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मुद्दा: इलेक्ट्रिक वाहनों की धीमी चाल; लेकिन सबसे पहले विश्वास का सवाल है कि ईवी समस्यामुक्त हैं या नहीं

मधुरेंद्र सिन्हा Published by: Pavan Updated Thu, 19 Mar 2026 07:45 AM IST
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सार

सरकार की योजनाओं और प्रोत्साहनों के बावजूद इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री उम्मीद के अनुसार नहीं बढ़ रही, जिसके कारणों को समझना जरूरी है।

Slow uptake of electric vehicles; but first comes the question of trust, whether EVs are problem-free or not
मुद्दा: इलेक्ट्रिक वाहनों की धीमी चाल - फोटो : ANI
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विस्तार

भारत के वाहन बाजार में खूब गहमागहमी है और एक से बढ़कर एक कारें और अन्य गाड़ियां लॉन्च हो रही हैं। भारतीयों का कारों के प्रति प्रेम बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन समस्या यह है कि हमें इसके लिए बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करना पड़ रहा है, जिससे देश का व्यापार घाटा भी बढ़ता जाता है।
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सरकार ने इसका समाधान यह निकाला कि बड़े स्तर पर इलेक्ट्रिक गाड़ियों का निर्माण किया जाए, उन्हें ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया जाए और लोगों को इन्हें अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। इसलिए सरकार ने एक योजना बनाई, जिसमें तय किया गया कि 2030 तक देश में 80 फीसदी दोपहिया और तिपहिया वाहन इलेक्ट्रिक हों, 40 प्रतिशत बसें, 70 फीसदी वाणिज्यिक वाहन और 30 प्रतिशत कारें इलेक्ट्रिक हों। इससे बड़े स्तर पर ईंधन की बचत होगी। इसी को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई तरह की योजनाएं और प्रोत्साहन शुरू किए, जैसे पीएलआई स्कीम। कई राज्यों ने वाहन रजिस्ट्रेशन में छूट दी और रोड टैक्स भी घटाया, पर इनका ज्यादा लाभ नहीं हुआ तथा इलेक्ट्रिक कारों की कुल संख्या 2024-25 में सिर्फ 6.3 से 7.6 फीसदी रही। हालांकि, इसमें बढ़ोतरी हो रही है, किंतु उस रफ्तार से नहीं, जिसकी अपेक्षा थी। वाणिज्यिक वाहनों में तो यह संख्या निराशाजनक है। आखिर क्या कारण है कि सरकार द्वारा प्रोत्साहित किए जाने और तमाम नई-नई कारों के लॉन्च के बावजूद भारत में इनकी बिक्री बढ़ नहीं पाई?
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सबसे पहले विश्वास का सवाल है कि इलेक्ट्रिक वाहन समस्यामुक्त हैं या नहीं। अभी लोग इन्हें थोड़ा संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं और ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ने लगेगी, तो लोगों के मन में विश्वास भी पैदा होने लगेगा। दरअसल, अभी लोगों में शंका है कि ये गाड़ियां चार्ज खत्म हो जाने पर कहां चार्ज होंगी? चार्जिंग स्टेशन बहुत कम हैं, इसलिए दूसरे शहर जाने वाले लोग सोचते हैं कि वहां कार चार्ज करने की सुविधा मिलेगी भी या नहीं। यह डर उसी तरह का है, जब सीएनजीयुक्त कारों के मालिक गैस स्टेशन ढूंढते थे। हालांकि, सरकार की ओर से चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है। ऐसे में, पेट्रोलियम कंपनियों को आगे आना होगा और पेट्रोल पंपों पर चार्जिंग स्टेशन बनाने की पहल करनी होगी। इसका समाधान कार कंपनियां भी तलाश रही हैं। कुछ कंपनियों-जैसे वियतनाम की कंपनी विनफास्ट ने छोटे चार्जर बना दिए हैं, जिससे घर बैठे कार चार्ज हो सकती है। इस दिशा में काफी प्रयास होता दिख रहा है। एक सवाल यह भी है कि एक बार चार्ज होने पर कार कितनी दूरी तय करेगी? शुरुआती दौर में जो कारें आईं, वे 200-250 किलोमीटर तक चल पाती थीं। पर इससे लोग आकर्षित नहीं हो पाए। अब ऐसी कारें आ गई हैं, जो एक बार चार्ज होने पर 500 किलोमीटर तक चल रही हैं। इसमें कोरियाई कंपनी किआ, महिंद्रा एंड महिंद्रा, चीनी कंपनी बीवाईडी भी हैं। टेस्ला ने 600 किलोमीटर से भी ज्यादा चलने वाली कारें बनानी शुरू कर दी हैं।

इसके साथ ही ऐसी कारें भी आ गई हैं, जो कम समय में पूरी चार्ज हो जाती हैं। कारों की बैटरी को लेकर हमेशा एक संशय बना रहता है कि इनका जीवनकाल कितना होगा और बदलने पर कितना खर्च आएगा। इलेक्ट्रिक कारों की बैटरियां भारत में बहुत कम बनती हैं और इसका 80 फीसदी उत्पादन चीन में होता है। इस कारण से ये महंगी हैं और इनकी कीमत लाखों रुपये में होती है। इसलिए, ग्राहक इन्हें नहीं खरीदना चाहते। हालांकि, अब भारतीय कंपनियां नई तकनीक के साथ बैटरियां बना रही हैं। ग्राहकों की इस झिझक को देखते हुए कुछ कंपनियों ने कार बाय-बैक स्कीम शुरू की है। इसमें पांच या कुछ साल बाद कंपनी कार को वापस खरीद लेती है, जिससे लोगों का डर कम हो रहा है।

यह धारणा भी है कि इलेक्ट्रिक कारें महंगी होती हैं। पर टाटा मोटर्स ने नई सस्ती कारें पेश करके इसे भी खत्म कर दिया है। यह कंपनी इलेक्ट्रिक कारें बनाने में भारत में अग्रणी रही है। विदेशी कंपनियों की कारें काफी महंगी होती हैं। बीवायडी की कारें करीब 40–50 लाख रुपये की होती हैं, और टेस्ला की कारें भारत में नहीं बनतीं, इसलिए उस पर आयात शुल्क लगता है, जिससे उनकी कीमत और बढ़ जाती है। एक वजह यह भी है कि पहले अलग-अलग राज्यों से मिलने वाली सब्सिडी कम या खत्म होने की वजह से अब इन पर मिलने वाला फायदा घट गया है। पहले कहा गया था कि इन गाड़ियों को टोल टैक्स में भी छूट मिलेगी, पर अब ऐसा नहीं है। इसी कारण वाणिज्यिक वाहन चलाने वाले लोग इन्हें लेने से बच रहे हैं। इन गाड़ियों के ऋण पर ब्याज में भी कोई खास छूट नहीं मिलती, जिससे ये और महंगी पड़ती हैं।

इस समय, जबकि वाहन बाजार में स्पर्धा आ गई है और शानदार कारें उतर रही हैं, सरकार को एक बार फिर इस ओर ध्यान देना होगा। ईरान-खाड़ी युद्ध के कारण पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि भी हो सकती है। ऐसे में, इलेक्ट्रिक कारों या वाहन उद्योग को सहारा देकर सरकार एक नया रास्ता खोल सकती है। इससे अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।
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