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राजनीति का मौसम बदलना चाहिए: दुनिया हो रही युद्धों से छलनी, असंभव-सा न हो जाए उबरना
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युद्ध कभी कोई नहीं जीतता
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विस्तार
हमारा समकालीन विश्व युद्धों से छलनी हुआ जा रहा है। सीमाओं, संसाधनों, आर्थिक आधिपत्यवाद, और राजनीतिक अहंकार पर लड़े जा रहे ये युद्ध विश्व को एक ऐसी विभीषिका में झोंक देंगे, जहां से उबरना असंभव-सा हो जाएगा। युद्ध के पीछे ऐसी कोई विचारधारा नहीं होती, जो मानवीय पीड़ा को दूर कर सके और एक नई आशा पैदा कर सके। युद्ध में विजयी होने का भ्रम पालने वाले को स्थायी शांति मिल सके, ऐसा भी कभी नहीं होता। वास्तव में, युद्ध कभी कोई नहीं जीतता। युद्ध युवाओं का जीवन छीन लेते हैं और जीवित लोगों को शोक मनाने के लिए छोड़ देते हैं। मानव पीड़ा और अपार कष्ट ही नहीं, युद्ध अपने पीछे छोड़ जाते हैं विषैला वायुमंडल, प्रदूषित जल, संदूषित मिट्टी, विषम जलवायु, एक पीड़ित ग्रह, और एक अनिश्चित भविष्य।अब हम एक ऐसे ग्रह पर नहीं रह रहे, जो अपने पारिस्थितिक चरमोत्कर्ष पर खिल रहा हो, जैसा औद्योगिक युग के पूर्व हुआ करता था। अब हम प्रदूषण, रोगों, और हिंसा से ग्रस्त ग्रह पर रहने के लिए अभिशप्त हैं। पृथ्वी पर पारिस्थितिक विघटन की गंभीर स्थिति को युद्ध और भी विकट बना देते हैं। युद्ध वैश्विक राजनीति की कोख से पैदा होते हैं। राजनीति वह सर्वोपरि विधा है, जो सभी मानवीय विधाओं को प्रभावित करती है, नियंत्रित करती है, नई विधाओं को सृजित करती है और उन्हें विनष्ट करने की क्षमता रखती है। शिक्षा, विज्ञान, दर्शन, प्रौद्योगिकी, उद्योग, निर्माण, कृषि, प्राकृतिक संसाधन, समाज, संस्कृति, और राष्ट्र आदि सभी राजनीति के साए में पलते हैं और राजनीति उनका एक टूल के रूप में उपयोग करती है। यहां तक कि आपकी सोच, आपकी विचारधारा, और आपके कर्म तक भी राजनीति की डोर से बंधे हैं।
भू-राजनीति, जो केवल सीमाओं, प्राकृतिक संसाधनों (विशेषकर ऊर्जा संसाधनों), और स्व-वर्चस्व के मानकों से त्रस्त है, विश्व राजनीति का मूल है। विश्व राजनीति का यह मूल प्रतिस्पर्धा, घृणा, कलह, संघर्ष, और रक्त-रंजित युद्धों के बीज बोने का प्रस्ताव करता है और युद्धों के माध्यम से ही समाधान ढूंढने का यत्न करता है। जब तक भू-राजनीति रहेगी, युद्ध होते रहेंगे और मानवीय मूल्यों को छिन्न-भिन्न करते रहेंगे।
समय आ गया है, जब विश्व राजनीति को पारिस्थितिकी रंग दिया जाए। पारिस्थितिकी-दर्शन, जो पारिस्थितिकी और दर्शन का सार्थक एकीकरण है, विश्व शांति के लिए एक सार्थक समाधान प्रस्तुत करता है। राजनीति, अपने सही अर्थों में, स्वयं लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप शासन के दर्शन का एक तंत्र है। लोगों की गहरी आकांक्षाएं इच्छा पैदा करती हैं—कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित, टिकाऊ और प्रसन्नताओं से भरपूर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने वाले वातावरण में जीवन मूल्यों का पोषण हो। हमारा वर्तमान सपनों के भविष्य का सृजन करने वाला समय होता है। राजनीति का धर्म है कि वह वर्तमान में भविष्य रूपी भ्रूण के स्वस्थ विकास के लिए भी समर्पित रहे। भविष्य का अर्थ केवल मानव जाति का भविष्य नहीं, जीवमंडल के सभी जीवन का भविष्य है।
हमारे अस्तित्व का आधार रचने वाली पुरानी युद्धोन्मुख राजनीतिक अवधारणाएं धीरे-धीरे दरक रही हैं। समय आ गया है कि उन मानव और प्रकृति-विरोधी राजनीतिक मान्यताओं को तिलांजलि दे दी जाए। प्रकृति और सभी जीवों का विनाश साथ-साथ चलता है और मानव प्रजाति भी ऐसे विनाश से स्वयं को सुरक्षित नहीं रख सकती। मानव प्रजाति अपने तकनीकी कौशल से स्वयं को कुछ समय तक तो बचा सकती है, पर प्रकृति विनाश के अंतिम छोर पर उसी की बारी होगी।
समकालीन भू-राजनीति की धुरी है आर्थिकी (इकनॉमी)। वर्तमान उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के युग में अर्थव्यवस्था विश्व के राजनीतिक दर्शन की मुख्य प्रेरक शक्ति बनकर उभरी है। आर्थिकी पारिस्थितिक तंत्र की ही एक उपज है। एक पारिस्थितिक तंत्र भौतिक पर्यावरण और जीवों से रची एक जीवित प्रणाली को दर्शाता है। यदि पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जाता है, तो अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाती है। पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाता है, तो अर्थव्यवस्था भी दम तोड़ देती है। सार यह है कि पारिस्थितिकी ही आर्थिकी की जननी है। यदि वर्तमान राजनीतिक दर्शन में पारिस्थितिकी एक केंद्रीय अवधारणा नहीं है, तो ऐसी राजनीति द्वारा शासित दुनिया अनिवार्य रूप से आर्थिक प्रणालियों को धीरे-धीरे ढहते हुए देखेगी।
साम्यवादी राजनीति के दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने कहा था, 'दार्शनिकों ने अब तक केवल विश्व को समझने का प्रयास किया है, जबकि मुद्दा इसे बदलने का है।' पारंपरिक दर्शन विश्लेषणात्मक है; पारिस्थितिक या पर्यावरण दर्शन क्रिया-उन्मुख है। यह दुनिया और उसकी व्यवस्थाओं को बदलने का आह्वान करता है। विश्व राजनीति को पारिस्थितिक दर्शन के सिद्धांतों के अनुसार डिजाइन, विकसित और निष्पादित किया जाएगा, तो वह हमारे विश्व के पुनर्निर्माण का आधार बनेगी।
राष्ट्रों की सीमा सैनिकों के बूटों और टैंकरों से न रौंदे जाएं; वे प्राकृतिक जैव-विविधता के गलियारे बनें। सीमाएं दो या अधिक देशों की साझी धरोहर हैं। वे जैव-विविधता के गलियारे बनेंगी, तो उन देशों में पर्यावरण और पारिस्थितिक सुरक्षा के साथ अनुकूल जलवायु का संदेश देंगी और उनकी जल और खाद्य सुरक्षा को बल देंगी। विश्व राजनीति को पर्यावरण की गुणवत्ता कायम रखने को प्राथमिकता देनी होगी। पर्यावरण सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन में ही मानव कल्याण निहित है; इसलिए राजनीति का पारिस्थितिकरण होना हमारी पहली आवश्यकता है।
पर्यावरण-दर्शन मानव मन, हृदय और आत्मा का पोषण करता है। मानव को कल्याण और संपूर्ण विकास की राह पर ले जाता है। यह मानवता, मानव समाज, संस्कृतियों और भौगोलिक क्षेत्रों में एकात्मता के भाव पैदा करता है। पारिस्थितिक दर्शन के जनक हेनरिक स्कोलिमोव्स्की अध्यात्म, पारिस्थितिकी और आर्थिकी के सामंजस्य को राजनीति के एक सूत्र के रूप में रखते हैं। अध्यात्म राजनीतिज्ञों में नैतिकता, करुणा और न्याय के मूल्यों का समावेश करेगा और पारिस्थितिकी से आर्थिकी को सतत विकास का आधार मिलेगा। विश्व राजनीति युद्धोन्माद से मुक्त हो विश्व कल्याण के लिए समर्पित रहे, इसके लिए राजनीति में उन सभी तत्वों का समावेश होना चाहिए, जिनसे यह पृथ्वी एक जीवित ग्रह बनी, मानव का उद्गम और विकास हुआ, और जिनके बिना हमारा अस्तित्व ही नहीं। - लेखक जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के पूर्व-प्राध्यापक हैं।
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