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संतुलित विकास का रोडमैप: विनिर्माण रणनीति को धार दी, बैलेंस शीट की कमजोरी दूर करने की कोशिश

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सार
बजट की सफलता घोषणाओं पर कम और क्रियान्वयन पर ज्यादा निर्भर करेगी। अगर इसे योजना के अनुसार लागू किया जाता है, तो यह आने वाले वर्षों में स्थायी और कम लागत वाली वृद्धि की नींव को मजबूत करेगा।
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Roadmap for balanced growth Manufacturing strategy sharpened balance sheet weakness addressed
बजट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार
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ऐसे समय में, जब वैश्विक आर्थिक वृद्धि अनिश्चितता से घिरी है, केंद्रीय बजट 2026-27 एक स्पष्ट आर्थिक दृष्टिकोण को मजबूती देता है। यह बजट राजकोषीय विश्वसनीयता बनाए रखने, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश को जारी रखने और उन संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने पर केंद्रित है, जो कंपनियों और आम परिवारों की लागत बढ़ाते हैं। नतीजतन, यह आर्थिक मोर्चे पर संतुलित व सतर्क, पूंजी निर्माण के मामले में उदार, और सुधारों के स्तर पर विवेकपूर्ण नजर आता है।

इसका मुख्य आधार राजकोषीय ढांचा ही बना हुआ है। वर्ष 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.3 प्रतिशत तय किया गया है, जो 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 4.4 प्रतिशत से थोड़ा बेहतर है। उधारी सीमित है, राजस्व व्यय नियंत्रण में है और बजट से हटकर (ऑफ-बजट) किसी भी अन्य व्यवस्था पर कोई निर्भरता नहीं है। नतीजतन केंद्र सरकार का ऋण-जीडीपी अनुपात कम होना शुरू हो गया है। इससे न सिर्फ सरकारी उधारी के कारण निजी निवेश पर पड़ने वाला दबाव कम होगा, बल्कि बॉन्ड यील्ड स्थिर रहेंगी और निजी क्षेत्र के लिए पूंजी की लागत भी घटेगी।


बजट में पूंजीगत व्यय 12.2 लाख करोड़ रुपये प्रस्तावित किया गया है, जो पिछले साल की तुलना में लगभग नौ प्रतिशत ज्यादा है। बजट का मुख्य जोर परिवहन, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा प्रणालियों और शहरी बुनियादी ढांचे पर बना हुआ है। लगातार पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) से लॉजिस्टिक्स लागत घटती है, उत्पादकता में सुधार होता है और निजी निवेश के लिए मांग का एक स्थिर और भरोसेमंद माहौल तैयार होता है। बजट में एक अहम संस्थागत पहल के रूप में इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड की घोषणा की गई है। इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को आंशिक क्रेडिट गारंटी देना है, ताकि शुरुआती चरण के उस जोखिम को कम किया जा सके, जो अक्सर दीर्घकालिक निजी निवेश को रोकते हैं। बजट ने क्षेत्रीय और भौगोलिक, दोनों स्तरों पर अपनी विनिर्माण रणनीति को और धार दी है। सात रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों को लक्षित समर्थन के लिए चिह्नित किया गया है, जिनमें उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, बायोफार्मा, रसायन, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े घटक और अन्य महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखला के क्षेत्र शामिल हैं। इसके साथ ही, सरकार ने 200 पुराने औद्योगिक क्लस्टरों के उन्नयन का संकल्प लिया है, ताकि लागत के स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई जा सके।

एमएसएमई के लिए 10,000 करोड़ रुपये का एमएसएमई ग्रोथ फंड स्थापित किया जाएगा। इसका मकसद केवल कर्ज बढ़ाने के बजाय उद्यमों की बैलेंस शीट की कमजोरी को दूर करना है। इसके अलावा, पेशेवर सहयोग नेटवर्क तैयार किए जाएंगे, जिनके तहत विषय विशेषज्ञों को तैनात कर एमएसएमई को अनुपालन, प्रमाणन, तकनीक अपनाने और बाजार तक पहुंच में मदद दी जाएगी, खासकर द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में। एकीकृत क्षेत्रीय आर्थिक योजनाओं को लागू करने के लिए बजट में प्रत्येक शहरी आर्थिक क्षेत्र के लिए पांच वर्षों तक प्रतिवर्ष 5,000 करोड़ का प्रस्ताव दिया गया है। उम्मीद है कि इससे दीर्घकालिक रोजगार सृजन होंगे। बजट में सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर काम को आगे बढ़ाया जाएगा, जिन्हें केवल अलग-थलग परिवहन परियोजनाओं के बजाय ऐसे विकास सेतु के रूप में तैयार किया जाएगा, जो श्रम बाजारों और क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं को आपस में जोड़ सकें। इसके साथ ही बजट में कर और व्यापार सुविधा से जुड़े कई लक्षित सुधार पेश किए गए हैं।

व्यक्तिगत उपयोग के लिए आयात किए जाने वाले सामान पर सीमा शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे न केवल नागरिकों को सीधे तौर पर लाभ होगा, बल्कि उस श्रेणी का भी सरलीकरण होगा, जिसमें राजस्व की तुलना में विवाद अधिक होते थे। इस बजट की सफलता घोषणाओं पर कम और क्रियान्वयन पर ज्यादा निर्भर करेगी, खासकर एमएसएमई भुगतान सुधारों, इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी और सिटी-रीजन नियोजन जैसे क्षेत्रों में। अगर इसे योजना के अनुसार लागू किया जाता है, तो यह आने वाले वर्षों में स्थायी, कम लागत वाली वृद्धि के लिए नींव को मजबूत करेगा।
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