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क्या अंतरराष्ट्रीय कानून सिर्फ भ्रम हैं: ये हित-आधारित प्रणाली, वेनेजुएला-यूक्रेन ने कमजोरी उजागर की

Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Wed, 07 Jan 2026 07:27 AM IST
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सार
वेनेजुएला, यूक्रेन या गाजा-इन सभी संकटों में अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाएं उजागर होती हैं, पर साथ ही उसकी अनिवार्यता भी रेखांकित होती है। नियम कमजोर हो सकते हैं, किंतु नियमों का पूर्ण अभाव कहीं अधिक विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
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international law just an illusion This interest-based system Venezuela-Ukraine exposes weakness
ओपिनियन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अपने विद्यार्थी जीवन में अंतरराष्ट्रीय कानून का अध्ययन करते समय कुछ परिभाषाएं केवल परीक्षा की तैयारी का साधन नहीं रहीं, बल्कि वे बौद्धिक संघर्ष और वैचारिक मंथन की स्थायी स्मृतियां बन गईं। इन्हीं में से एक थी प्रख्यात विधिवेत्ता थॉमस एर्स्किन हॉलैंड की वह प्रसिद्ध परिभाषा, जिसमें उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विधि को 'न्यायशास्त्र का तिरोधान बिंदु' कहा था। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय विधि में न तो पूर्ण संप्रभु विधायिका है, न बाध्यकारी दंड-व्यवस्था और न ही ऐसा प्रवर्तन तंत्र, जो राज्यों को अनिवार्य रूप से नियमों के पालन के लिए विवश कर सके। इस दृष्टि से अंतरराष्ट्रीय विधि, विधिशास्त्र की शास्त्रीय कसौटियों पर खरी नहीं उतरती।


उस समय यह आलोचना हमें असहज करती थी। युवा मन को यह स्वीकार करना कठिन लगता था कि जिस कानून को हम वैश्विक न्याय की आधारशिला मानते हैं, वही 'अपूर्ण' कही जाए। यह असहमति केवल भावनात्मक नहीं थी, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक अनुभव भी था। 1970 के दशक में संयुक्त राष्ट्र का आभामंडल वास्तव में दैदीप्यमान प्रतीत होता था। उपनिवेशवाद से मुक्त हुए नव स्वतंत्र राष्ट्र, मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र, रंगभेद-विरोधी संघर्ष और शीतयुद्ध के बीच सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा-इन सबने यह विश्वास पैदा किया था कि अंतरराष्ट्रीय विधि धीरे-धीरे शक्ति-राजनीति से ऊपर उठकर नैतिकता और न्याय का सार्वभौमिक ढांचा बनेगी।


परंतु 2024-26 की वर्तमान दुनिया में पीछे मुड़कर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह विश्वास अब एक कठोर यथार्थ-परीक्षा से गुजर रहा है। यूक्रेन युद्ध का तीसरे वर्ष में प्रवेश, गाजा में मानवीय संकट, लाल सागर में नौवहन असुरक्षा, और वैश्विक दक्षिण की बढ़ती असंतुष्टि-ये सभी घटनाएं संकेत देती हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आज नियम-आधारित प्रणाली से अधिक हित-आधारित प्रणाली की ओर झुक रही है। बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में शक्ति का वितरण बदल रहा है, पर नियमों का पालन समान रूप से सुनिश्चित नहीं हो पा रहा।

इसी पृष्ठभूमि में वेनेजुएला का संकट एक प्रतीकात्मक उदाहरण बनकर उभरता है। वेनेजुएला अब केवल आर्थिक दिवालियेपन या लोकतांत्रिक क्षरण की कहानी नहीं है। 2024–25 के विवादित चुनाव, विपक्ष पर निरंतर प्रतिबंध, व्यापक प्रवासन संकट और ऊर्जा-राजनीति का पुनरुत्थान—इन सभी ने अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय संगठन और अंतरराष्ट्रीय मंच सक्रिय अवश्य हैं, परंतु उनकी भूमिका प्रायः पर्यवेक्षक या वक्ता तक सीमित रह जाती है। निर्णायक हस्तक्षेप, जो व्यवहार में बदलाव ला सके, दुर्लभ दिखाई देता है।

यहीं अंतरराष्ट्रीय विधि की वह कमजोरी उजागर होती है, जिसकी ओर हॉलैंड ने दशकों पहले संकेत किया था-प्रवर्तन का अभाव। प्रस्ताव पारित होते हैं, निंदा-प्रस्ताव जारी होते हैं, विशेष दूत नियुक्त किए जाते हैं, किंतु जब तक शक्तिशाली राज्यों के हित प्रभावित नहीं होते, तब तक नियम प्रभावी नहीं बन पाते। सत्ता-संतुलन के बदलते ही नियमों की व्याख्या भी बदल जाती है। यही कारण है कि एक ही सिद्धांत (संप्रभुता या मानवाधिकार) अलग-अलग परिस्थितियों में अलग अर्थ ग्रहण कर लेता है।

इस संदर्भ में, डोनाल्ड ट्रंप का प्रभाव केवल अतीत की स्मृति नहीं है। 2024 के अमेरिकी चुनाव और उसके बाद की वैश्विक प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ जैसी सोच अब किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही। यह एक वैश्विक प्रवृत्ति बन चुकी है, जिसमें बहुपक्षीय संस्थाओं के प्रति संदेह, अंतरराष्ट्रीय संधियों से दूरी और प्रतिबंधों को प्राथमिक कूटनीतिक हथियार बनाने की प्रवृत्ति शामिल है। वेनेजुएला के मामले में यह द्वंद्व और भी तीखा दिखता है, जहां मानवाधिकारों की भाषा और ऊर्जा-सुरक्षा की रणनीति परस्पर टकराती दिखाई देती हैं।

यही वह बिंदु है, जहां अंतरराष्ट्रीय विधि सैद्धांतिक आदर्श और व्यावहारिक राजनीति के बीच झूलती नजर आती है। क्या संप्रभुता अब भी पूर्ण और अछूती अवधारणा है? क्या मानवीय हस्तक्षेप वास्तव में सार्वभौमिक है, या वह भी चयनात्मक नैतिकता का शिकार हो चुका है? और क्या नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं या शक्ति-संपन्न राष्ट्र उनके अपवाद बन जाते हैं? 2024-26 की वैश्विक व्यवस्था इन प्रश्नों के स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर देने में असमर्थ दिखाई देती है।
फिर भी, एक विद्यार्थी के रूप में मन में उपजी वह आशा पूरी तरह लुप्त नहीं हुई है। अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट के अभियोग, समुद्री कानून से जुड़े न्यायिक निर्णय, जलवायु न्याय पर बढ़ता वैश्विक विमर्श और वैश्विक दक्षिण की संगठित एवं मुखर होती आवाज-ये सभी संकेत देते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून केवल भ्रम नहीं हैं। वह एक क्रमिक, विकसित होती प्रक्रिया है, जो धीमी अवश्य है, पर निरर्थक नहीं।

शायद हॉलैंड सही थे कि अंतरराष्ट्रीय विधि पारंपरिक अर्थों में ‘कानून’ नहीं है। पर यह भी उतना ही सत्य है कि इसके अभाव में वैश्विक राजनीति केवल कच्ची शक्ति, सैन्य दबाव और आर्थिक दमन तक सिमट जाएगी। वेनेजुएला, यूक्रेन या गाजा-इन सभी संकटों में अंतरराष्ट्रीय विधि की सीमाएं उजागर होती हैं, पर साथ ही उसकी अनिवार्यता भी रेखांकित होती है। नियम कमजोर हो सकते हैं, किंतु नियमों का पूर्ण अभाव कहीं अधिक विनाशकारी सिद्ध होता है।
आज, जब मैं अपने विद्यार्थी जीवन की उन बहसों को 2024-26 की वास्तविकताओं के आलोक में देखता हूं, तो यह स्पष्ट होता है कि न हॉलैंड पूरी तरह गलत थे, न हम छात्र पूरी तरह आदर्शवादी। अंतरराष्ट्रीय विधि वास्तव में एक संक्रमण-कालीन व्यवस्था है, जहां वह न्यायशास्त्र का तिरोधान बिंदु भी है और एक अधिक उत्तरदायी, अधिक मानवीय वैश्विक व्यवस्था की संभावित आधारशिला भी।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय विधि कमजोर है या सशक्त। प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्र-राज्य उसे केवल सुविधा और हित के अनुसार अपनाते रहेंगे, या 21वीं सदी की जटिल चुनौतियों (जलवायु परिवर्तन, प्रवासन, युद्ध और असमानता) के लिए उसे सचमुच साझा नैतिक उत्तरदायित्व का स्वरूप देंगे। आज की दुनिया में, इसी प्रश्न का उत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य की दिशा तय करेगा।

 
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