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बीमा और नियम-शर्तों का आतंक: कागजी जटिलता से मेडिकल इंश्योरेंस के दावों के समय टूटता विश्वास
डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी
Published by: Devesh Tripathi
Updated Fri, 20 Mar 2026 06:04 AM IST
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स्वास्थ्य बीमा
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विस्तार
भारत में स्वास्थ्य बीमा (मेडिकल इंश्योरेंस) का बाजार आज एक विरोधाभास पर खड़ा है। एक तरफ बीमा कंपनियां अच्छी पॉलिसी, ज्यादा कवरेज और कई सुविधाओं की बात करती हैं, पर दूसरी तरफ असली परेशानी क्लेम (दावा) के वक्त सामने आती है। अक्सर अस्पताल का बिल, टीपीए की प्रक्रिया और बीमा कंपनी की मंजूरी या कटौती, ये सब मिलकर उसी मुश्किल वक्त में फैसला करते हैं, जब व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान होता है। ऐसे समय में कंपनी किसी न किसी ‘टर्म और कंडीशन’ का सहारा लेकर भुगतान टाल देती है या बहुत कम भुगतान करती है। वास्तव में, लोकतंत्र में जिस सेवा पर जनता भरोसा करती है, वह अक्सर क्लेम के फैसले में देखी जाती है। इसी बिंदु पर हमारा स्वास्थ्य बीमा सिस्टम अस्थिर दिखता है।संसद में दिए गए आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हर 10,000 प्रोसेस्ड हेल्थ-इंश्योरेंस क्लेम में करीब 8,566 के भुगतान हुए, 786 रिपुडिएट (अस्वीकृत) हुए और 648 क्लेम आगे के लिए लंबित/कैरी-फॉरवर्ड हो गए। यह मोटे तौर पर 85.66 फीसदी भुगतान को बताता है। भारत में असंतोष का बड़ा हिस्सा तब उपजता है, जब क्लेम मंजूर होने के बाद भी ‘रिजनेबल एंड कस्टमरी’ या ‘नॉन-एडमिसिबल’ कटौतियों के कारण परिवार को जेब से भुगतान करना पड़ता है। बीमा का लक्ष्य सामाजिक उपयोगिता जोखिम को सामूहिक बनाना है, पर जब दावा निपटान में अस्पष्ट शर्तें, दस्तावेजी जटिलता व ‘व्याख्या का खेल’ हावी हो जाता है, तो बीमा सुरक्षा की जगह अविश्वास का उत्पाद बन जाता है। भारत में स्वास्थ्य बीमा की ‘दशा’ समझने के लिए दो तस्वीरें एक साथ देखनी होंगी। पहली, राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा के मुताबिक, 2014-15 में कुल स्वास्थ्य व्यय में ऑफ-पॉकेट खर्च (ओओपीइ) की हिस्सेदारी 62.6 फीसदी थी, जो 2021-22 में घटकर 39.4 प्रतिशत रह गई। दूसरी, बीमा बाजार का विकास और भरोसा-स्तर अब भी असमान है। बीमा लेने वालों की संख्या तो बढ़ी, पर विवाद, शिकायतें व क्लेम संबंधी परेशानियां भी बढ़ गईं। अर्थव्यवस्था में स्वास्थ्य बीमा तीन स्तरों पर काम करता है। पहला, जब बीमारी का खर्च बीमा/सरकारी योजना उठाती है, तो बचत होती है और खपत में तेज गिरावट नहीं आती। इससे घरेलू वित्तीय स्थिरता बनी रहती है। दूसरा, बीमा व सरकारी भुगतान अस्पतालों के लिए अपेक्षाकृत स्थिर राजस्व बनाते हैं, जिससे बेड, तकनीक, नर्सिंग, डायग्नोस्टिक्स आदि में निवेश होता है। तीसरा, कैशलेस नेटवर्क, ई-ऑथराइजेशन और क्लेम-डाटा स्वास्थ्य-प्रबंधन को मापनीय बनाते हैं। भारत में आज ‘क्लेम-डिनायल बनाम क्लेम-फ्रॉड’ की झूठी बहस है। ऐसे में, अस्पतालों द्वारा अधिक बिलिंग/बढ़ी लागत को रोकना होगा, क्योंकि इसकी कीमत अंततः प्रीमियम बढ़ने या रिन्यूअल घटने के रूप में चुकानी पड़ती है।
बीमा की भाषा बेहद सरल और स्पष्ट होनी चाहिए, क्योंकि उपभोक्ता की वित्तीय सुरक्षा केवल ‘बीमा’ से नहीं आती, बल्कि ‘बीमा की भाषा कितनी साफ है’ व ‘हॉस्पिटल व बीमा कंपनी की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष व तेज है’ से आती है। इसलिए, सुधार का पहला स्तंभ है मानकीकरण-जैसे क्या-क्या कवर होगा, वेटिंग पीरियड, प्री-ऑथ, व डॉक्यूमेंटेशन की भाषा ऐसी हो कि ग्राहक को वह खरीदते वक्त ही समझ आ जाए। दूसरा, क्लेम अस्वीकृति का कारण अन्य (अदर्स) नहीं होना चाहिए। तीसरा, सुधार शिकायत-निवारण की गति में होना चाहिए। भारत में स्वास्थ्य बीमा के लिए मास्टर सर्कुलर के जरियेे क्लेम व गवर्नेंस अपेक्षाएं स्पष्ट की गई हैं, पर अनुभव तब बदलता है, जब शिकायत-प्रणाली तेज, भरोसेमंद व परिणामोन्मुख हो। भारत का स्वास्थ्य बीमा, विश्वास का बाजार है, जिसका अर्थ है कि हर क्लेम बिल्कुल स्पष्ट, तर्कसंगत, समयबद्ध व अपील-योग्य हो।
- लेखक जेएनयू में प्रोफेसर हैं।