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एक जगह 23: एकजुटता का संदेश, मगर चुनौतियों से घिरा इंडिया गठबंधन

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Tue, 09 Jun 2026 06:25 AM IST
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सार
लंबे अरसे बाद इंडिया गठबंधन की बैठक में विपक्षी दलों ने एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश तो की, पर विपक्षी एकजुटता की दरारें भी उभरकर सामने आईं। देखना होगा कि गठबंधन आगे अंतर्विरोधों से उठकर एक सुसंगत राजनीतिक विकल्प बन पाता है या यह एकता सिर्फ बयानों तक सीमित रह जाती है।
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opposition parties meeting in delhi show unity but still faces challenges
दिल्ली में इकट्ठा हुए विपक्षी नेता - फोटो : पीटीआई

विस्तार

हालिया विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) की हार के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों और अंदरूनी मतभेदों के बीच विपक्षी इंडिया गठबंधन की दिल्ली में हुई बैठक में एकजुटता का संदेश देने की कोशिश अवश्य दिखाई दी, लेकिन इसके साथ ही गठबंधन के सामने मौजूद चुनौतियां भी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आईं। बैठक में शामिल दलों ने एसआईआर और चुनाव की निष्पक्षता को लेकर मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने और नीट प्रश्नपत्र लीक व सीबीएसई मामले, बेरोजगारी व महंगाई को लेकर देशव्यापी आंदोलन छेड़ने जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने पर सहमति जताई है, लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या विपक्ष इन मुद्दों को लेकर देश के सामने एक विश्वसनीय और संगठित विकल्प प्रस्तुत कर पाएगा?


दरअसल, इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा का मुकाबला करने से पहले अपने अंतर्विरोधों को साधने की है। कई सहयोगी दल राज्यों में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं और उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं। द्रमुक ने तमिलनाडु में कांग्रेस के अलग होने के बाद से ही अलग राह पकड़ी हुई है, तो आप ने भी गठबंधन से दूरी बना रखी है। ममता बनर्जी भले ही बैठक में शामिल हुई हों, पर बीते लोकसभा चुनाव और हालिया विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनका रवैया कुछ अलग ही था। विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त और अब अंदरूनी टूट से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस की चुनौतियों को देखते हुए, ममता के रुख में आए बदलाव को समझा जा सकता है।


झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो हेमंत सोरेन भले ही बैठक में ऑनलाइन उपस्थित हों, लेकिन राज्यसभा चुनाव को लेकर उनकी पार्टी के कांग्रेस के साथ कुछ मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में इंडिया गठबंधन के लिए साझा एजेंडा और सामूहिक नेतृत्व के विचार को व्यावहारिक रूप देना आसान नहीं होगा। लोकतंत्र में एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष की मौजूदगी किसी भी स्वस्थ राजनीतिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त होती है। लिहाजा, पिछले लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार अगर 23 विपक्षी दल एक मंच पर एकत्रित हुए हैं, तो इसके राजनीतिक संदेश पर गौर होना ही चाहिए। लेकिन विपक्ष को भी समझना होगा कि केवल सरकार का विरोध किसी राजनीतिक कार्यक्रम का आधार नहीं हो सकता।

विपक्ष को स्पष्ट करना होगा कि जिन मुद्दों को लेकर वह सरकार पर आक्रामक है, उनके समाधान के लिए उसके पास क्या ठोस दृष्टि और कार्यक्रम हंै। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जनता भी सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से आगे बढ़कर जवाबदेही और विकल्प देखना चाहती है। इंडिया गठबंधन की बैठक विपक्षी एकता के दावे के प्रदर्शन में एक हद तक सफल कही जा सकती है, लेकिन फिलहाल उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को एक विश्वसनीय, स्थिर और संगठित विकल्प के रूप से स्थापित करने की है।
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