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हर घर में हो रक्त मित्र: ऐसी संस्कृति हो विकसित, जो रक्तदान को माने सम्मानजनक नागरिक कर्तव्य
परीक्षित निर्भय
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 15 Jun 2026 06:49 AM IST
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विस्तार
जिस तरह हमें घर में सैनिक या शिक्षक होने पर गर्व होता है, उसी तरह हर घर में एक ‘रक्त मित्र’ का होना सामाजिक जिम्मेदारी का ही प्रतीक है। किसी सड़क दुर्घटना, जटिल प्रसव या गंभीर बीमारी के बाद अस्पताल में भर्ती मरीज के परिजनों की पहली चिंता इलाज की नहीं, बल्कि रक्त की व्यवस्था बन जाती है। फोन की संपर्क सूची खंगाली जाती है, फोन किए जाते हैं, सोशल मीडिया पर अपील की जाती है। इन परिस्थितियों में यदि परिवार के पास एक रक्त मित्र हो, तो संकट काफी हद तक कम हो सकता है। ऐसे में, सवाल यह है कि क्या हमारे समाज में हर घर के पास ऐसा कोई ‘रक्त मित्र’ है?केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश में 1.46 करोड़ यूनिट रक्त संग्रहित किया गया। इसमें 74.55 फीसदी हिस्सा स्वैच्छिक रक्तदान से आया है। भारत जैसे विशाल देश में हर दो सेकंड में किसी न किसी मरीज को रक्त की आवश्यकता पड़ती है। गंभीर मामलों में रक्त जीवन-मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है। इसलिए, रक्त की उपलब्धता केवल स्वास्थ्य सेवाओं का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और सामुदायिक उत्तरदायित्व का भी प्रश्न है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, यदि किसी देश की कुल जनसंख्या का केवल एक फीसदी भी नियमित रक्तदान करे, तो देश की सभी जरूरतें पूरी हो सकती हैं, पर भारत के लिए समस्या केवल रक्त संग्रहण की नहीं है। असली चुनौती यह भी है कि जरूरत के समय सही रक्त सही व्यक्ति तक पहुंच सके। देश में लगभग 4,541 लाइसेंस प्राप्त ब्लड सेंटर और ब्लड बैंक कार्यरत हैं, जिनमें सरकारी, गैर-सरकारी और निजी संस्थान शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर रक्त की उपलब्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इन केंद्रों को केंद्रीय ई-रक्तकोष पोर्टल से जोड़ा जा रहा है। कई गंभीर रोगों के उपचार तथा सड़क दुर्घटनाओं के मामलों ने रक्त की आवश्यकता को पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा दिया है। ऐसे में, केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकते। स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ समाज की सक्रिय भागीदारी भी अनिवार्य है। कुछ लोग मानते हैं कि रक्तदान से कमजोरी आती है या स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जबकि डॉक्टर बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि स्वस्थ व्यक्ति नियमित अंतराल पर सुरक्षित रूप से रक्तदान कर सकता है। जरूरत है कि रक्तदान को आपातकालीन प्रतिक्रिया के बजाय नियमित सामाजिक दायित्व के रूप में देखा जाए।
यहीं से रक्त मित्र की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। रक्त मित्र वह व्यक्ति है, जो स्वयं रक्तदान के लिए तैयार हो, दूसरों को इसके लिए प्रेरित करे और आवश्यकता पड़ने पर रक्तदाताओं का नेटवर्क उपलब्ध करा सके। देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों ऐसे लोग हैं, जिन्होंने रक्तदान को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी बना लिया है। वे न केवल स्वयं रक्तदान करते हैं, बल्कि जरूरतमंदों को रक्तदाताओं से जोड़ने का कार्य भी करते हैं। यही लोग समाज के वास्तविक रक्त मित्र हैं। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ऐसे कई परिवार हैं, जिन्होंने रक्तदान को सामाजिक जिम्मेदारी बना लिया है। विद्यानगर कॉलोनी निवासी प्रदीप गुप्ता केवल अलीगढ़ ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर दिल्ली तक जाकर 50 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं। वहीं श्यामपुर निवासी चौधरी अजय सिंह और उनका परिवार पूरे शहर में रक्तवीर के नाम से जाना जाता है। परिवार के सदस्य मिलकर अब तक 399 बार रक्तदान कर चुके हैं। वहीं, प्रयागराज के पुराना कटरा निवासी 40 वर्षीय अंशुल तिवारी 44 बार रक्तदान कर चुके हैं, तो गोरखपुर के दीनानाथ सिंह और सुनील मणि त्रिपाठी जैसे कई लोग नियमित रक्तदान करके समाज के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।
आज आवश्यकता केवल रक्तदान शिविरों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक संस्कृति विकसित करने की है, जिसमें रक्तदान को सामान्य और सम्मानजनक नागरिक कर्तव्य माना जाए। जिस प्रकार हर परिवार किसी डॉक्टर या अस्पताल का नंबर अपने पास रखता है, उसी प्रकार यदि हर घर एक रक्त मित्र से जुड़ा हो, तो आपात स्थिति में बहुमूल्य समय बचाया जा सकता है। जिस तरह हर घर में एक शिक्षक, एक सैनिक या एक समाजसेवी होने पर गर्व किया जाता है, उसी तरह हर घर में एक रक्त मित्र होना भी सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक बनना चाहिए। देश को ऐसे समाज की जरूरत है, जहां रक्त की आवश्यकता पड़ने पर कोई व्यक्ति अकेला न पड़े। यही संवेदनशील, जागरूक और जीवन के प्रति उत्तरदायी समाज की पहचान होगी।