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तो ये था यूनुस का एजेंडा: अंतरिम शासन से अस्थिरता तक, 18 महीने में बांग्लादेश की राजनीति में नया मोड़

Prashant Dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Tue, 17 Mar 2026 06:29 AM IST
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सार

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के 18 महीने का कार्यकाल विवादों और अस्थिरता से भरा रहा। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के चौंकाने वाले खुलासे ने यह स्पष्ट कर दिया कि यूनुस ने गैर-सांविधानिक तरीकों से देश को असुरक्षित बनाया। अब बीएनपी सरकार के सामने सामरिक रिश्तों को सुधारने की बड़ी चुनौती है।

Muhammad Yunus tenure controversy political instability in Bangladesh Mohammed Shahabuddin BNP India Pakistan
नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

लगता है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार के आने के साथ ही बांग्लादेश को मोहम्मद यूनुस के चंगुल से बचा लिया गया है। बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के उस चौंकाने वाले बयान पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने कहा कि अंतरिम सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने 18 महीने के कार्यकाल के दौरान गैर-सांविधानिक तरीकों से देश को अस्थिर करने की कोशिश की, जिसमें उन्हें हटाने की कोशिश भी शामिल थी।
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राष्ट्रपति के अनुसार, उन्हें सभी फैसले लेने और उसके बाद के कामों से अलग कर दिया गया था। बांग्लादेश के सभी विदेशी मिशनों से उनकी तस्वीर हटाने का कदम सबसे ज्यादा स्पष्ट था। इस एक काम से यह स्पष्ट हो गया कि यूनुस बिना किसी से सलाह किए अपने बनाए एक बुरे एजेंडे पर काम कर रहे थे। शायद इसमें विदेशी ताकतों का भी हाथ था।
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यूनुस के एकतरफा कामों के ऐसे ही कई मामले सामने आए। मार्च 2025 में चीन के दौरे के दौरान, उन्होंने राजनीतिक बयान दिए, जिसमें भारत के सात पूर्वोत्तर राज्यों (सेवन सिस्टर्स) को समुद्री रास्ते के लिए बांग्लादेश पर निर्भर जमीन से घिरे इलाकों के तौर पर पेश किया गया, और चीन को इस इलाके में अपना आर्थिक असर बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया गया। यूनुस ने कहा कि भारत के सात पूर्वोत्तर राज्यों की समुद्र तक सीधी पहुंच नहीं है, जिससे बांग्लादेश ‘इस पूरे इलाके के समुद्र का एकमात्र रक्षक’ बन गया।

बीजिंग में एक उच्च स्तरीय गोलमेज सम्मेलन में, यूनुस ने सुझाव दिया कि पूर्वोत्तर क्षेत्र, बांग्लादेश के जरिये चीनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने का काम कर सकता है। उन्होंने बांग्लादेश के इलाके और बंदरगाह (जैसे चटगांव और मोंगला) को व्यापार के लिए इस्तेमाल करने का सुझाव दिया, ताकि चीन को इस इलाके में ‘विनिर्माण, उत्पादन, विक्रय’ का मौका मिले। उन्होंने ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और ‘पूर्वोत्तर’ को शामिल करते हुए एक ‘एकीकृत आर्थिक योजना’ बनाने का आह्वान किया। जनवरी 2026 में सबसे चिंताजनक खबर यह आई कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने अमेरिका के एक राजदूत को जो किताब तोहफे में भेंट की थी, उसमें ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ के नक्शे में भारत के पूर्वोत्तर राज्य भी शामिल थे।

इससे पहले अक्तूबर, 2025 में एक रिपोर्ट आई थी कि पाकिस्तान के जनरल शमशाद मिर्जा, जो फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बाद दूसरे नंबर के सैन्य अधिकारी हैं, संपर्क, व्यापार और रक्षा भागीदारी बढ़ाने के लिए ढाका का दौरा कर रहे थे। जनवरी, 2025 में दोनों सेनाओं के बीच रिश्ते फिर से शुरू होने के बाद से मिर्जा ढाका जाने वाले सबसे वरिष्ठ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी हैं। खबरें थीं कि मिर्जा पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से से सटे कुछ सीमाई इलाकों का दौरा कर सकते हैं।

याद करें कि पाकिस्तानी जासूसी एजेंसी आईएसआई ने शेख हसीना के सत्ता से हटने के कुछ ही महीनों के भीतर बांग्लादेश में अपना असर जमाने की कोशिश की। क्या अंतरिम सलाहकार ऐसी कार्रवाई को बढ़ावा दे रहे थे? एक पक्की खबर यह थी कि बांग्लादेश भारत को उसके पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाले बहुत पतले कॉरिडोर ‘चिकन नेक’ के पास लालमोनिरहाट में एक एयर बेस बना रहा था। इससे भी बुरी बात यह थी कि इसे चीन बना रहा था, जो इस काम को पाकिस्तानी कॉन्ट्रैक्टर (ठेकेदार) के जरिये अंजाम दे रहा था।
चीन के साथ मिलकर बनाए गए जेएफ-17 लड़ाकू विमान की बिक्री के लिए पाकिस्तान के जोरदार प्रमोशन का समय कोई इत्तेफाक नहीं है। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव के बाद, पाकिस्तानी अधिकारियों और सैन्य नेताओं ने जेएफ-17 को ‘लड़ाई में परखा हुआ’ दिखाने की कोशिश की थी, और दावा किया था कि इसके ऑपरेशनल इस्तेमाल ने इसकी विश्वसनीयता साबित कर दी है।

इस तर्क पर विवाद होने और स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि न होने के बावजूद, पाकिस्तान ने दुनिया भर में विमान की मार्केटिंग के लिए इसी कहानी का सहारा लिया है। हालांकि, जेएफ-17 सिर्फ अजरबैजान, नाइजीरिया और म्यांमार को ही बेचा गया है और बांग्लादेश एक खास संभावित ग्राहक के तौर पर उभरा है। यह रक्षा बातचीत पाकिस्तान-बांग्लादेश रिश्तों में आम गर्मजोशी के साथ हुई। एक दशक से ज्यादा समय के बाद, ढाका और कराची के बीच सीधी उड़ान फिर से शुरू हुई, जो राजनयिक और आम लोगों के बीच जुड़ाव में सुधार का संकेत है।

यूनुस के कार्यकाल में सैन्य संपर्क भी बढ़े थे, और आधिकारिक बयानों में दोनों तरफ से पुरानी शिकायतों से ऊपर उठकर सहयोग पर जोर दिया गया था। यूनुस सरकार की तरफ से, इन्हें कई कूटनीतिक और रक्षा चैनल खुले रखने के लिए विविधता के तौर पर बताया जा रहा था। सच में, एक सलाहकार के तौर पर, ऐसे कामों को बढ़ावा देना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। इन कामों को करने की जिम्मेदारी चुनी हुई सरकार की थी।

शेख हसीना के ढाका से पलायन के बाद जब यूनुस को अंतरिम सलाहकार नियुक्त किया गया, तो कई टिप्पणीकारों ने इस पर आश्चर्य और चिंता जताई। उनका मानना था कि यह नियुक्ति अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ के प्रभाव में हुई है, जिसने नोबेल पुरस्कार पाने के बाद यूनुस को इस पद के लिए उपयुक्त मान लिया। लेकिन उनके कॅरिअर के विकास में कुछ काली परछाइयों को ताकतवर लोगों ने नजरअंदाज कर दिया।

सबसे पहले, तो यह यूनुस और ग्रामीण बैंक के लिए एक संयुक्त पुरस्कार था और बाद में यूनुस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। हालांकि, बाद में देश के भ्रष्टाचार विरोधी आयोग द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार मामले में उन्हें अंतरिम सरकार चलाने के लिए शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद बरी कर दिया गया। यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला था।

जाहिर है, बीएनपी सरकार के सामने भारत और बांग्लादेश के बीच इतने वर्षों में बने सामरिक रिश्तों को हुए नुकसान को ठीक करने की चुनौती होगी। यह पता लगाने की भी जरूरत है कि क्या यूनुस एक ‘अपराध के लिए उकसाने वाले’ की भूमिका निभा रहे थे। ऐसा लगता है कि उनके काम बांग्लादेश के हित में नहीं थे, बल्कि वह सत्ता में अपनी जगह बनाए रखने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए थे।
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