{"_id":"6a2a18588609f2505701ee40","slug":"the-greatest-tragedy-is-the-death-of-hope-it-is-life-blog-philosophy-2026-06-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"सबसे बड़ी त्रासदी आशा का मर जाना है: उम्मीद ही जीवन है","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
सबसे बड़ी त्रासदी आशा का मर जाना है: उम्मीद ही जीवन है
चार्ल्स डिकेंस
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 11 Jun 2026 07:37 AM IST
विज्ञापन
सार
जब मनुष्य अपने भविष्य से विश्वास खो देता है, उसी क्षण उसके भीतर का सबसे सुंदर भाग मरने लगता है। जो मनुष्य संसार की सारी कठिनाइयों के बावजूद दया करना नहीं छोड़ता, उसके भीतर आशा का स्रोत कभी नहीं सूखता।
ब्लॉग
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
विस्तार
हर मनुष्य के जीवन में ऐसा वक्त भी आता है, जब उसे लगता है कि संसार की सारी रोशनियां बुझ चुकी हैं। सड़कें वही रहती हैं, इमारतें-मकान भी वही रहते हैं, लोग भी वही दिखाई देते हैं, लेकिन आत्मा के भीतर एक लंबी, ठंडी और सुनसान रात उतर आती है। उस समय ऐसा लगता है, मानो दुख ने समय को रोक दिया हो और भविष्य केवल धुंध से भरा एक वीरान रास्ता हो, जहां कदमों की आहट तक नहीं सुनाई देती। मैंने ऐसे चेहरे देखे हैं, जिन पर भूख ने समय से पहले बुढ़ापा लिख डाला था। मैंने उन लोगों को भी देखा है, जो भीड़ भरी सड़कों पर चलते हुए इतने अकेले थे कि उनकी आत्मा का मौन किसी कब्रिस्तान से भी ज्यादा डरावना लगता था। और फिर भी, इन सबके बीच मैंने जिसे जीवित पाया, जिसे कोई कैद नहीं कर सका, गरीबी उसे नष्ट नहीं कर सकी, वह थी- आशा, उम्मीद।
आशा तूफानों को रोकती नहीं, लेकिन मनुष्य के भीतर इतना साहस निश्चित जगा देती है कि वह तूफान के बीच भी एक और कदम बढ़ा सके। संसार के सबसे अंधकारपूर्ण क्षणों में आशा किसी विजेता की तरह नहीं आती, वह एक छोटी-सी मोमबत्ती की तरह आती है, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि अंधकार सर्वशक्तिमान नहीं है। मैंने हमेशा माना है कि संसार की सबसे बड़ी त्रासदी गरीबी नहीं, बल्कि आशा का मर जाना है। एक गरीब मनुष्य भी जीवित रह सकता है, यदि उसके भीतर यह विश्वास बचा हो कि आने वाला दिन आज से बेहतर हो सकता है। किंतु जिस क्षण मनुष्य अपने भविष्य से विश्वास खो देता है, उसी क्षण उसके भीतर का सबसे सुंदर भाग धीरे-धीरे मरने लगता है। जो मनुष्य संसार की सारी कठिनाइयों के बावजूद दया करना नहीं छोड़ता, उसके भीतर आशा का स्रोत कभी नहीं सूखता। संसार पूर्ण नहीं है। यहां अन्याय, अभाव, छल, कुटिलता आदि सब हैं, और ऐसी पीड़ाएं भी हैं, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
कई बार लगता है, मानो बुराई की शक्ति अच्छाई से कहीं अधिक प्रबल हो गई है। लेकिन यदि ऐसा वास्तव में होता, तो अब तक मनुष्य जाति का अस्तित्व समाप्त हो चुका होता। सभ्यता इसलिए जीवित रही, क्योंकि हर युग में कुछ लोगों ने अंधकार के सामने घुटने टेकने से इन्कार कर दिया। कभी-कभी जीवन हमें लंबी सर्दियों से गुजारता है, ताकि हम वसंत का वास्तविक अर्थ समझ सकें। यदि मनुष्य ने दुख न देखा होता, तो वह करुणा का मूल्य नहीं समझ पाता। यदि उसने अकेलापन नहीं झेला होता, तो प्रेम की ऊष्मा इतनी अमूल्य न लगती। और यदि उसने अंधकार का अनुभव न किया होता, तो वह एक छोटी-सी रोशनी के चमत्कार को कभी नहीं पहचान पाता। इसलिए जब भी जीवन आपको यह विश्वास दिलाने लगे कि सब कुछ समाप्त हो चुका है, तब याद रखिए कि रात चाहे कितनी भी लंबी हो, वह सुबह को रोक नहीं सकती। मनुष्य बार-बार टूटा है और फिर उठ खड़ा हुआ है। यही उसकी सबसे बड़ी महिमा है।
विज्ञापन
विश्वास को जीवित रखें
जीवन के अभावों के बीच जब भविष्य धुंधला लगने लगे, तब अंतरात्मा में जलती ‘आशा’ की वह छोटी-सी मोमबत्ती ही हमारे भीतर का साहस जगाती है। तमाम अन्यायों व छल के बावजूद यदि हम दया, करुणा और विश्वास को जीवित रखें, तो रात चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो, वह आने वाली अलौकिक सुबह और वसंत के नए उजाले को कभी नहीं रोक सकती।
आशा तूफानों को रोकती नहीं, लेकिन मनुष्य के भीतर इतना साहस निश्चित जगा देती है कि वह तूफान के बीच भी एक और कदम बढ़ा सके। संसार के सबसे अंधकारपूर्ण क्षणों में आशा किसी विजेता की तरह नहीं आती, वह एक छोटी-सी मोमबत्ती की तरह आती है, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि अंधकार सर्वशक्तिमान नहीं है। मैंने हमेशा माना है कि संसार की सबसे बड़ी त्रासदी गरीबी नहीं, बल्कि आशा का मर जाना है। एक गरीब मनुष्य भी जीवित रह सकता है, यदि उसके भीतर यह विश्वास बचा हो कि आने वाला दिन आज से बेहतर हो सकता है। किंतु जिस क्षण मनुष्य अपने भविष्य से विश्वास खो देता है, उसी क्षण उसके भीतर का सबसे सुंदर भाग धीरे-धीरे मरने लगता है। जो मनुष्य संसार की सारी कठिनाइयों के बावजूद दया करना नहीं छोड़ता, उसके भीतर आशा का स्रोत कभी नहीं सूखता। संसार पूर्ण नहीं है। यहां अन्याय, अभाव, छल, कुटिलता आदि सब हैं, और ऐसी पीड़ाएं भी हैं, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
विज्ञापन
विज्ञापन
कई बार लगता है, मानो बुराई की शक्ति अच्छाई से कहीं अधिक प्रबल हो गई है। लेकिन यदि ऐसा वास्तव में होता, तो अब तक मनुष्य जाति का अस्तित्व समाप्त हो चुका होता। सभ्यता इसलिए जीवित रही, क्योंकि हर युग में कुछ लोगों ने अंधकार के सामने घुटने टेकने से इन्कार कर दिया। कभी-कभी जीवन हमें लंबी सर्दियों से गुजारता है, ताकि हम वसंत का वास्तविक अर्थ समझ सकें। यदि मनुष्य ने दुख न देखा होता, तो वह करुणा का मूल्य नहीं समझ पाता। यदि उसने अकेलापन नहीं झेला होता, तो प्रेम की ऊष्मा इतनी अमूल्य न लगती। और यदि उसने अंधकार का अनुभव न किया होता, तो वह एक छोटी-सी रोशनी के चमत्कार को कभी नहीं पहचान पाता। इसलिए जब भी जीवन आपको यह विश्वास दिलाने लगे कि सब कुछ समाप्त हो चुका है, तब याद रखिए कि रात चाहे कितनी भी लंबी हो, वह सुबह को रोक नहीं सकती। मनुष्य बार-बार टूटा है और फिर उठ खड़ा हुआ है। यही उसकी सबसे बड़ी महिमा है।
विश्वास को जीवित रखें
जीवन के अभावों के बीच जब भविष्य धुंधला लगने लगे, तब अंतरात्मा में जलती ‘आशा’ की वह छोटी-सी मोमबत्ती ही हमारे भीतर का साहस जगाती है। तमाम अन्यायों व छल के बावजूद यदि हम दया, करुणा और विश्वास को जीवित रखें, तो रात चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो, वह आने वाली अलौकिक सुबह और वसंत के नए उजाले को कभी नहीं रोक सकती।