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बदलाव का चेहरा: तमिलनाडु में टूटा द्रविड़ राजनीति का चक्र, नए प्रयोग की बनी डगर

अमर उजाला Published by: Pavan Updated Mon, 11 May 2026 05:49 AM IST
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सार
विजय भी इसी परंपरा की नई कड़ी हैं, जिन्होंने अपनी सार्वजनिक छवि को राजनीतिक दिशा दी और युवाओं के बीच एक प्रभावशाली समर्थन तैयार किया। सिनेमा में भले नायक अकेले ही समस्याओं का समाधान कर देता है, लेकिन लोकतांत्रिक शासन में निर्णय सामूहिक जिम्मेदारी से लिए जाते हैं। लिहाजा, उनके सामने गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों को साथ रखने की चुनौती होगी।
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Face of change: The cycle of Dravidian politics has broken in Tamil Nadu, paving the way for new experiments
बदलाव का चेहरा: तमिलनाडु में टूटा द्रविड़ राजनीति का चक्र - फोटो : IANS

विस्तार

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का चक्र तोड़ते हुए थलापति विजय का मुख्यमंत्री बनना प्रतीक है कि राज्य नई ऊर्जा, नई सोच और नए राजनीतिक प्रयोग की ओर बढ़ रहा है। देखना होगा कि वह केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाने में कैसी परिपक्वता दिखाते हैं और कैसे सुशासन की स्थायी मिसाल कायम करते हैं।


तमिलनाडु की राजनीति में रविवार का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज हो गया, जब 1967 के बाद राज्य में पहली बार किसी गैर-द्रविड़ दल का मुख्यमंत्री बना है। अभिनेता से राजनेता बने सी जोसेफ विजय के राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही दशकों से द्रविड़ दलों (द्रमुक और अन्नाद्रमुक) के बारी-बारी सत्ता पर काबिज रहने की परंपरा टूटी है, जो राज्य की राजनीति में नई पीढ़ी और एक नए राजनीतिक विमर्श के प्रवेश का संकेत भी है।


उल्लेखनीय है कि 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीतकर टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन इसे सरकार बनाने के लिए दस विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। कांग्रेस के पांच और भाकपा-माकपा के दो-दो विधायकों के समर्थन के बावजूद विजय की पार्टी बहुमत से दूर थी। फिर, वीसीके और आइयूएमएल के समर्थन से आखिरकार अनिश्चितता समाप्त हो गई और राज्य को अपना नौवां मुख्यमंत्री मिल गया। हालांकि दक्षिण भारतीय राजनीति में सिनेमा और राजनीति का मेल नया नहीं है। अन्नादुरई, एम करुणानिधि और एमजीआर से लेकर जयललिता तक तमिल समाज ने फिल्मी सितारों को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व के तौर पर भी स्वीकार किया है।

विजय भी इसी परंपरा की नई कड़ी हैं, जिन्होंने अपनी सार्वजनिक छवि को राजनीतिक दिशा दी और युवाओं के बीच एक प्रभावशाली समर्थन तैयार किया। सिनेमा में भले नायक अकेले ही समस्याओं का समाधान कर देता है, लेकिन लोकतांत्रिक शासन में निर्णय सामूहिक जिम्मेदारी से लिए जाते हैं। लिहाजा, उनके सामने गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों को साथ रखने की चुनौती होगी।

तमिलनाडु देश के उन राज्यों में गिना जाता है, जिसने शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। ऐसे में, नए मुख्यमंत्री को सुनिश्चित करना होगा कि उनका कम प्रशासनिक अनुभव राज्य के विकास की राह में बाधा न बने। जल संकट, कृषि व औद्योगिक क्षेत्रों की समस्याएं और मछुआरों की परेशानियां जैसे मुद्दे तो राज्य के सामने हैं ही, केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाना भी उनकी राजनीतिक परिपक्वता की परीक्षा होगी।

एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि विजय की राजनीति अब तक प्रमुखत: भावनात्मक अपील और जनसंपर्क पर आधारित रही है, पर मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद उनसे ठोस नीतिगत दृष्टि की अपेक्षा की जाएगी। लोकतंत्र में हर नया नेतृत्व एक अवसर लेकर आता है। विजय का मुख्यमंत्री बनना भी इसका ही प्रतीक है, जिसमें तमिलनाडु नई ऊर्जा, नई सोच और नए राजनीतिक प्रयोग की ओर बढ़ रहा है। अब यह तो राज्य के नए निजाम और उनकी टीम पर ही निर्भर करेगा कि वे इस अवसर को सुशासन की स्थायी मिसाल में कैसे बदलते हैं।
 
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