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आईएएस-आईपीएस हैं, तो आईएमएस क्यों नहीं: फिर उठी स्वास्थ्य प्रशासन की मांग
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सार
चुनौती यह है कि देश को ऐसी स्वास्थ्य प्रशासनिक व्यवस्था कैसे मिले, जिसमें प्रशासनिक दक्षता और चिकित्सा विशेषज्ञता, दोनों का संतुलित समावेश हो।
स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की मांग
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की हालिया टिप्पणी ने एक बार फिर भारतीय चिकित्सा सेवा (इंडियन मेडिकल सर्विस-आईएमएस) के गठन पर बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश में चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा विभाग के कामकाज को लेकर अक्सर कोई न कोई विवाद हाईकोर्ट पहुंच रहा है। महानिदेशक-चिकित्सा शिक्षा के पद पर तैनात आईएएस के खिलाफ डॉक्टरों की याचिका पर हाईकोर्ट काफी समय से सरकार से जवाब मांग रहा है, पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका है। सवाल उठ रहा है कि जब देश में प्रशासनिक सेवाओं के लिए आईएएस, कानून-व्यवस्था के लिए आईपीएस और विदेश नीति के लिए आईएफएस जैसी अखिल भारतीय सेवाएं मौजूद हैं, तो स्वास्थ्य प्रशासन के लिए भारतीय चिकित्सा सेवा (आईएमएस) क्यों नहीं होनी चाहिए?
मौजूदा व्यवस्था में चिकित्सा सेवाओं और प्रशासनिक नियंत्रण की जिम्मेदारी दो जगह बंटी है। एक ओर डॉक्टर हैं, जो उपचार, चिकित्सा शिक्षा, रोग नियंत्रण और स्वास्थ्य सेवाओं के तकनीकी पहलुओं को संभालते हैं, दूसरी ओर आईएएस हैं, जो स्वास्थ्य विभागों के प्रशासनिक नेतृत्व, बजट प्रबंधन, नीतिगत निर्णयों और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी निभाते हैं। राज्य और केंद्र स्तर पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभागों के शीर्ष पदों पर आमतौर पर आईएएस अधिकारी ही बिठाए जाते हैं।
यहीं से विवाद की शुरुआत होती है। डॉक्टरों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि स्वास्थ्य सेवाओं का नेतृत्व ऐसे अधिकारियों के हाथ में होना चाहिए, जिन्हें चिकित्सा व्यवस्था की तकनीकी जानकारी हो। अस्पतालों का संचालन, रोग नियंत्रण कार्यक्रमों का क्रियान्वयन, महामारी प्रबंधन, दवाओं और उपकरणों की खरीद, स्वास्थ्य बजट का प्रभावी उपयोग और चिकित्सा शिक्षा जैसे विषयों के लिए तकनीकी समझ आवश्यक है। कई बार आपातकालीन स्थितियों में चिकित्सकों के सुझाव प्रशासनिक स्तर पर लटके रहते हैं या उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ता है।
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कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, अस्पतालों में बेड, स्वास्थ्य कर्मियों और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने में कई स्तरों पर कठिनाइयां सामने आईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वास्थ्य प्रशासन में प्रशिक्षित चिकित्सा प्रशासक होते, तो फैसले तेजी और असरदार तरीके से लिए जाते। एक तर्क यह भी है कि विभिन्न राज्यों की स्वास्थ्य नीतियों और उनके क्रियान्वयन में काफी अंतर देखने को मिलता है। एक अलग कैडर से पूरे देश में एक समान स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करना भी आसान होगा। पंद्रहवें वित्त आयोग और स्वास्थ्य मामलों से संबंधित संसदीय समितियां भी समय-समय पर ऐसे कैडर की आवश्यकता पर जोर दे चुकी हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी कई बार आईएमएस के गठन की मांग उठाई है। करीब तीन दशक पहले केंद्र ने राज्यों से इस संबंध में सुझाव मांगे थे, लेकिन बात आगे बढ़ी नहीं।
हालांकि इस प्रस्ताव का विरोध भी कम नहीं है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जिला प्रशासन पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई विभागों का समन्वय करता है। ऐसे में आईएमएस के गठन से अधिकारों और जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। एक तर्क यह भी है कि अस्पताल चलाने, वित्तीय प्रबंधन करने, मानव संसाधन का संचालन करने और नीति निर्माण जैसे कार्यों के लिए प्रशासनिक दक्षता की आवश्यकता होती है। इसलिए चिकित्सकों को प्रशासनिक नेतृत्व देना हमेशा प्रभावी नहीं हो सकता। संविधान के अनुसार, स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है। ऐसे में कुछ राज्यों को आशंका है कि अखिल भारतीय चिकित्सा सेवा के गठन से स्वास्थ्य प्रशासन में केंद्र का दखल बढ़ सकता है। कई राज्यों में प्रांतीय चिकित्सा सेवा से जुड़े संगठनों ने भी इसका विरोध किया है। कई बार डॉक्टर संगठनों के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद देखने को मिलते हैं।
चुनौती यह है कि देश को ऐसी स्वास्थ्य प्रशासनिक व्यवस्था कैसे मिले, जिसमें प्रशासनिक दक्षता और चिकित्सा विशेषज्ञता, दोनों का संतुलित समावेश हो। यदि आईएमएस का गठन किया जाता है, तो उसके अधिकारियों को चिकित्सा ज्ञान के साथ-साथ प्रशासन, वित्त, नीति निर्माण और नेतृत्व का भी विशेष प्रशिक्षण देना होगा। देश की स्वास्थ्य चुनौतियां लगातार जटिल होती जा रही हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक प्रशासनिक ढांचा पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इसलिए इंडियन मेडिकल सर्विस का विचार महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना है कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सक्षम बनाने के लिए कौन-सा मॉडल अपनाया जाता है।
मौजूदा व्यवस्था में चिकित्सा सेवाओं और प्रशासनिक नियंत्रण की जिम्मेदारी दो जगह बंटी है। एक ओर डॉक्टर हैं, जो उपचार, चिकित्सा शिक्षा, रोग नियंत्रण और स्वास्थ्य सेवाओं के तकनीकी पहलुओं को संभालते हैं, दूसरी ओर आईएएस हैं, जो स्वास्थ्य विभागों के प्रशासनिक नेतृत्व, बजट प्रबंधन, नीतिगत निर्णयों और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी निभाते हैं। राज्य और केंद्र स्तर पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभागों के शीर्ष पदों पर आमतौर पर आईएएस अधिकारी ही बिठाए जाते हैं।
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यहीं से विवाद की शुरुआत होती है। डॉक्टरों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि स्वास्थ्य सेवाओं का नेतृत्व ऐसे अधिकारियों के हाथ में होना चाहिए, जिन्हें चिकित्सा व्यवस्था की तकनीकी जानकारी हो। अस्पतालों का संचालन, रोग नियंत्रण कार्यक्रमों का क्रियान्वयन, महामारी प्रबंधन, दवाओं और उपकरणों की खरीद, स्वास्थ्य बजट का प्रभावी उपयोग और चिकित्सा शिक्षा जैसे विषयों के लिए तकनीकी समझ आवश्यक है। कई बार आपातकालीन स्थितियों में चिकित्सकों के सुझाव प्रशासनिक स्तर पर लटके रहते हैं या उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, अस्पतालों में बेड, स्वास्थ्य कर्मियों और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने में कई स्तरों पर कठिनाइयां सामने आईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वास्थ्य प्रशासन में प्रशिक्षित चिकित्सा प्रशासक होते, तो फैसले तेजी और असरदार तरीके से लिए जाते। एक तर्क यह भी है कि विभिन्न राज्यों की स्वास्थ्य नीतियों और उनके क्रियान्वयन में काफी अंतर देखने को मिलता है। एक अलग कैडर से पूरे देश में एक समान स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लागू करना भी आसान होगा। पंद्रहवें वित्त आयोग और स्वास्थ्य मामलों से संबंधित संसदीय समितियां भी समय-समय पर ऐसे कैडर की आवश्यकता पर जोर दे चुकी हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी कई बार आईएमएस के गठन की मांग उठाई है। करीब तीन दशक पहले केंद्र ने राज्यों से इस संबंध में सुझाव मांगे थे, लेकिन बात आगे बढ़ी नहीं।
हालांकि इस प्रस्ताव का विरोध भी कम नहीं है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जिला प्रशासन पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई विभागों का समन्वय करता है। ऐसे में आईएमएस के गठन से अधिकारों और जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। एक तर्क यह भी है कि अस्पताल चलाने, वित्तीय प्रबंधन करने, मानव संसाधन का संचालन करने और नीति निर्माण जैसे कार्यों के लिए प्रशासनिक दक्षता की आवश्यकता होती है। इसलिए चिकित्सकों को प्रशासनिक नेतृत्व देना हमेशा प्रभावी नहीं हो सकता। संविधान के अनुसार, स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है। ऐसे में कुछ राज्यों को आशंका है कि अखिल भारतीय चिकित्सा सेवा के गठन से स्वास्थ्य प्रशासन में केंद्र का दखल बढ़ सकता है। कई राज्यों में प्रांतीय चिकित्सा सेवा से जुड़े संगठनों ने भी इसका विरोध किया है। कई बार डॉक्टर संगठनों के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद देखने को मिलते हैं।
चुनौती यह है कि देश को ऐसी स्वास्थ्य प्रशासनिक व्यवस्था कैसे मिले, जिसमें प्रशासनिक दक्षता और चिकित्सा विशेषज्ञता, दोनों का संतुलित समावेश हो। यदि आईएमएस का गठन किया जाता है, तो उसके अधिकारियों को चिकित्सा ज्ञान के साथ-साथ प्रशासन, वित्त, नीति निर्माण और नेतृत्व का भी विशेष प्रशिक्षण देना होगा। देश की स्वास्थ्य चुनौतियां लगातार जटिल होती जा रही हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक प्रशासनिक ढांचा पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इसलिए इंडियन मेडिकल सर्विस का विचार महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना है कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक सक्षम बनाने के लिए कौन-सा मॉडल अपनाया जाता है।