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ब्रिक्स-एससीओ की चुप्पी: नई विश्व व्यवस्था पर सवाल, ईरान संकट पर वैश्विक मंच खामोश क्यों?

रहीस सिंह, वैदेशिक मामलों के जानकार Published by: Nitin Gautam Updated Wed, 11 Mar 2026 07:04 AM IST
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सार
सवाल यह नहीं कि ईरान का अंतिम हश्र क्या होगा, सवाल यह भी नहीं कि खाड़ी क्षेत्र कभी एक सीधी व सरल रेखा में चलेगा? सवाल तो यह है कि जो मंच दुनिया को बड़े-बड़े सपने दिखा रहे थे और वैश्विक शांति का पाठ पढ़ा रहे थे, वे जीवित हैं या मरणासन्न हो चुके हैं?
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BRICS SCO silence on IRAN crisis is question on new world order global forum silent
ईरान संकट पर वैश्विक मंचों की चुप्पी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पिछले दिनों सूचना की दुनिया में ट्रंप के दो बयान तैरते दिखे। पहला यह कि, ‘जब हम अपना काम पूरा कर लेंगे, तो अपनी सरकार अपने हाथ में ले लेना। शायद पीढ़ियों में यही एक ऐसा मौका होगा।’ और दूसरा था-‘जिन लोगों के बारे में हम सोच रहे थे, उनमें से अधिकांश मारे जा चुके हैं।’ तो क्या डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा बयान उन्हें इस विचार से दूर ले जाता हुआ दिख रहा है कि ‘यह युद्ध 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से स्थापित ईरान की धार्मिक शासन व्यवस्था को समाप्त करने का अवसर हो सकता है।’ इससे अलग विषय यह है कि इस अभियान में ईरान के सर्वाेच्च नेता अली खामनेई सहित कई शीर्ष अधिकारी भी मारे जा चुके हैं। तो क्या मरने वालों में वे नाम भी शामिल हैं, जिन्हें ट्रंप सरकार की बागडोर सौंपना चाहते थे?


वैसे हमारा मूल प्रश्न यह नहीं है। हमारा मौलिक प्रश्न यह भी नहीं है कि ईरान का अंतिम हश्र क्या होगा? अर्थात वह तबाही और मलबे से निकल पाएगा अथवा नहीं? प्रश्न यह भी नहीं है कि खाड़ी क्षेत्र किसी सीधी और सरल रेखा में चलेगा या फिर शिया और सुन्नी नाम की दो दुनियाओं के अंदर निर्मित धुरियों पर ठिठक कर धर्म की गांठों को पहले खोलेगा और अपने ही ध्वंस की पटकथा लिखेगा। प्रश्न तो यह है कि जिन मंचों पर ये देश गले मिल रहे थे और वे मंच, जो दुनिया को बड़े-बड़े सपने दिखा रहे थे, वे कहां हैं? जीवित हैं या फिर मरणासन्न अवस्था में हैं? अगर जीवित हैं, तो उसका प्रमाण दें।


यहां पर संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर उन अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों या संगठनों की बात नहीं हो रही है, जो पूरी तरह से पश्चिमी छाया में पनपे और उन्हीं के प्रभाव में रहकर शेष दुनिया को अपनी शर्तों के अनुसार चलाने की कोशिश करते रहे। बात तो उनकी हो रही है, जिन्हें एशियाई और कुछ हद तक यूरेशियाई देशों ने पश्चिमी मंचों के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की थी। शायद आप समझ गए हों, हमारा इशारा ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की तरफ है, जिनमें ईरान शामिल होकर फूला नहीं समा रहा था। पर दोनों ही मंच मौन साध गए हैं। ऐसे में, प्रश्न उठता है कि आखिर वह कौन-सी वजह है, जिसके चलते इन मंचों से युद्ध और युद्ध अपराध पर कोई आवाज नहीं उठी। क्या वजह रही कि ये संगठन उसी तरह की निष्क्रिय सक्रियता अथवा सक्रिय निष्क्रियता का परिचय नहीं दे पाए, जैसा कि कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का मंच दे जाता था? क्या इसे कूटनीतिक संतुलन (डिप्लोमेटिक बैलेंस) अथवा पुनर्संतुलन जैसे कूटनीतिक चश्मे से देखकर छोड़ दिया जाए या फिर यह माना जाए कि अमेरिका के डर से ये मंच चुप रहे। पर 2025 में तो ब्रिक्स बैठक में अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर हमलों को लेकर निंदा की गई थी। तब तो इसे वैश्विक दक्षिण की कूटनीतिक प्रतिक्रिया मानकर सराहा गया था। फिर अब क्या हुआ?

खैर अयातुल्ला अली खामनेई का अंत किसी वैश्विक शोक की कहानी होनी चाहिए या जश्न की, यह तो वक्त तय करेगा। पर यहां प्रश्न यह है कि क्या इस प्रकार की शिथिलताएं और निःशक्तताएं भावी वैश्विक कूटनीति के लिए बानगी भर हैं या इससे कुछ ज्यादा। आज विश्व व्यवस्था एक ऐसे व्यक्ति द्वारा तय की जा रही है, जिसे किसी देश का राष्ट्रपति यदि अच्छा नहीं लगता है, तो उसे उसके घर से उठा लिया जाता है अथवा मार दिया जाता है। यही तो हुआ। ट्रंप को वेनेजुएला का राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पसंद नहीं आया, तो उसे रातों-रात उठाकर न्यूयॉर्क ले जाया जाता है और फिर एक सामान्य अपराधी की तरह मुकदमा चलाया जाता है। एक दूसरे राष्ट्र का सर्वोच्च नेता खामनेई उसे या उसके मित्र को पसंद नहीं आता है, तो उसे मार दिया जाता है। दुनिया चुप है और भावी विश्व व्यवस्था का खाका खींचने व नेतृत्व करने का दावा करने वाली संस्थाएं स्टैंडबाय मोड पर। जबकि इससे पहले तक इनका दावा था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था की लाइन-लेंथ ये ही तय करेंगी और कूटनीति भी इन्हीं के अनुसार सरकेगी। पर यहां तो उल्टा दिख रहा है। आखिर इस उलटबांसी का सच क्या है?

हम मान लेते हैं कि ब्रिक्स मुख्य रूप से एक आर्थिक व राजनीतिक सहयोग मंच है, इसलिए किसी युद्ध या शांति जैसे विषय पर तुरंत संयुक्त सैन्य या राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं दे सकता। पर ब्रिक्स तो समानांतर विश्व व्यवस्था की बात करता हुआ आया है। क्या तब भी उसे रूस-यूक्रेन और इस्राइल, अमेरिका व ईरान संबंधों पर नहीं बोलना चाहिए? हम यह भी मान लें कि एससीओ सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग व क्षेत्रीय स्थिरता के लिए काम करता है। यह नाटो की तरह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है। लेकिन क्या यह बात अमेरिका, उसके पश्चिमी सहयोगी और नाटो मानते हैं? यहां कुछ बातें स्पष्ट करनी आवश्यक हैं। पहली यह कि अभी तक तो यही बताया जा रहा था कि एससीओ वैश्विक अर्थव्यवस्था व भू-राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। शंघाई सहयोग संगठन की ही 23वीं बैठक में ‘सिक्योर सिद्धांत’ को पेश किया गया था, जिसमें एक बिंदु संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का आदर भी था। क्या यह सिर्फ एक आदर्श वाक्य भर था? इस मंच के जरिये चीन और रूस ने संयुक्त युद्धाभ्यासों को एक रणनीति के तहत विकसित करने की योजना बनाई थी, जो ‘वार-गेम’ का हिस्सा थी, जिसे एससीओ ‘पीस मिशन’ नाम देता रहा, पर नाटो इसे अपना प्रतिद्वंद्वी करार देते हुए शीतयुद्ध कालीन वारसा पैक्ट के रूप में पोर्ट्रेट करता रहा। लेकिन आज के दिन, वह भी मौन।

एक प्रश्न यह भी कि क्या पूंजी और बाजार की दुनिया किसी सीधी व सरल रेखा में चलने वाली नैतिक दुनिया है? नहीं, वह तो कूटनीति, छद्मनीति और सैन्यतंत्र के बिना चलती ही नहीं। यदि ऐसा न होता, तो पेंटागन मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स के इशारे पर काम न करता। अमेरिका की जान डॉलर है और उसकी रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। भरोसा न हो, तो इतिहास के आईने में झांकिए, आपको सद्दाम हुसैन के खात्मे का कारण वही दिखेगा, जो मादुरो का है। तो क्या ब्रिक्स व एससीओ किसी आदर्श चरित्र वाली पूंजी और व्यापार का चेहरा हैं? नहीं, बस डरे हुए। अगर कुछ और हो सकता है, तो यह कि कुछ देश अमेरिका की ओर झुके हुए हैं और चीन व रूस इस समय को अवसर के रूप में देख रहे हैं। तेहरान में अमेरिकी व्यस्तता रूस को यूक्रेन पर विशेष अवसर प्रदान करेगी। यह युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, रूस के लिए उतना ही लाभदायक होगा। चीन भी इस घटनाक्रम के बीच ताइवान की ओर देख रहा है। यदि अमेरिका ईरान पर कमजोर पड़ा या दिखा, चीन इसका लाभ अवश्य उठाना चाहेगा।

बहरहाल, किसी भी युद्ध में किसी ऐसे पक्ष की भर्त्सना, जो अनायास युद्ध थोप रहा है, उसका विरोध या समर्थन नहीं होता। सक्रियता का संदेश होता है, जिसकी अपेक्षा दुनिया रखती है। अफसोस, ब्रिक्स और शंघाई सहयोग, इससे बहुत दूर दिखे।        
 
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