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पश्चिमी मोर्चे पर घिरा पाकिस्तान: ईरान और अफगानिस्तान में बढ़ते तनाव से भू-राजनीतिक संकट में फंसा
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सार
ईरान व अफगानिस्तान में बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान को ऐसे भू-राजनीतिक संकट में ला दिया है, जिसे न वह अनदेखा कर सकता है, न संभाल सकता है।
पाकिस्तान की बढ़ी चिंता
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
आज पाकिस्तान अपने हालिया इतिहास के सबसे जटिल रणनीतिक क्षणों में से एक से गुजर रहा है। उसके पश्चिम पड़ोस में हो रहे घटनाक्रमों, विशेष रूप से ईरान के आसपास की उथल-पुथल और अफगानिस्तान में तालिबान शासन के साथ तेजी से बिगड़ते संबंध, ने ऐसा भू-राजनीतिक दबाव पैदा कर दिया है, जिसे वह न तो अनदेखा कर सकता है और न ही आसानी से संभाल सकता है। पाकिस्तान खुद को अनिश्चितता, आतंकी प्रतिक्रिया और भू-राजनीतिक जोखिमों से घिरा हुआ पाता है, जो आने वाले वर्षों में उसके सुरक्षा परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकते हैं।
पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा शायद ही कभी शांत रही हो, लेकिन मौजूदा हालात असामान्य रूप से पेचीदा हैं। ईरान महज एक पड़ोसी नहीं है, बल्कि एक अहम भू-राजनीतिक और आर्थिक साझेदार भी है। दोनों देशों की सीमा बलूचिस्तान के दुर्गम इलाके से गुजरती है, जो लंबे समय से अस्थिर रहा है। ईरान में उथल-पुथल से सीमा पार सक्रिय अलगाववादी नेटवर्क के मजबूत होने और अशांत प्रांत बलूचिस्तान में सुरक्षा हालात के और पेचीदा होने का खतरा है। इसके अलावा, पाकिस्तान लंबे समय से ऊर्जा की कमी से भी जूझ रहा है, इसलिए ईरानी गैस उसके लिए आकर्षक विकल्प रही है। ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन प्रतिबंधों और राजनीतिक दबावों के कारण रुकी हुई है। अगर ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो इस परियोजना में और अधिक देरी हो सकती है या यह पूरी तरह रुक सकती है, जिससे पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरियां और बढ़ जाएंगी।
इसके अलावा, ईरान के बाहर, शिया आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में ही रहता है। ईरान से जुड़ा कोई भी संघर्ष पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव भड़का सकता है। इसलिए, ईरान में होने वाली उथल-पुथल का असर पाकिस्तान में बहुत जल्द महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा, अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव भी एक अन्य समस्या है। पाकिस्तान का मानना था कि काबुल में एक दोस्ताना शासन होने से अफगानी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं होगा और वहां भारत का प्रभाव सीमित रहेगा। पर 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद दोनों के रिश्ते धीरे-धीरे खराब होते चले गए।
सबसे बड़ा विवाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की मौजूदगी को लेकर है, जिसने पाकिस्तान में कई हमलों को अंजाम दिया है। यह तनाव समय-समय पर खुलकर टकराव में बदलता रहा है। अफगान सीमा के पार कथित उग्रवादी ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए पाकिस्तानी हवाई हमलों और तालिबान नेताओं की जवाबी कार्रवाई ने दोनों के रिश्तों को खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है। डूरंड रेखा विवाद इस स्थिति को और जटिल बना देता है। इसके बावजूद, इस्लामाबाद के कुछ रणनीतिकारों को क्षेत्रीय उथल-पुथल से कुछ सीमित अवसर उभरते हुए दिखाई दे रहे हैं।
यदि ईरान बाहरी दबावों में उलझ जाता है, तो हो सकता है कि बलूच सीमा पर पाकिस्तान को ईरान की तरफ से कम निगरानी का सामना करना पड़े। इसी तरह, अफगानिस्तान का गहरा आर्थिक संकट अंततः तालिबान नेतृत्व को इस्लामाबाद के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर वार्ता के लिए मजबूर कर सकता है, खासकर तब, जब उन्हें व्यापारिक पहुंच या वित्तीय सहयोग की आवश्यकता हो। लेकिन ये केवल अनुमान हैं। असल में, जोखिम अवसरों पर भारी पड़ रहे हैं। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर चल रही मुश्किलें उसके सैन्य व खुफिया संसाधनों पर दबाव डालती हैं, जिससे उसकी पूर्वी सीमा पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है। फिर भी, भारत यह मानकर नहीं चल सकता कि पाकिस्तान के पड़ोस में अस्थिरता उसके लिए रणनीतिक लाभ बन जाएगी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ती अस्थिरता से उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां पूरे क्षेत्र में फैल सकती हैं। कट्टरपंथी नेटवर्क मजबूत हो सकते हैं, जिससे पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति और जटिल हो सकती है। इसलिए, भारत इन घटनाक्रमों को सावधानी से देखता है। इस बदलती हुई स्थिति में एक और अहम खिलाड़ी चीन है। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर जारी अस्थिरता वहां चीन के निवेश और क्षेत्रीय संपर्क योजनाओं के लिए भी खतरा पैदा करती है। इसके अलावा, अफगानिस्तान में सक्रिय उग्रवादी नेटवर्क उसके शिनजियांग क्षेत्र में मौजूद चरमपंथी समूहों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए, बीजिंग ने इस्लामाबाद और काबुल के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया है।
ईरान व अफगानिस्तान की तनावपूर्ण स्थितियों ने पाकिस्तान को एक अहम मोड़ पर ला खड़ा किया है। अगर उसकी पश्चिमी सीमा पर अस्थिरता बढ़ती है, तो इस्लामाबाद को लंबे समय तक चलने वाले सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे आर्थिक सुधार व घरेलू प्रशासन पर ध्यान देना कठिन हो जाएगा। उसे क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक एकीकरण और उग्रवादी समूहों पर निर्भरता से दूरी बनाने को प्राथमिकता देनी होगी। पर यह आसान नहीं होगा।
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पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा शायद ही कभी शांत रही हो, लेकिन मौजूदा हालात असामान्य रूप से पेचीदा हैं। ईरान महज एक पड़ोसी नहीं है, बल्कि एक अहम भू-राजनीतिक और आर्थिक साझेदार भी है। दोनों देशों की सीमा बलूचिस्तान के दुर्गम इलाके से गुजरती है, जो लंबे समय से अस्थिर रहा है। ईरान में उथल-पुथल से सीमा पार सक्रिय अलगाववादी नेटवर्क के मजबूत होने और अशांत प्रांत बलूचिस्तान में सुरक्षा हालात के और पेचीदा होने का खतरा है। इसके अलावा, पाकिस्तान लंबे समय से ऊर्जा की कमी से भी जूझ रहा है, इसलिए ईरानी गैस उसके लिए आकर्षक विकल्प रही है। ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन प्रतिबंधों और राजनीतिक दबावों के कारण रुकी हुई है। अगर ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो इस परियोजना में और अधिक देरी हो सकती है या यह पूरी तरह रुक सकती है, जिससे पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरियां और बढ़ जाएंगी।
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इसके अलावा, ईरान के बाहर, शिया आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में ही रहता है। ईरान से जुड़ा कोई भी संघर्ष पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव भड़का सकता है। इसलिए, ईरान में होने वाली उथल-पुथल का असर पाकिस्तान में बहुत जल्द महसूस किया जा सकता है। इसके अलावा, अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव भी एक अन्य समस्या है। पाकिस्तान का मानना था कि काबुल में एक दोस्ताना शासन होने से अफगानी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ नहीं होगा और वहां भारत का प्रभाव सीमित रहेगा। पर 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद दोनों के रिश्ते धीरे-धीरे खराब होते चले गए।
सबसे बड़ा विवाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की मौजूदगी को लेकर है, जिसने पाकिस्तान में कई हमलों को अंजाम दिया है। यह तनाव समय-समय पर खुलकर टकराव में बदलता रहा है। अफगान सीमा के पार कथित उग्रवादी ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए पाकिस्तानी हवाई हमलों और तालिबान नेताओं की जवाबी कार्रवाई ने दोनों के रिश्तों को खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है। डूरंड रेखा विवाद इस स्थिति को और जटिल बना देता है। इसके बावजूद, इस्लामाबाद के कुछ रणनीतिकारों को क्षेत्रीय उथल-पुथल से कुछ सीमित अवसर उभरते हुए दिखाई दे रहे हैं।
यदि ईरान बाहरी दबावों में उलझ जाता है, तो हो सकता है कि बलूच सीमा पर पाकिस्तान को ईरान की तरफ से कम निगरानी का सामना करना पड़े। इसी तरह, अफगानिस्तान का गहरा आर्थिक संकट अंततः तालिबान नेतृत्व को इस्लामाबाद के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर वार्ता के लिए मजबूर कर सकता है, खासकर तब, जब उन्हें व्यापारिक पहुंच या वित्तीय सहयोग की आवश्यकता हो। लेकिन ये केवल अनुमान हैं। असल में, जोखिम अवसरों पर भारी पड़ रहे हैं। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर चल रही मुश्किलें उसके सैन्य व खुफिया संसाधनों पर दबाव डालती हैं, जिससे उसकी पूर्वी सीमा पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है। फिर भी, भारत यह मानकर नहीं चल सकता कि पाकिस्तान के पड़ोस में अस्थिरता उसके लिए रणनीतिक लाभ बन जाएगी। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ती अस्थिरता से उग्रवादी संगठनों की गतिविधियां पूरे क्षेत्र में फैल सकती हैं। कट्टरपंथी नेटवर्क मजबूत हो सकते हैं, जिससे पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति और जटिल हो सकती है। इसलिए, भारत इन घटनाक्रमों को सावधानी से देखता है। इस बदलती हुई स्थिति में एक और अहम खिलाड़ी चीन है। पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर जारी अस्थिरता वहां चीन के निवेश और क्षेत्रीय संपर्क योजनाओं के लिए भी खतरा पैदा करती है। इसके अलावा, अफगानिस्तान में सक्रिय उग्रवादी नेटवर्क उसके शिनजियांग क्षेत्र में मौजूद चरमपंथी समूहों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए, बीजिंग ने इस्लामाबाद और काबुल के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया है।
ईरान व अफगानिस्तान की तनावपूर्ण स्थितियों ने पाकिस्तान को एक अहम मोड़ पर ला खड़ा किया है। अगर उसकी पश्चिमी सीमा पर अस्थिरता बढ़ती है, तो इस्लामाबाद को लंबे समय तक चलने वाले सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे आर्थिक सुधार व घरेलू प्रशासन पर ध्यान देना कठिन हो जाएगा। उसे क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक एकीकरण और उग्रवादी समूहों पर निर्भरता से दूरी बनाने को प्राथमिकता देनी होगी। पर यह आसान नहीं होगा।
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