यशवंतराव केलकर: एक संगठन शिल्पी जो संरचनात्मक दृष्टि से देखता रहा समाज
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) का कार्य प्रारंभ में मुंबई और कुछ प्रमुख केंद्रों तक सीमित था। प्रो. केलकर ने मुंबई से शुरू करके इसे महाराष्ट्र और फिर पूरे देश में फैलाया।
विस्तार
25 अप्रैल 1925 को महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पंढरपुर में वासुदेव राव केलकर के घर जन्मे प्रोफेसर यशवंत वासुदेव राव केलकर (25 अप्रैल 1925 - 6 दिसंबर 1987) जन्मशताब्दी वर्ष में विशेष रूप से याद किए जा रहे हैं। स्वाधीन भारत में युवा शक्ति को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की दिशा देने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) को आधुनिक रूप देने वाले प्रमुख शिल्पी के रूप में वे जाने जाते हैं।
1947 में स्वाधीनता मिलने के बाद भारत के सामने युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने की चुनौती थी। इसी संदर्भ में 1948 में अभाविप की यात्रा शुरू हुई और 9 जुलाई 1949 को इसका औपचारिक पंजीकरण हुआ। प्रारंभ में सीमित स्तर पर कार्य करने वाला यह संगठन प्रो. केलकर के कुशल नेतृत्व और अथक प्रयासों से विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन बन सका। वे संस्थापक नहीं थे, लेकिन संगठन को अखिल भारतीय स्तर पर मजबूत कार्यपद्धति, कार्यकर्ता निर्माण और राष्ट्रीय दृष्टि प्रदान करने वाले वास्तुकार अवश्य थे।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
पंढरपुर के पावन तीर्थ क्षेत्र में जन्मे यशवंतराव बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, परिश्रमी, हंसमुख और स्मरण शक्ति से संपन्न थे। तीसरी कक्षा में उन्हें छात्रवृत्ति मिली और मैट्रिक में संस्कृत विषय में अच्छे अंक प्राप्त करने पर भी छात्रवृत्ति हासिल हुई। लोकमान्य विद्यालय से एसएससी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने पुणे के एस.पी. महाविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक किया।
इधर बाद में उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक किया और स्वर्णपदक प्राप्त किया। छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गए। 1945 से 1952 तक वे नासिक और सोलापुर जिले में संघ के प्रचारक रहे। प्रचारक जीवन के दौरान उन्होंने समाज से गहरा संपर्क स्थापित किया, जो बाद में संगठन कार्य में उनकी मजबूत नींव बना।
प्रचारक कार्य से वापसी के बाद 1956 में उन्होंने मुंबई के नेशनल कॉलेज, बांद्रा में अंग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में कार्य शुरू किया। उनकी पत्नी प्रो. शशिकला केलकर भी अंग्रेजी की प्राध्यापिका थीं। दंपत्ति के तीन पुत्र हैं, जो अच्छी शिक्षा से सुसज्जित हैं। संघ की योजना के अनुसार 1958-59 में उन्हें अभाविप का दायित्व सौंपा गया।
अभाविप के संगठन शिल्पी
अभाविप का कार्य प्रारंभ में मुंबई और कुछ प्रमुख केंद्रों तक सीमित था। प्रो. केलकर ने मुंबई से शुरू करके इसे महाराष्ट्र और फिर पूरे देश में फैलाया। उन्होंने पहले मुंबई पर ध्यान केंद्रित किया, जहां पद्मनाभ आचार्य, बाल आप्टे, मदन दास, वैशंपायन, दिलीप परांजपे जैसे कार्यकर्ता तैयार हुए। फिर महाराष्ट्र के विभिन्न विद्यापीठों में कार्यकर्ताओं को भेजकर संगठन का विस्तार किया। नागपुर से दत्ताजी डिंडोलकर जैसे विद्वान प्रचारक के सहयोग से अभाविप का अखिल भारतीय विस्तार मजबूत हुआ। अन्य सहयोगियों में गोविंदाचार्य, रामबहादुर राय, महेश जी, प्रो. शेषगिरी राव, कृष्ण भट्ट, ओम प्रकाश कोहली आदि शामिल रहे। 1967-68 में वे अभाविप के अखिल भारतीय अध्यक्ष भी रहे।
उसी वर्ष उन्होंने ‘अंतरराज्य छात्र जीवन दर्शन’ (SEIL) की स्थापना की और इसके संस्थापक अध्यक्ष बने। बाद में 1981 में स्थापित ‘विद्यार्थी निधि’ के भी वे संस्थापक अध्यक्ष रहे। उनकी कार्यशैली की विशेषता थी - “हम सब अपूर्णांक हैं और मिलकर पूर्णांक बनते हैं। सभी अपूर्णांक समान महत्व के होते हैं।”
वे मानते थे कि कोई कार्यकर्ता अधिक या कम महत्वपूर्ण नहीं होता। कार्यकर्ता को मनुष्य के रूप में समझना, उसकी क्षमताओं का विकास करना और उसे प्रेरणा से भरना उनकी कार्यकर्ता-संभाल की आधारशिला थी।
वे कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत जीवन, परिवार की आर्थिक स्थिति, चुनौतियों आदि से परिचित रहते थे। अनौपचारिक बातचीत, आत्मीय संवाद और विश्वास के आधार पर वे कार्यकर्ताओं को जीवन भर के लिए संगठन से जोड़ देते थे। निःस्वार्थ स्नेह और मित्रता की वे गंगोत्री थे।
वे कहते थे - “कट्टरपंथी मुखियाओं की अपेक्षा समर्पित दिमागों की रचना करना बेहतर है। कार्यकर्ता को जैसा है वैसा स्वीकार कर संगठन की रीति-नीति के अनुरूप गढ़ना उनका दृष्टिकोण था। उन्होंने जोर दिया कि कार्यकर्ता मात्र 5-6 वर्ष नहीं, बल्कि जीवन भर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय रहे।
आपातकाल और संघर्ष
26 जून 1975 को इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने पर अभाविप ने सशक्त विरोध किया। प्रो. केलकर दमन का निशाना बने। 13 दिसंबर 1975 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और वे 19 महीने जेल में रहे। जेल में भी उन्होंने वैचारिक योद्धाओं को एकजुट किया, शारीरिक और बौद्धिक कार्यक्रम चलाए। आपातकाल के दौरान अभाविप ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाई। आपातकाल के बाद 1977 में उन्हें एक वर्ष के लिए भारतीय जनसंघ के प्रांत कार्यालय प्रमुख का दायित्व मिला, जिसे उन्होंने कुशलतापूर्वक निभाया। अस्सी के दशक में स्वास्थ्य बिगड़ने पर भी वे सक्रिय रहे। 1986 में उन्हें महाराष्ट्र प्रांत बौद्धिक प्रमुख बनाया गया।
केलकर जी की दृष्टि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से जुड़ी थी। वे शिक्षा परिसरों को राजनीति से मुक्त रखने, शिक्षा व्यय बढ़ाने और छात्रों में राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता तथा एकात्म मानव दर्शन के संस्कार जगाने के पक्षधर थे। प. पू. बालासाहेब देवरस जी ने उन्हें ‘डॉ. हेडगेवार कुलोत्पन्न’ कहा, जो उनके कृतित्व की महत्ता दर्शाता है।
वे सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे। दबाव की बजाय उदाहरण से प्रेरित करते थे। उनकी कार्यमग्नता ऐसी थी कि पीएचडी जैसी व्यक्तिगत उपलब्धियों से उन्होंने स्वयं को दूर रखा। उनका जीवन कार्यमग्नता ही था। 6 दिसंबर 1987 को प्रो. केलकर का देहांत हुआ। दैहिक रूप से गुजरे 39 वर्ष (2026 के संदर्भ में) हो चुके हैं, लेकिन उनकी कार्यपद्धति आज भी अभाविप की रीढ़ है। संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन है, जो गुणात्मक और संख्यात्मक रूप से बढ़ रहा है।
अभाविप की सभी विशेषताएं उनके चिंतन से प्रेरित हैं - छात्र शक्ति यानी राष्ट्र शक्ति, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में छात्रों की भूमिका, दलगत राजनीति से परे रहना, शैक्षणिक परिवार का अस्तित्व, कार्यकर्ता निर्माण की प्रयोगशाला, सामूहिकता, अनामिकता और ‘आज का विद्यार्थी आज का नागरिक’ की भावना।
प्रति वर्ष दिए जाने वाले यशवंतराव केलकर युवा पुरस्कार उनके सम्मान में युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करता है। 10 मई 2026 को दिल्ली में छात्र कल्याण न्यास और अभाविप के संयुक्त तत्वावधान में होने वाला ‘प्रिय केलकर जी विशेष अभिवाचन’ कार्यक्रम, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले मुख्य अतिथि होंगे, उनके जन्मशताब्दी वर्ष की श्रद्धांजलि है।
प्रो. यशवंतराव केलकर एक कुशल शिक्षक, संगठक, उदार हृदय गृहस्थ और कोटि-कोटि युवाओं के मार्गदर्शक थे। उन्होंने अभाविप को मात्र एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक आंदोलन बनाया। उनका जीवन “माणूस नावाचे काम” (मनुष्य निर्माण) का उदाहरण है - अपूर्णांकों को पूर्णांक बनाने की यात्रा।
आज जब अभाविप अपने अमृत महोत्सव के बाद भी निरंतर प्रगति कर रहा है, तो केलकर जी की स्मृति हमें याद दिलाती है कि सच्चा संगठन कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व विकास, निःस्वार्थ सेवा और राष्ट्रीय चेतना पर टिका होता है। उनके तप, परिश्रम और दृष्टि के बल पर आज अभाविप वटवृक्ष का रूप ले चुका है। स्व. यशवंतराव केलकर को कोटि-कोटि प्रणाम। उनकी कार्यपद्धति और आदर्श आज भी लाखों कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर रहे हैं।
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