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संस्कृति के पन्नों से: पुराणों में कैसे होती है काल-गणना

Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 03 May 2026 06:42 AM IST
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सार
कृतयुग सत्रह लाख अट्ठाईस हजार, त्रेतायुग बारह लाख छियानबे हजार तथा द्वापरयुग आठ लाख चौंसठ हजार मानुष-वर्षों का होता है। कलियुग का मान चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का बताया गया है।
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पुराणों में वर्णित काल की गणना - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

एक बार ऋषियों ने सूतजी से स्वयंभुव-मन्वंतर के चारों युगों के विषय में सुनने की इच्छा व्यक्त की। तब सूतजी ने ऋषियों को इस विषय में विस्तार से बताया।


पंद्रह निमेष (आंख के खोलने और मूंदने का समय) एक काष्ठा है और तीस काष्ठा एक कला मानी जाती है। तीस कला का एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्त के रात-दिन, दोनों होते हैं। सूर्य मानवीय लोक में दिन-रात का विभाजन करते हैं। रात्रि जीवों के शयन के लिए और दिन कर्म करने के लिए है। पितरों के रात-दिन का एक लौकिक मास होता है। मनुष्यों के तीस मास की अवधि पितरों का एक मास कहलाता है। इस प्रकार तीन सौ साठ मानव-मासों का एक पितृ-वर्ष होता है। मानवीय गणना के अनुसार, एक सौ वर्ष पितरों के तीन वर्ष के बराबर माने गए हैं। एक मानव-वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है।

देवताओं के रात-दिन में भी विभाग हैं। उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को रात्रि कहते हैं। तीस मानवीय वर्षों का एक दिव्य मास होता है। इस प्रकार सौ मानवीय वर्षों का तीन दिव्य मास माना जाता है। मानुष गणना के अनुसार, तीन सौ साठ वर्षों को एक दिव्य (देव) वर्ष कहा गया है। तीन हजार तीस वर्षों का एक सप्तर्षि-वर्ष होता है। नौ हजार नब्बे मानुष-वर्षों का एक ‘ध्रुव-संवत्सर’ कहलाता है। छियानबे हजार मानुष-वर्षों से एक हजार दिव्य वर्ष बनता है। युग, चार हैं-कृत, त्रेता, द्वापर और कलि।


इनमें पहले कृतयुग, फिर त्रेता, तब द्वापर और अंत में कलियुग की परिकल्पना की गई है। कृतयुग चार हजार (दिव्य) वर्षों का बताया जाता है। उसकी संध्या और संध्यांश चार-चार सौ वर्षों के होते हैं।

इसके अलावा, संध्या व संध्यांश सहित अन्य तीनों युगों में हजारों और सैकड़ों की संख्या में एक चतुर्थांश कम हो जाता है।

इस प्रकार युग-संख्या-ज्ञाता लोग त्रेता का प्रमाण तीन हजार वर्ष, उसकी संध्या का प्रमाण तीन सौ वर्ष और संध्यांश का प्रमाण तीन सौ वर्ष बतलाते हैं। द्वापर का प्रमाण दो हजार वर्ष और उसकी संध्या तथा संध्यांश का प्रमाण दो-दो सौ वर्षों का होता है। कलियुग एक हजार वर्षों का बतलाया गया है तथा उसकी संध्या और संध्यांश मिलकर दो सौ वर्षों के होते हैं। इस प्रकार चारों युगों की काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्षों की बताई गई है।

इसके बाद सूतजी ने कहा, ‘ऋषियो! कृतयुग सत्रह लाख अट्ठाईस हजार वर्षों का कहा गया है। त्रेतायुग की वर्ष-संख्या बारह लाख छियानबे हजार बतलाई गई है। द्वापरयुग आठ लाख चौंसठ हजार मानुष-वर्षों का होता है। कलियुग का मान चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का कहा गया है। चारों युगों की यह अवस्था मानव गणना के अनुसार बतलाई गई है।’ युगों की यह चौकड़ी जब इकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वंतर कहते हैं। मानव-वर्ष के अनुसार, एक मन्वंतर की वर्ष-संख्या एकतीस करोड़ दस लाख बत्तीस हजार आठ सौ अस्सी वर्ष छह महीने की बतलाई गई है। दिव्य गणना के अनुसार, एक मनु का कार्यकाल एक लाख चालीस हजार दिव्य वर्षों का बतलाया गया है। काल-तत्व को जानने वाले विद्वान मन्वंतर के चौदह गुने काल को एक कल्प बतलाते हैं। इसके बाद सारी सृष्टि का विनाश हो जाता है, जिसे महाप्रलय कहते हैं। महाप्रलय का समय कल्प के समय से दोगुना होता है। एक मन्वंतर के युगों में जैसा क्रम होता है, वैसा ही अन्य मन्वंतरों में भी चलता रहता है। प्रत्येक युग में समयानुसार असुर, यातुधान, पिशाच, यक्ष और राक्षस स्वभाव वाली प्रजाएं उत्पन्न होती हैं। मन्वंतरों का यह परिवर्तन युगों के स्वभाव के अनुसार चिरकाल से चलता आ रहा है। इसलिए, यह जीवलोक उत्पत्ति और विनाश के चक्र में फंसा हुआ क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता।

इस प्रकार, सूतजी ने ऋषियों को पुराणों में वर्णित काल की गणना और युगों के विषय में विस्तृत जानकारी दी।
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