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Opinion: इस बजट में समस्याओं का व्यावहारिक समाधान है, लेकिन घरेलू बाजार को बढ़ावा देना जरूरी
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बजट 2026
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अमर उजाला
विस्तार
केंद्रीय बजट 2026-27 दो बेहद महत्वपूर्ण कारणों से अहम है। पहला, यह बजट ऐसे समय में पेश किया गया है, जब भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता का सामना कर रही है। दूसरा, यह राज्यों के लिए 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के पहले वर्ष का बजट है। हालांकि, आर्थिक सर्वेक्षण में भारत की विकास दर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सात फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है, पर वैश्विक अस्थिरता के बीच इसे लंबे समय तक बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। बजट ने इस चिंता को बेहद व्यावहारिक तरीके से सुलझाने की कोशिश की है।इस बार के बजट का मुख्य केंद्र सेवा क्षेत्र के विकास को मजबूत करने पर लग रहा है। इनमें नई तकनीकों के सेवा क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक समिति के गठन की घोषणा शामिल है। इसके अलावा, भारत में डाटा सेंटर स्थापित कर क्लाउड सेवाएं देने वाली विदेशी कंपनियों को वर्ष 2047 तक टैक्स छूट देने का ऐलान किया गया है। बजट में 'विकसित भारत 2047' के सपने को साकार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का भी ऐलान किया गया है, जो भारत में एक आधुनिक और नए जमाने की बैंकिंग प्रणाली की रूपरेखा तैयार करेगी।
कर व्यवस्था के मोर्चे पर, खासकर प्रत्यक्ष करों के संदर्भ में, वर्ष 2025-26 में घोषित प्रत्यक्ष कर ढांचे को आगे भी जारी रखना निश्चित रूप से एक स्वागतयोग्य कदम है। व्यक्तिगत आयकर की दरों में कोई बदलाव न करना राजस्व की स्थिरता और निश्चितता के लिहाज से सकारात्मक निर्णय है। वहीं, कॉरपोरेट टैक्स छूटों के युक्तिकरण से प्रभावी कॉरपोरेट कर दर लगभग 22 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद है। भारत के वित्तीय बाजार को और मजबूत तथा स्थिर बनाने के उद्देश्य से वित्त मंत्री ने कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को गहराई देने के लिए एक रूपरेखा, विदेशी व्यक्तियों के लिए भारतीय इक्विटी में निवेश का एक नया मार्ग, और सूचीबद्ध कंपनियों में निवेशकों के लिए स्वामित्व की सीमा बढ़ाने की घोषणा की है। बजट की सबसे बड़ी खूबियों में से एक है 'राजकोषीय सुदृढ़ीकरण' की प्रक्रिया को जारी रखना।
सरकार वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान में तय किए गए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर कायम रहने में सफल रही है। वहीं, वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही, 2026-27 के दौरान ऋण-जीडीपी अनुपात के भी 2025-26 के स्तर से नीचे आने की उम्मीद है। हालांकि, जीडीपी के मुकाबले ब्याज भुगतान का अनुपात अब भी ऊंचा बना हुआ है, इसलिए मध्यम अवधि में कर्ज चुकाने की लागत को कम करना केंद्र सरकार के राजकोषीय ढांचे की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सामाजिक क्षेत्र की बात करें, तो इस बजट का सबसे बड़ा जोर पूर्वोत्तर राज्यों और देश के पूर्वी क्षेत्रों पर रहा है, जहां क्षेत्रीय निवेश और संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों की घोषणा की गई है।
राहत की बात है कि 16वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को सुझाया गया ऊर्ध्वाधर संसाधन हस्तांतरण 41 प्रतिशत पर यथावत रखा गया है। इससे राज्यों को मिलने वाले केंद्रीय संसाधनों के प्रवाह में निरंतरता बनी रहेगी। भविष्य की बात करें, तो सरकार की प्राथमिकताओं में संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करना, आर्थिक वृद्धि को मजबूती देना और घरेलू बाजार के संचालन में सुधार शामिल होना चाहिए। घरेलू बाजार को बढ़ावा देना जरूरी होगा, क्योंकि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के कारण मध्यम अवधि में वैश्विक मांग अस्थिर रहेगी। बजट में प्रस्तावित ढांचा समावेशी है और दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ विकास पर केंद्रित नजर आता है।
