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सिर्फ बातों से बात नहीं बनेगी: अवसरों के मोड़ पर भारत-नेपाल संबंध

Anand Kumar आनंद कुमार
Updated Tue, 09 Jun 2026 06:34 AM IST
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सार

नेपाल की घरेलू राजनीति अभी परिवर्तनशील है। ऐसे में भारत-नेपाल संबंधों के पुनर्संयोजन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नेपाली विदेश मंत्री शिशिर खनाल की भारत यात्रा के दौरान दिखी सकारात्मकता ठोस नतीजों में बदल पाती हैं या नहीं।

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भारत नेपाल संबंध - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल की नई दिल्ली यात्रा को केवल एक नियमित राजनयिक दौरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली नई सरकार के किसी मंत्री की पहली आधिकारिक भारत यात्रा थी, जो ऐसे समय में हुई, जब दोनों देश अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने के इच्छुक दिखाई देते हैं। दोनों देश अतीत के विवादों और अविश्वास से आगे बढ़कर विकास, संपर्क, निवेश और आर्थिक परिवर्तन पर आधारित साझेदारी की ओर बढ़ना चाहते हैं।


यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत-नेपाल संबंधों का वास्तविक पुनर्संयोजन हो चुका है, पर इसके संकेत अवश्य दिखाई दे रहे हैं। पिछले एक दशक में भारत-नेपाल संबंध सहयोग और तनाव के बीच झूलते रहे हैं। 2015 के सांविधानिक संकट और उसके बाद उत्पन्न नाकाबंदी विवाद, सीमा और मानचित्र संबंधी मतभेद, तथा समय-समय पर लगाए गए हस्तक्षेप के आरोपों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास का वातावरण बनाया। नेपाल में राजनीतिक दल अक्सर घरेलू राजनीतिक लाभ के लिए भारत-विरोधी भावनाओं का सहारा लेते रहे, जबकि भारत में नेपाल को कई बार चीन के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा गया। 
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नतीजतन, दोनों देशों के संबंध ऐतिहासिक शिकायतों और राष्ट्रवादी राजनीति के बंधक बन गए। 2025 के जनरेशन-जेड आंदोलन के बाद नेपाल में जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ है, उसने इस चक्र को तोड़ने की संभावना पैदा की है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) और प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह का उदय नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से एक महत्वपूर्ण विच्छेद का प्रतिनिधित्व करता है। नई सरकार ने अपनी वैधता सुशासन, जवाबदेही, योग्यता-आधारित प्रशासन और संस्थागत सुधारों के वादों पर निर्मित की है। शिशिर खनाल का यह कहना कि वर्तमान सरकार 'नेपाल की एक बिल्कुल नई राजनीतिक वास्तविकता' का प्रतिनिधित्व करती है, देश की घरेलू और विदेश नीति की प्राथमिकताओं में आए परिवर्तन का संकेत है। 
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खनाल ने भारत को नेपाल का 'सबसे महत्वपूर्ण साझेदार' बताते हुए कहा कि उनकी सरकार के पास 'पुराना बोझ' नहीं है। यह बताता है कि काठमांडो अब शिकायतों और आरोपों की राजनीति से आगे बढ़कर ‘परिणाम-आधारित कूटनीति’ अपनाना चाहता है। उसका लक्ष्य ऐसे ठोस परिणाम प्राप्त करना है, जो नेपाल के आर्थिक रूपांतरण में योगदान दे।

भारत की ओर से भी समान उत्साह दिखाई देता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों के पास संबंधों की दिशा को ‘निर्णायक रूप से बदलने’ का अवसर है। जयशंकर द्वारा नेपाल की नई सरकार की प्राथमिकताओं और भारत की पड़ोसी-प्रथम नीति के बीच ‘मजबूत पूरकता’का उल्लेख इसका संकेत है कि नई दिल्ली नए आधार पर काठमांडो की नई राजनीतिक व्यवस्था के साथ संबंध विकसित करना चाहती है। खनाल की यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं का केंद्र विवादास्पद मुद्दों के बजाय विकास, सहयोग, संपर्क परियोजनाएं, व्यापार, निवेश, ऊर्जा, डिजिटल एकीकरण और लोगों के बीच संबंध रहे। इन क्षेत्रों में दोनों देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। नेपाल को आर्थिक विकास के लिए निवेश, अवसंरचना और बाजारों तक पहुंच की आवश्यकता है, जबकि भारत अपने पड़ोस में स्थिर और समृद्ध वातावरण चाहता है। 

नेपाल क्लियरिंग हाउस लिमिटेड और भारत के नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन के बीच सीमा-पार डिजिटल भुगतान व्यवस्था की शुरुआत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह दर्शाता है कि तकनीकी सहयोग आर्थिक एकीकरण को गहरा बना सकता है और दोनों देशों के नागरिकों के दैनिक जीवन को अधिक सहज बना सकता है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच बिजली व्यापार में वृद्धि हुई है और खनाल की यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं से स्पष्ट है कि जलविद्युत विकास भविष्य की साझेदारी का प्रमुख स्तंभ बना रहेगा। यदि इसे प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया गया, तो ऊर्जा परस्पर निर्भरता, दीर्घकालिक स्थिरता और सहयोग का मजबूत आधार बन सकती है। 

इसी प्रकार जल संसाधन प्रबंधन, अवसंरचना निर्माण और सीमा-पार संपर्क परियोजनाओं में भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं। फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सभी बाधाएं समाप्त हो गई हैं। कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा विवाद अब भी अनसुलझा है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि इस विवाद को संभालने का नई सरकार का तरीका बदला हुआ प्रतीत होता है। खनाल ने स्पष्ट किया कि नेपाल किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं चाहता और वह इसे द्विपक्षीय कूटनीतिक तंत्र के माध्यम से ही सुलझाना चाहता है। यह रुख तनाव को नियंत्रित रखने और विवाद को व्यापक संबंधों पर हावी न होने देने का संकेत देता है। यदि दोनों पक्ष इन विवादों को व्यापक सहयोग से अलग रखते हैं, तो संबंधों में स्थिरता बनाए रखना संभव होगा। नेपाल की नई सरकार के किसी मंत्री की पहली भारत यात्रा में सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ वार्ता इस बात का संकेत है कि दोनों पक्ष सुरक्षा संवाद को भी अहम मानते हैं। इसके साथ ही राजनीतिक स्तर पर संपर्कों का पुनरुद्धार भी उल्लेखनीय है। खनाल की यात्रा से पहले आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने भारत आए थे और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री तथा अजीत डोभाल से मुलाकात की थी।

अंततः भारत-नेपाल संबंधों के पुनर्संयोजन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों सरकारें सकारात्मक राजनीतिक संदेशों को ठोस परिणामों में बदल पाती हैं या नहीं। केवल सद्भावनापूर्ण बयान पर्याप्त नहीं होंगे। नेपाल की घरेलू राजनीति अभी परिवर्तनशील है, जबकि सीमा विवाद और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाएं भविष्य में चुनौतियां उत्पन्न करती रहेंगी। इसके बावजूद आज दोनों देशों के हित पहले की तुलना में कहीं अधिक मेल खाते दिखाई देते हैं। नेपाल को निवेश, संपर्क और विकास चाहिए, जबकि भारत एक स्थिर, समृद्ध और मैत्रीपूर्ण पड़ोसी चाहता है।

काठमांडो और नई दिल्ली, दोनों यह संकेत दे रहे हैं कि वे शिकायतों और संदेहों की राजनीति से आगे बढ़कर विकास, आर्थिक एकीकरण और व्यावहारिक सहयोग पर आधारित संबंध चाहते हैं। यदि यह दृष्टिकोण कायम रहता है, तो वर्तमान समय वास्तव में भारत-नेपाल संबंधों के एक नए अध्याय की शुरुआत सिद्ध हो सकता है। अवसर मौजूद है; अब यह देखना होगा कि क्या दोनों पक्ष उसे स्थायी उपलब्धि में बदलने का राजनीतिक साहस और धैर्य दिखा पाते हैं?  
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