकिन अचानक एक दिन उन पुस्तकों के भीतर से ही कुछ अक्षर जीवित हो जाएं और पढ़ना शुरू कर दें। यही हम हैं। जब कोई खगोलशास्त्री दूरस्थ आकाशगंगाओं की छवियां देखता है, तब यह उस अद्भुत तथ्य को स्वीकार करने की भी यात्रा है कि ब्रह्मांड ने स्वयं के भीतर ऐसी चेतना उत्पन्न की, जो उससे प्रश्न पूछ सकती है।
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यदि हम वास्तव में ब्रह्मांड की वह चेतना हैं, जो स्वयं को समझना चाहती है, तो हमें अपनी इस दुर्लभ क्षमता की रक्षा करनी चाहिए। हमें अज्ञान, कट्टरता व हिंसा से ऊपर उठना होगा। हमारा अस्तित्व अत्यंत दुर्लभ हो सकता है। हो सकता है कि इस विशाल ब्रह्मांड में अनगिनत तारे हों, लेकिन चेतना बहुत कम जगहों पर जन्म लेती हो। यदि ऐसा है, तो हर विचारशील मन ब्रह्मांड की सबसे मूल्यवान उपलब्धियों में से एक है। इसलिए जब अगली बार आप रात के आकाश को देखें, तो स्वयं को अकेला मत समझिए। आप उसी कहानी का हिस्सा हैं, जिसे तारे अरबों वर्षों से लिख रहे हैं। आप केवल ब्रह्मांड में नहीं रहते। ब्रह्मांड भी आपके भीतर रहता है। और जब आप प्रश्न पूछते हैं, प्रेम करते हैं, खोजते हैं, तब यह विराट ब्रह्मांड पहली बार, अपनी ही आंखों में देखना शुरू करता है।

सूत्र- ज्ञान की लौ को जीवित रखिए
आप तारों को निहारने वाला एक साधारण जीव नहीं, बल्कि उन्हीं तारों की धूल से बनी वह चेतना हैं, जिसने स्वयं ब्रह्मांड को समझने का साहस पाया है; इसलिए अपने भीतर जिज्ञासा, करुणा, प्रेम और ज्ञान की लौ को जीवित रखिए।  जब आप प्रश्न पूछते हैं, सत्य की खोज करते हैं, सपने देखते हैं, तो मानवता को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं।
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