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पद्म पुरस्कारों का जनतंत्रीकरण: अभिजात वर्ग की धरोहर से बदलकर बने जनता का पुरस्कार

प्रो. तारिक मंसूर Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 29 May 2026 07:25 AM IST
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सार
इन पुरस्कारों को लेकर मोदी सरकार की प्रमुख विशेषता उन क्षेत्रों में सुधार लाने की इच्छाशक्ति रही है, जहां पूर्ववर्ती सरकारें या तो असफल रहीं अथवा राजनीतिक संकल्प के अभाव में आगे नहीं बढ़ सकीं। मुख्य चुनौती यह थी कि इन पुरस्कारों को ‘अभिजात वर्ग की धरोहर’ से बदलकर ‘जनता का पुरस्कार’ बनाया जाए, जो उनकी समावेशिता और लोकतंत्र को गहरा करने की मूल भावना के अनुरूप हो।
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Democratizing the Padma Awards From an elite heritage to a people's award
पद्म पुरस्कार - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

मार्टिन लूथर किंग, जूनियर ने कहा था ‘हर व्यक्ति महान बन सकता है, क्योंकि हर व्यक्ति सेवा कर सकता है।’ महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘स्वयं को खोजने का सर्वोत्तम तरीका है-स्वयं को दूसरों की सेवा में समर्पित कर देना।’ एक सफल लोकतंत्र सार्वजनिक जीवन में सेवा की भावना को आत्मसात करता है। हमारे पद्म पुरस्कार इसी लोकतांत्रिक आदर्श को साकार करने का प्रयास करते हैं। यद्यपि, इन पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं के नाम जन-रुचि और कभी-कभी विवाद का विषय बनते हैं, फिर भी इनका जटिल इतिहास, कानूनी चुनौतियां और राजनीतिक परिवर्तन सामान्य जनचेतना से काफी हद तक ओझल रहे हैं।


दिलचस्प है कि संविधान सभा में पद्म पुरस्कारों पर चर्चा ही नहीं हुई थी। संविधान में अनुच्छेद 18 शामिल किया गया, जो राज्य को उपाधियां प्रदान करने से प्रतिबंधित करता है। हालांकि, तीव्र विरोध के बावजूद, आजादी के बाद दो जनवरी, 1954 को पद्म पुरस्कारों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। किंतु, स्थापना के बाद से ही पद्म पुरस्कारों के प्रति असंतोष उभरने लगा। पहला बड़ा कदम तब आया, जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 1978-79 के दौरान इन पुरस्कारों को निलंबित कर दिया। हालांकि, 1980 में इन्हें पुनः बहाल किया गया। 1993 से 1997 के बीच विभिन्न उच्च न्यायालयों में जनहित याचिकाएं दायर कर इन पुरस्कारों की सांविधानिक वैधता को चुनौती दी गई। अंततः, मामला सर्वोच्च न्यायालय में बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996) में निर्णीत हुआ, जिसमें इन पुरस्कारों को सांविधानिक माना गया। फिर भी, एक धारणा लगातार प्रबल होती गई कि उत्तरवर्ती सरकारों ने इन पुरस्कारों को योग्यता के बजाय प्रभाव और प्रसिद्धि से जोड़ दिया है।


इन पुरस्कारों को लेकर मोदी सरकार की प्रमुख विशेषता उन क्षेत्रों में सुधार लाने की इच्छाशक्ति रही है, जहां पूर्ववर्ती सरकारें या तो असफल रहीं अथवा राजनीतिक संकल्प के अभाव में आगे नहीं बढ़ सकीं। मुख्य चुनौती यह थी कि इन पुरस्कारों को ‘अभिजात वर्ग की धरोहर’ से बदलकर ‘जनता का पुरस्कार’ बनाया जाए, जो उनकी समावेशिता और लोकतंत्र को गहरा करने की मूल भावना के अनुरूप हो। एक महत्वपूर्ण सुधार ‘गेट-कीपर’ संस्कृति (कुछ खास लोगों या सरकारी तंत्र का नियंत्रण) को समाप्त करना और आम नागरिकों के लिए सार्वजनिक नामांकन पोर्टल शुरू करना था। मोदी सरकार ने चयन के मानदंडों को केवल ‘उत्कृष्टता’ तक सीमित न रखकर ‘जमीनी स्तर पर सेवा’ को भी महत्व दिया। यह परिवर्तन नागरिक अलंकरण समारोहों में दिखाई देने वाले चेहरों में स्पष्ट झलकता है, चाहे वह कर्नाटक की हलक्की जनजाति की 84 वर्षीय नंगे पांव पर्यावरण संरक्षक हों; या नगालैंड के एक साधारण फल किसान, जिन्होंने किसानों को गैर-स्थानीय फसलों के बारे में प्रशिक्षित किया; अथवा तमिलनाडु की भरतनाट्यम नृत्यांगना, जिन्हें प्रथम ट्रांसजेंडर पुरस्कार प्राप्तकर्ता के रूप में सम्मानित किया गया।

राष्ट्रपति भवन के भव्य प्रांगण में उत्कृष्टता प्राप्त व्यक्तियों के साथ-साथ ‘अनसुने नायकों’ की सेवा का सम्मान करना हमारी ‘एकता में विविधता’ की अनूठी अभिव्यक्ति है। 2026 का नागरिक अलंकरण समारोह राष्ट्र निर्माण के इसी पूरक, न कि प्रतिस्पर्धी, स्वरूप का एक और उदाहरण पेश करता है। -लेखक एएमयू के पूर्व कुलपति तथा उत्तर प्रदेश विधान परिषद के मनोनीत सदस्य हैं।
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