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आप की उपलब्धियां और सवाल: आलोचनाओं-आंतरिक संकट से घिरी, लेकिन शिक्षा-स्वास्थ्य में किए काम जगाते हैं उम्मीद

Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 03 May 2026 07:01 AM IST
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सार
आम आदमी पार्टी आंतरिक संकट और आलोचनाओं से घिरी है, फिर भी शिक्षा और स्वास्थ्य में उसके काम उम्मीद जगाते हैं। सवाल है, क्या यह राजनीति टिक पाएगी?
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AAP achievements and questions Surrounded by criticism internal crisis but work in education health raise hope
आम आदमी पार्टी आंतरिक संकट से घिरी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के भाजपा में चले जाने पर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पहली प्रतिक्रिया दलबदल करने वालों के खिलाफ है, जिन्हें अवसरवादी माना जा रहा है। दूसरी प्रतिक्रिया अरविंद केजरीवाल को लेकर है। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने चारों ओर व्यक्तित्व पूजा करने वालों का घेरा बना लिया, जिससे कई सक्षम नेता दूर चले गए। तीसरी प्रतिक्रिया यह है कि आप का जन्म जिस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ, उसे आरएसएस का समर्थन मिला था। दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल ने कई बार अपनी हिंदू पहचान का प्रदर्शन किया और धार्मिक भेदभाव को लेकर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से मिलने नहीं गए।


इन आलोचनाओं में कुछ सच्चाई है। दलबदल वास्तव में नैतिक या वैचारिक प्रतिबद्धता के बजाय डर या लालच से प्रेरित लगता है। केजरीवाल को भी पार्टी में दूसरों के ज्यादा लोकप्रिय होने से असुरक्षा महसूस होती है और आप सत्तारूढ़ पार्टी के बहुसंख्यकवाद के खिलाफ मजबूती से खड़ी नहीं दिखी। फिर भी, जहां कई पर्यवेक्षक आप के सामने खड़े अस्तित्व संकट को देखकर तिरस्कार और उपहास महसूस करते हैं, मुझे इसमें एक तरह की उदासी दिखाई देती है। क्योंकि अपने साढ़े तेरह वर्षों के अस्तित्व में आप ने कुछ ऐसे काम भी किए हैं, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाया।


आप को थोड़ा सकारात्मक नजरिए से देखने का एक कारण इसकी पिछली चुनावी सफलताओं का स्वरूप है। एक नई पार्टी, जिसके पास न बड़े संसाधन थे और न ही मजबूत संगठनात्मक ढांचा, उसका दिल्ली में लगातार दो चुनाव जीतना बड़ी उपलब्धि थी। 2015 में 70 में से 67 सीटें और 2020 में 70 में से 62 सीटें। यह आंकड़े चौंकाने वाले थे। इसके अलावा, उसने कांग्रेस और भाजपा दोनों को हराया, जो पहले से मजबूत थीं। फिर 2022 में पंजाब में सत्ता हासिल की। ‘डेविड बनाम गोलियथ’ जैसी ये जीतें भारतीय लोकतंत्र में दुर्लभ हैं और उन लोगों को उम्मीद देती हैं, जो मानते हैं कि राजनीति में केवल पैसा और ताकत ही नहीं जीतते।  

आप की सराहना का एक और महत्वपूर्ण कारण, दिल्ली में उसका शासन रिकॉर्ड है। खास तौर पर, शिक्षा के क्षेत्र में किए गए सुधार उल्लेखनीय हैं। 2015 में सत्ता में आने के बाद इस क्षेत्र में वित्तीय आवंटन बढ़ाया गया और स्कूलों के बुनियादी ढांचे को सुधारने पर काम हुआ। नए स्कूल और कक्षाएं बनाई गईं और मौजूदा भवनों के रखरखाव में सुधार हुआ। स्कूलों के प्रिंसिपल को अधिक अधिकार दिए गए और वे शिक्षा नौकरशाही पर कम निर्भर हुए।

आप के शैक्षिक सुधारों का उद्देश्य सरकारी स्कूलों को अधिक स्वायत्तता देना और शिक्षकों को बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए प्रेरित करना था। जैसा कि यामिनी अय्यर अपनी पुस्तक ‘लेसन्स इन स्टेट कैपेसिटी फ्रॉम डेल्हीज स्कूल्स’ में लिखती हैं, इस कार्यक्रम का लक्ष्य था, सभी विद्यार्थियों में पढ़ने, लिखने और गणित की मजबूत नींव तैयार करना और सीखने के स्तर तथा कक्षा की अपेक्षाओं के बीच अंतर कम करना। इसके लिए कक्षाओं को विद्यार्थियों के स्तर के आधार पर समूहों में पुनर्गठित किया गया। नई पहलों में ‘मेंटर शिक्षकों’ का एक समूह शामिल था, जिन्हें इन कार्यक्रमों को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई। छोटे बच्चों के लिए ग्रीष्मकालीन शिविर और रीडिंग मेले आयोजित किए गए, नई पाठ्य पुस्तकें तैयार की गईं और ‘हैप्पीनेस करिकुलम’ शुरू किया गया, जिसमें जीवन मूल्यों से जुड़ी कहानियों के माध्यम से समूह चर्चा कराई जाती थी।

इन सुधारों का श्रेय शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया और उनकी टीम को जाता है। उनके दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएं थीं, शिक्षकों के प्रति सम्मान, अभिभावकों और स्कूलों के बीच संबंध मजबूत करना, कमजोर बच्चों पर विशेष ध्यान और शिक्षा को अधिक मानवीय बनाना। उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह को भी अपनाया और जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे। 2018 की बोर्ड परीक्षाओं में दिल्ली के सरकारी स्कूलों का परिणाम 96 प्रतिशत रहा, जो पिछले कई वर्षों में सबसे बेहतर था। सरकारी स्कूलों ने निजी स्कूलों से भी बेहतर प्रदर्शन किया। इन उपलब्धियों से आगे बढ़कर, इन सुधारों ने पूरे स्कूली अनुभव को अधिक आनंददायक और कम तनावपूर्ण बनाया- बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों सभी के लिए। हालांकि 2020 के बाद इन सुधारों को झटका लगा। इसका एक कारण कोविड-19 महामारी थी और दूसरा, केंद्र और राज्य के बीच बढ़ता टकराव। 2022 में सत्येंद्र जैन, 2023 में मनीष सिसोदिया और 2024 में स्वयं मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी ने भी असर डाला। इन घटनाओं से सुधारों की गति धीमी पड़ी। सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी मोहल्ला क्लीनिक जैसी पहल ने प्राथमिक सेवाओं की पहुंच और वहनीयता बढ़ाई। आज जब चुनावी राजनीति में धर्म और तात्कालिक लाभ हावी हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे पीछे छूटते दिखते हैं। बेहतर स्कूल और अस्पताल नागरिकों की दीर्घकालिक खुशहाली के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, बजाय इसके कि उनके हाथ में थोड़े और पैसे आ जाएं या एक धर्म को दूसरे से ऊपर दिखाया जाए।
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