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भारत का रक्षा बाजार: यह तो बस शुरुआत है, वैश्विक खिलाड़ी बनने की प्रबल संभावनाएं

आनंद कुमार, एसोसिएट फेलो एमपीआईडीएसए Published by: Pavan Updated Mon, 06 Apr 2026 07:54 AM IST
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सार
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष से 60 फीसदी अधिक है। भविष्य में यही गति बनाए रखकर भारत वैश्विक रक्षा बाजार में मजबूत खिलाड़ी बन सकता है। अब चुनौती इसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ में बदलने की है।
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India's Defence Market: This is just the beginning, strong potential to become a global player
भारत की रक्षा करने के लिए तैनात एयर डिफेंस ग्रिड। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत का दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में से एक से उभरते हुए रक्षा निर्यातक के रूप में परिवर्तन उसकी सामरिक और आर्थिक दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। लंबे समय तक भारत की रक्षा तैयारियां विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहीं, जिससे वैश्विक अनिश्चितताओं के समय उसकी रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित होती थी। लेकिन हाल के वर्षों में रक्षा निर्यात में तेज वृद्धि और घरेलू विनिर्माण क्षमता के विस्तार ने इस स्थिति को बदलना शुरू कर दिया है। आज भारत न केवल अपनी जरूरतों को घरेलू स्तर पर पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। ताजा आंकड़े इस बदलाव की गंभीरता और व्यापकता को स्पष्ट करते हैं।


वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है। पिछले पांच वर्षों में रक्षा निर्यात लगभग तीन गुना हो चुका है, जो यह दर्शाता है कि यह वृद्धि अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रवृत्ति का हिस्सा है। साथ ही, भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है, जो वैश्विक स्तर पर भारतीय उत्पादों के प्रति बढ़ते भरोसे का ही संकेत है।


इस वृद्धि का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों का संतुलित योगदान है। रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (डीपीएसयू) ने कुल निर्यात में लगभग 55 प्रतिशत योगदान दिया है और उनके निर्यात में 151 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। निजी क्षेत्र ने करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी के साथ स्थिर वृद्धि बनाए रखी है। यह साझेदारी संकेत है कि भारत का रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र अब अधिक समन्वित और सक्षम हो रहा है, जहां सरकारी संस्थानों की क्षमता और निजी क्षेत्र की नवाचार क्षमता एक साथ काम कर रही है।

भारत द्वारा निर्यात किए जाने वाले रक्षा उत्पादों की प्रकृति में भी बदलाव आया है। अब भारत केवल छोटे पुर्जों या चुनिंदा तकनीकी उत्पादों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्नत रक्षा प्रणालियां और प्लेटफॉर्म भी निर्यात कर रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल, तेजस लड़ाकू विमान, आकाश वायु रक्षा प्रणाली और पिनाका रॉकेट प्रणाली जैसे उत्पादों की वैश्विक मांग बढ़ रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों द्वारा इन प्रणालियों में रुचि दिखाना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब वैश्विक रक्षा बाजार में एक विश्वसनीय विकल्प बन रहा है। यह परिवर्तन केवल औद्योगिक क्षमता का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे सरकार के नीतिगत सुधार भी महत्वपूर्ण हैं। रक्षा निर्यात प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया है, ऑनलाइन मंजूरी प्रणाली लागू की गई है और मानक संचालन प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाया गया है। इन सुधारों के कारण रक्षा निर्यातकों की संख्या 128 से बढ़कर 145 हो गई है। राजनीतिक स्तर पर यह परिवर्तन आत्मनिर्भरता की उस व्यापक दृष्टि से जुड़ा हुआ है, जिसे प्रधानमंत्री ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के रूप में प्रस्तुत किया है। इसका उद्देश्य भारत को एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण केंद्र बनाना है। रक्षा मंत्री ने भी इस उपलब्धि को भारत के रक्षा विनिर्माण हब बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह अवसर भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बड़े बदलाव हो रहे हैं। रूस-यूक्रेन जैसे संघर्षों ने कई देशों को अपनी रक्षा आपूर्ति के स्रोतों को विविध बनाने के लिए प्रेरित किया है। पारंपरिक आपूर्तिकर्ता या तो राजनीतिक कारणों से सीमित हैं या अपनी आंतरिक जरूरतों में व्यस्त हैं। ऐसे में, भारत जैसे अपेक्षाकृत विश्वसनीय और संतुलित देश की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके साथ ही पश्चिमी देशों के भीतर भी रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ट्रंप जैसे नेताओं के दौर में नाटो सहयोगियों के बीच मतभेदों ने यूरोप को अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है। यूरोपीय संघ और अमेरिका, दोनों ही अब नए साझेदारों की तलाश में हैं, जो उन्हें स्थिर और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित कर सकें। इस संदर्भ में भारत के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है और भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ का दर्जा मिलना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसी प्रकार यूरोपीय संघ के साथ हाल ही में हुआ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी समझौता यह दर्शाता है कि भारत को अब वैश्विक सुरक्षा ढांचे में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण की गति धीमी पड़ रही है और संरक्षणवाद बढ़ रहा है, तब भारत के लिए यह एक सुनहरा अवसर है। कई विकसित देश अब अपने आपूर्ति स्रोतों को सुरक्षित और विविध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत इस मांग को पूरा करने की स्थिति में है। इस प्रकार भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है।

हालांकि, इस सकारात्मक तस्वीर के बावजूद कुछ चुनौतियां भी हैं। भारत अब भी अमेरिका, रूस और फ्रांस जैसे स्थापित रक्षा निर्यातकों से पीछे है। गुणवत्ता नियंत्रण, समय पर आपूर्ति और बिक्री के बाद सेवाओं में सुधार की आवश्यकता है। निजी क्षेत्र को और अधिक प्रोत्साहन, वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग की जरूरत है, ताकि वह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके। शोध और विकास में निवेश बढ़ाना होगा। उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना जरूरी है, ताकि भारत केवल मध्यम स्तर के उत्पादों तक सीमित न रह जाए। वैश्विक साझेदारियों के जरिये तकनीकी उन्नति को तेज किया जा सकता है। घरेलू नवाचार को भी प्रोत्साहित करना जरूरी है। इन चुनौतियों के बावजूद भारत की दिशा स्पष्ट रूप से सकारात्मक है। रक्षा निर्यात में वृद्धि, वैश्विक बाजार में बढ़ती स्वीकार्यता और नीति तथा उद्योग के बीच बेहतर तालमेल इस बात के संकेत हैं कि भारत एक स्थायी परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है।

इस दृष्टि से देखा जाए, तो भारत का रक्षा विनिर्माण हब के रूप में उभरना आर्थिक और रणनीतिक हितों का संगम है। यह न केवल देश की सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि आर्थिक विकास को भी गति देता है और भारत को वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित करता है। आने वाले वर्षों में यदि यही गति बनी रहती है, तो भारत वैश्विक रक्षा बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है। सबसे बड़ी चुनौती अब इस गति को बनाए रखने और इसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ में बदलने की है।
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