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पहली बार, पहली जीत: विश्व क्रिकेट की एक ताकत बन रही भारतीय महिला टीम, लॉर्ड्स के मैदान में किया साबित
लॉर्ड्स के 142 साल के इतिहास में यहां खेले गए पहले महिला क्रिकेट टेस्ट मैच में भारत की जीत का महत्व इससे समझा जा सकता है कि जहां भारतीय पुरुष टीम को यहां पहली टेस्ट जीत के लिए 54 साल इंतजार करना पड़ा था, वहीं महिला टीम ने पहले ही प्रयास में यह करिश्मा कर दिखाया।
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भारतीय महिला क्रिकेट टीम
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स
ऐसे समय में जब फुटबॉल विश्वकप का रोमांच पूरी दुनिया के खेल प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित किए हुए है, तब लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर हरमनप्रीत कौर की अगुआई में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड को परास्त कर जो उपलब्धि हासिल की है, वह सिर्फ एक उल्लेखनीय जीत नहीं, बल्कि भारतीय महिला क्रिकेट इतिहास का एक गौरवपूर्ण अध्याय है। क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स के मैदान के 142 साल के इतिहास में यहां पहली बार हुए महिला टेस्ट क्रिकेट मैच में भारत की जीत का महत्व इससे समझा जा सकता है कि पुरुष क्रिकेट टीम को यहां अपना पहला टेस्ट मैच खेलने के 54 साल बाद अपनी पहली जीत मिली थी, जबकि महिला टीम ने पहले ही प्रयास में यह करिश्मा कर दिखाया है। यह जीत इसलिए भी खास है, क्योंकि टेस्ट क्रिकेट को किसी भी खिलाड़ी और टीम की तकनीकी क्षमता, धैर्य, मानसिक दृढ़ता और सामूहिक अनुशासन की सबसे कठिन परीक्षा माना जाता है। भारतीय महिला टीम ने बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण, तीनों ही विभागों में जिस संतुलन और आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि अब वह सिर्फ प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि विश्व क्रिकेट की एक ताकत बन रही है। प्लेयर ऑफ द मैच क्रांति गौड़ द्वारा पहली पारी में चटकाए गए पांच विकेट और दूसरी पारी में यस्तिका भाटिया के शानदार शतक के अतिरिक्त हरमनप्रीत कौर की सूझबूझ तथा स्मृति मंधाना व दीप्ति शर्मा के योगदान को भी इस जीत का श्रेय जाता है। दरअसल, किसी भी महान टीम की पहचान केवल उसके स्टार खिलाड़ियों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि कठिन परिस्थितियों में टीम किस तरह से एक इकाई के रूप में प्रदर्शन करती है। लॉर्ड्स में भारतीय टीम ने यही संदेश दिया। फुटबॉल विश्वकप का रोमांच कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा, लेकिन लॉर्ड्स में भारतीय महिला क्रिकेटरों ने जो इतिहास रचा है, वह खेल प्रेमियों की स्मृतियों में हमेशा जीवित रहने वाला है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह ऐतिहासिक जीत आने वाले वर्षों में भारतीय महिला क्रिकेट के लिए उसी तरह मील का पत्थर साबित होगी, जैसे 1983 की विश्वकप जीत पुरुष क्रिकेट के लिए बनी थी। हरमनप्रीत कौर और उनकी टीम ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर अवसर, विश्वास और संसाधन समान हों, तो देश की बेटियां भी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित मंचों पर इतिहास रच सकती हैं। अब जिम्मेदारी समाज, खेल निकायों और नीति नियंताओं की है कि वे इस उपलब्धि को तात्कालिक उत्साह के बजाय देश की खेल संस्कृति में स्थायी सुधारों के अवसर रूप में देखें।
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