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धमाके जो कभी हुए ही नहीं: युद्ध में झूठी तस्वीरों से फैल रहा डर और भ्रम, डिजिटल प्रोपेगेंडा का हथियार बना एआई

स्टुअर्ट ए थॉम्पसन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 18 Mar 2026 05:50 AM IST
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सार

पश्चिम एशिया के संघर्ष में एआई युद्ध का टूल बन गया है, जिससे तैयार फर्जी वीडियो व तस्वीरें ईरान की रणनीति का अहम हिस्सा बन गई हैं। इनके जरिये डर व सहानुभूति पैदा करने के साथ यह संदेश भी दिया जा रहा है कि युद्ध अमेरिका व उसके साथियों के लिए कहीं ज्यादा नुकसानदायक साबित हुआ है।

Israel Iran War False images spread fear and confusion AI becomes weapon of digital propaganda US
पश्चिम एशिया संघर्ष - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

ईरान में चल रहे युद्ध के शुरुआती हफ्तों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार किए गए तमाम फर्जी वीडियो और तस्वीरों ने सोशल मीडिया को पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इन वीडियो में ऐसे भयावह और चौंकाने वाले दृश्य दिखाए जा रहे हैं-जैसे विशाल धमाके, जो कभी हुए ही नहीं; तबाह पड़ी शहरों की सड़कें, जिन पर हमला नहीं हुआ; या युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन करते सैनिक, जिनका असल में कोई वजूद ही नहीं है। इन दृश्यों ने युद्ध को और भी अधिक अराजक, भ्रामक और उलझन भरा बना दिया है। ये फर्जी सामग्रियां युद्ध के हर पहलू को दिखाने की कोशिश करती हैं-कहीं तेल अवीव में धमाकों के बीच सहमे और चीखते इस्राइली नागरिकों के झूठे दृश्य दिखाए गए हैं, तो कहीं ईरान में अपने मृतकों पर शोक जताते लोगों की काल्पनिक तस्वीरें पेश की गई हैं। यहां तक कि अमेरिकी सैन्य जहाजों पर मिसाइल और टॉरपीडो से हमले के गढ़े हुए वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे हैं।
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झूठ और भ्रामक जानकारी के इस मायाजाल को एक्स (पहले ट्विटर), टिकटॉक और फेसबुक जैसे विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर करोड़ों बार देखा गया, और निजी मैसेजिंग एप्स के जरिये यह गलत जानकारी दुनिया भर के लोगों तक तेजी से पहुंची। आज के दौर में आधुनिक एआई उपकरणों ने इस तरह के फर्जी कंटेंट बनाना बेहद आसान कर दिया है। कोई भी व्यक्ति असली लगने वाले ऐसे वीडियो बना सकता है, जो आम लोगों को आसानी से भ्रमित कर सकते हैं।
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हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी इस तरह की चीजें सामने आई थीं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर अमेरिका और इस्राइल के हमलों के बाद से युद्ध आधारित फर्जी कंटेंट की बाढ़ आ गई है। कतर की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी में मीडिया एनालिटिक्स के प्रोफेसर मार्क ओवेन जोंस के मुताबिक, ‘यूक्रेन युद्ध की शुरुआत की तुलना में आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। हम शायद आज इतिहास में सबसे अधिक एआई-जनित कंटेंट का सामना कर रहे हैं, जो पहले कभी नहीं देखा गया।’ एआई से तैयार यह कंटेंट अब तेहरान के लिए एक मजबूत सूचनात्मक हथियार बन गया है। इसके जरिये युद्ध की डरावनी और तबाही भरी तस्वीरें दिखाकर लोगों के मन में युद्ध को लेकर डर, बेचैनी और सहानुभूति पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं। सोशल मीडिया एनालिसिस कंपनी सायब्रा की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे ज्यादातर एआई वीडियो ईरान के पक्ष में माहौल बनाने का काम करते हैं और उसकी सैन्य ताकत और तकनीक को हकीकत से ज्यादा बड़ा दिखाते हैं। जोंस का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र की एआई से बनी ऐसी तस्वीरें, जिनमें शहरों को जलता या टूटता हुआ दिखाया जाता है, ईरान की रणनीति का अहम हिस्सा बन गई हैं। उनका कहना है कि इन तस्वीरों के जरिये यह संदेश देने की कोशिश होती है कि यह युद्ध अमेरिका के सहयोगियों के लिए हकीकत से कहीं ज्यादा खतरनाक और नुकसानदायक साबित हुआ है।

ऑनलाइन वायरल हुए सबसे ज्यादा शेयर किए गए नकली वीडियो में से एक में तेल अवीव के एक अपार्टमेंट की बालकनी से लिया गया हिलता-डुलता दृश्य दिखाया गया है। इसमें शहर के आसमान में मिसाइल हमले होते नजर आते हैं और सामने इस्राइली झंडा भी दिखाई देता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन वीडियो में दिखाई देने वाला गलत इस्राइली झंडा ही उनके फर्जी और एआई से बना होने का सबसे बड़ा सुराग है। दूसरी तरफ, असली युद्ध के वीडियो भी बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं, जिन्हें लोग अपने मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के जरिये तुरंत साझा कर रहे हैं। ये असली वीडियो, एआई से बनाए गए वीडियो के मुकाबले ज्यादा शांत और सामान्य लगते हैं। असली वीडियो में मिसाइल हमले अक्सर रात के वक्त और काफी दूरी से रिकॉर्ड किए जाते हैं, जहां मिसाइलें आसमान में केवल रोशनी के चमकते बिंदुओं जैसी दिखती हैं। इसके उलट, कई एआई वीडियो और तस्वीरों में युद्ध को एक फिल्मी अंदाज में दिखाया गया है, मानो कोई हॉलीवुड एक्शन फिल्म चल रही हो। इनमें बड़े-बड़े धमाके, मशरूम जैसे उठते बादल, शहरों को हिला देने वाली ‘सोनिक बूम’ की लहरें और आसमान में चमचमाती हाइपरसोनिक मिसाइलें दिखाई जाती हैं। कुछ मामलों में असली वीडियो को भी एआई की मदद से और ज्यादा नाटकीय बना दिया जाता है, ताकि धमाके ज्यादा बड़े और खतरनाक लगें। इससे असली और नकली के बीच फर्क करना और मुश्किल हो जाता है।

दर्जनों अन्य एआई तस्वीरों और वीडियो ने तो यह छिपाने की कोशिश भी नहीं की कि वे नकली हैं, बल्कि वे एक तरह के डिजिटल प्रचार (प्रोपेगेंडा) की तरह इस्तेमाल किए जा रहे थे, जिनका मकसद सरकारों या उनके समर्थकों के विचारों को मजबूत तरीके से दिखाना था। इनमें विश्व नेताओं को शक्तिशाली पुरुषों के रूप में महिमामंडित करने वाले चित्रण, या विपक्षी नेताओं को अमानवीय रूप में दिखाने वाले चित्रण भी शामिल थे। इसी तरह, एक पूरी तरह काल्पनिक वीडियो भी सामने आया, जिसमें एक प्राइमरी स्कूल का दृश्य दिखाया गया। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी को अमेरिका द्वारा एक कथित तौर पर गलती से दागी गई मिसाइल इस स्कूल पर गिर गई थी। ईरानी अधिकारियों का दावा था कि इस हमले में कम से कम 175 लोगों की मौत हुई, जिनमें ज्यादातर बच्चे थे। एआई से बनाए गए इन वीडियो को छोटी फिल्मों की तरह पेश किया गया, जिनमें पहले स्कूल की बच्चियों को खेलते हुए दिखाया जाता है, और फिर अचानक एक अमेरिकी लड़ाकू विमान आकर मिसाइल दाग देता है।

इस सबके बावजूद, सोशल मीडिया कंपनियां अब तक एआई से बने फर्जी वीडियो की समस्या को रोकने के लिए ज्यादा ठोस कदम नहीं उठा पाई हैं। हालांकि, अब एक्स ने ऐलान किया है कि जो खाते सशस्त्र संघर्ष जैसे संवेदनशील विषयों से जुड़ा एआई कंटेंट बिना यह बताए पोस्ट करेंगे कि वह नकली है, उन्हें 90 दिनों तक कमाई करने से रोका जाएगा। इसका मकसद उपयोगकर्ताओं को गलत जानकारी से फायदा उठाने से रोकना है। सायब्रा की जांच में सामने आया कि ईरान से जुड़े कई खातों का मकसद पैसे कमाना नहीं, बल्कि अपने संदेश को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की फेलो और विदेश नीति व एआई पर काम करने वाली वैलेरी विर्टशाफ्टर के अनुसार, एआई भी एक तरह का युद्ध का हथियार बन चुका है।
- साथ में अलेक्जेंडर कार्डिया       ©The New York Times 2026
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