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Dual economic challenge Rising global crude oil prices challenge for india rupee fall inflation
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दोहरी आर्थिक चुनौती: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी झुलसाने लगी भारतीयों की जेब
अमर उजाला
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 02 May 2026 06:22 AM IST
आशंकाओं के विपरीत, सरकार ने फिलहाल पेट्रोल, डीजल व घरेलू एलपीजी की कीमतों में वृद्धि नहीं करने का फैसला लिया है, पर तेल कंपनियों के लिए अब पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना संभव नहीं होगा।
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पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत पर दिखने लगा असर
- फोटो :
अमर उजाला प्रिंट
ईरान-अमेरिका वार्ता को लेकर अनिश्चितता के मद्देनजर ईरान पर बढ़ते अमेरिकी दबाव ने जहां, कच्चे तेल की कीमतों को लगभग चार साल के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया, वहीं घरेलू मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपया भी 95 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। जाहिर है, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारतीयों की जेब को झुलसाना शुरू कर दिया है। 19 किलो वाली व्यावसायिक एलपीजी की कीमत में औसतन 993 रुपये की वृद्धि हुई है, जिससे रेस्तरां, भोजनालयों और अन्य व्यवसायों पर भारी असर पड़ने की आशंका है। आशंकाओं के विपरीत, सरकार ने फिलहाल पेट्रोल, डीजल व घरेलू एलपीजी की कीमतों में वृद्धि नहीं करने का फैसला लिया है, पर तेल कंपनियों के लिए अब पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना संभव नहीं होगा। सरकार के लिए स्थिति बेहद नाजुक है, क्योंकि यदि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि की जाती है, तो तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति में सुधार तो होगा, लेकिन इससे महंगाई बढ़ेगी। अलबत्ता संभव है कि पहले की तरह ही पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी की जाएगी, ताकि अचानक से उपभोक्ताओं को झटका न लगे। दरअसल, आर्थिक मोर्चे पर इस दोहरी मार के मुख्यतः तीन कारण हैं। पहला, ब्रेंट क्रूड का 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना, जिससे भारत का व्यापार घाटा व चालू खाते का घाटा और बढ़ने का डर है। दूसरा, शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार निकासी कर रहे हैं। और तीसरा कारण है, अमेरिका में 10 वर्ष वाली प्रतिभूतियों पर ब्याज दर बढ़कर 4.4 प्रतिशत होने से बाजार से एफआईआई की निकासी और बढ़ने की आशंका है। अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह अपनी नौसैनिक नाकेबंदी में कोई ढील नहीं देगा, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को नहीं रोकने पर अडिग है। उधर होर्मुज से कच्चे तेल की आपूर्ति की समस्या लगातार बनी हुई है, जिसमें भारत के भी कई टैंकर फंसे हुए हैं। नतीजतन, आपूर्ति में रुकावटें लंबे समय तक बनी रह सकती हैं। आयात बिल बढ़ने से चालू खाते का घाटा भी बढ़ेगा। एक मोटे आकलन के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की वृद्धि आयात बिल को हजारों करोड़ रुपये बढ़ा देती है। ऐसे में, तेल कंपनियों की तरफ से डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिसका असर रुपये पर भी होगा। कुल मिलाकर, कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि और कमजोर रुपया देश में महंगाई बढ़ा सकते हैं। नतीजतन, देश की विकास दर पर भी नकारात्मक असर पड़ने का खतरा है।
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