{"_id":"6a56e2fc06e60eedb0033718","slug":"artificial-intelligence-us-china-ai-race-india-computing-capacity-and-ai-strategy-19-days-blackout-2026-07-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"मिथक, दंतकथाएं और अवसर: मुफ्त एआई मॉडल से आगे की लड़ाई, भारत को अब चाहिए अपनी कंप्यूटिंग ताकत और स्पष्ट रणनीति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
मिथक, दंतकथाएं और अवसर: मुफ्त एआई मॉडल से आगे की लड़ाई, भारत को अब चाहिए अपनी कंप्यूटिंग ताकत और स्पष्ट रणनीति
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
कृत्रिम बुद्धिमत्ता
- फोटो :
अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
दुनिया का सबसे सक्षम एआई सिस्टम जून में 19 दिनों तक आम लोगों के लिए उपलब्ध ही नहीं था। 12 जून को अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने एंथ्रोपिक को आदेश दिया कि वह अपने नए क्लॉड फेबल-5 और माइथोस-5 मॉडल विदेशी नागरिकों के लिए बंद कर दे। कंपनी अपने वैश्विक क्लाउड नेटवर्क पर पासपोर्ट के आधार पर उपयोगकर्ताओं को अलग-अलग नहीं कर सकती थी, सो उसने ये मॉडल सभी के लिए बंद कर दिए। हालांकि, 30 जून को अमेरिका ने यह फैसला वापस ले लिया। इस ब्लैकआउट के अगले ही दिन बीजिंग की कंपनी झिपु एआई ने जीएलएम 5.2 जारी कर दिया। न कोई शुल्क, न कोई रोक और न ही किसी अनुमति की जरूरत। चर्चा का केंद्र चीनी मॉडल बना, पर उससे भी बड़ा संदेश अमेरिकी चुप्पी ने दिया। अब यह सवाल कि चीन कितना पीछे है, लगभग बेमानी हो गया है, क्योंकि इसका जवाब हर तीन महीने में बदल रहा है। असली बात उसकी रफ्तार है।जनवरी, 2025 में डीपसीक आर-1 ने दिखाया था कि एआई के क्षेत्र में शानदार काम सिलिकॉन वैली के बाहर सस्ते में भी हो सकता है और उसे मुफ्त में बांटा भी जा सकता है। फरवरी-2026 से झिपु ने जीएलएम 5, जीएलएम 5.1 और जीएलएम 5.2 मॉडल लॉन्च किए हैं। पांच महीनों में तीन बड़े संस्करण। लगातार मिल रही सफलताएं चीन की बढ़ती क्षमता का ही संकेत देती हैं। ऐसे में, असली सवाल यह नहीं कि चीन और अमेरिका के बीच कितना अंतर है, बल्कि यह है कि यह अंतर कितनी तेजी से घट रहा है। एक साल पहले यह दूरी वर्षों में मापी जाती थी, अब महीनों में सिमट रही है।
अमेरिका के सबसे उन्नत एआई मॉडलों के नाम ‘माइथोस’ और ‘फेबल’ हैं, जिन्हें ‘ग्लासविंग’ नाम के प्लेटफॉर्म के जरिये उपलब्ध कराया जाता है। इन नामों के पीछे भी एक संदेश छिपा है। ‘माइथोस’ उस ज्ञान का प्रतीक है, जिसे केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित रखा जाता है, जबकि ‘फेबल’ ऐसी कहानी का संकेत है, जो आम लोगों के लिए होती है। वहीं ‘ग्लासविंग’ एक पारदर्शी तितली का नाम है। यानी, चीजें देखने में खुली और पारदर्शी लगती हैं, पर उन्हें करीब से देखने या इस्तेमाल करने का अधिकार सिर्फ उन्हीं को मिलता है, जिन्हें इसकी अनुमति दी जाती है। इसके उलट चीन का जवाब है जीएलएम 5.2। यह किसी आकर्षक नाम के बजाय सिर्फ एक वर्जन नंबर (किसी सॉफ्टवेयर या एआई मॉडल की संस्करण संख्या) है।
यहां दो अलग सोच दिखाई देती हैं। पहली, ऐसा प्रीस्टहुड, यानी चुनिंदा विशेषज्ञों और सरकार का समूह, जो तय करे कि किसे कितनी जानकारी मिले। दूसरी, ऐसा मॉडल, जिसमें किसी को भी बिल्ड (सॉफ्टवेयर का तैयार संस्करण) इस्तेमाल करने के लिए दिया जा सके। सुरक्षा के पक्ष में प्रीस्टहुड का तर्क मजबूत है। अगर सॉफ्टवेयर की कमजोरियां पहचानने वाला एआई मॉडल एक बार खुले तौर पर जारी हो जाए, तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन, तकनीकी दुनिया में आखिरकार जीत उसी की होती है, जिसकी तकनीक सबसे ज्यादा लोगों तक पहुंचती है। दुनिया के कंप्यूटरों में जिन वेट्स, यानी मॉडल के प्रशिक्षित पैरामीटर का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होगा, वही भविष्य के मानक और बहस की दिशा तय करेंगे। यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। एक बंद समाज अपनी तकनीक मुफ्त देकर दुनिया को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, जबकि एक खुला समाज सरकारी आदेश से अपनी ही तकनीक पर रोक लगा रहा है।
भारत को इस उत्साह में बहने के बजाय हकीकत समझनी होगी। जीएलएम 5.2 में करीब 744 अरब पैरामीटर्स हैं। इतने बड़े मॉडल को चलाने के लिए हजारों एआई प्रोसेसर वाले एक्सेलेरेटर क्लस्टर और उन्हें चलाने के लिए मेगावाट स्तर की बिजली चाहिए। इसलिए, असली चुनौती बिजली और कंप्यूटिंग क्षमता है और भारत लंबे समय से इससे जूझ रहा है। वहीं, कई भारतीय कंपनियां सोचती हैं कि वे खुला चीनी मॉडल इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि वास्तव में वे झिपु के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करती हैं। ऐसे में, उनका कोड चीन के अधिकार क्षेत्र वाले सर्वरों से होकर गुजरता है। ओपन वेट्स (खुले पैरामीटर) का फायदा सिर्फ उन्हीं को मिलता है, जो एआई मॉडल को अपने सर्वर पर चला सकें।
भारत के संप्रभु एआई कार्यक्रम ने सर्वम के मॉडल से लेकर परम-2 तक कई उपलब्धियां हासिल की हैं। पर, चुनौती यह है कि क्या भारत दुनिया के सबसे उन्नत एआई मॉडल को तेजी से अपनाकर, उनमें बदलाव और उन्हें लागू कर सकता है, वह भी इतनी तेजी से, जितनी तेजी से यह तकनीक खुद बदल रही है। भारत को अब एआई मॉडल चलाने की कंप्यूटिंग क्षमता और विश्वसनीय बिजली व्यवस्था को राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे का हिस्सा मानना होगा। क्योंकि, मॉडल तो मुफ्त मिल सकते हैं, पर उन्हें चलाने की क्षमता नहीं। हर एआई अनुबंध में एक एआई मॉडल को आसानी से दूसरे मॉडल से बदलने की व्यवस्था अनिवार्य करनी चाहिए। पूरी व्यवस्था ऐसे तकनीकी ढांचे पर आधारित हो, जिसमें अलग-अलग मॉडल आसानी से काम कर सकें। भारत में यूपीआई की सफलता इसी का उदाहरण है। अगर किसी एआई मॉडल को एक सप्ताह के भीतर बदला जा सके, तो किसी विदेशी सरकार का तकनीक पर लगाया गया निर्यात प्रतिबंध भारत को मुश्किल में नहीं डाल पाएगा। जून के वे 19 दिन हमारे लिए किसी फायर ड्रिल की तरह थे। पर, हम उससे सबक नहीं ले सके।
एआई की यह दौड़ अभी शुरू हुई है, खत्म नहीं। इस क्षेत्र में सबसे बड़ी ताकत केवल बेहतर तकनीक नहीं, बल्कि उसे तेजी से अपनाने की क्षमता और उस पर भरोसा है। उतना ही जरूरी यह अधिकार भी है कि जिस तकनीक पर आपने अपना कारोबार खड़ा किया है, उसका इस्तेमाल आगे भी कर सकें, चाहे किसी दूसरे देश का मंत्री कोई भी फैसला क्यों न ले। जून ने साफ दिखा दिया कि फिलहाल हमारे पास यह भरोसा नहीं है। ऐसे में, भारत को ऐसी तकनीकी नींव तैयार करनी होगी, जिसे कोई विदेशी सरकार अपने फैसले से छीन न सके। एआई के क्षेत्र में अमेरिका अगर सभी मिथक ध्वस्त कर रहा है, तो चीन का अविश्वसनीय प्रदर्शन दंतकथाओं सरीखा है। यह खतरे का नहीं, बल्कि भारत के लिए नए विकल्प खुलने का संकेत है। अब असली सवाल यह है कि क्या भारत पर्याप्त कंप्यूटिंग क्षमता, मजबूत अनुबंध और स्पष्ट रणनीति के साथ इस नई तकनीकी दुनिया में अपनी शर्तों पर फैसले ले पाएगा, या फिर हम केवल ग्लासविंग की पारदर्शिता की तारीफ करते रहेंगे और उसके करीब जाने के निमंत्रण का इंतजार ही करते रहेंगे।
-लेखक टेक, सोशल आंत्रप्रन्योर और डब्ल्यूजीएफ के प्रोग्राम डायरेक्टर (पूर्वी भारत) हैं।