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हक के लिए लड़ती महिलाओं को सलाम: यह लड़ाई वस्त्रों की नहीं, स्वतंत्रता की है

taslima nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 15 Jun 2026 06:39 AM IST
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सार
अफगानिस्तान के हेरात में महिलाओं पर हुई गोलीबारी महज एक स्थानीय घटना नहीं मानी जा सकती। यह उस वैश्विक संघर्ष का हिस्सा है, जिसमें महिलाएं अपने जीवन, अपने शरीर और अपने भविष्य पर स्वयं निर्णय लेने के अधिकार के लिए लड़ रही हैं। यह लड़ाई वस्त्रों की नहीं, स्वतंत्रता की है।
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हिजाब नहीं, आजादी का सवाल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

अफगानिस्तान के हेरात में हिजाब संबंधी नियमों के उल्लंघन के आरोप में महिलाओं की गिरफ्तारी के विरोध में हुए प्रदर्शन पर गोलीबारी कर दो लोगों की हत्या किए जाने की खबर ने दुनिया को एक बार फिर याद दिलाया है कि महिलाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा आज भी कई देशों में जीवन और मृत्यु का मुद्दा बना हुआ है। प्रदर्शनकारियों के नारे थे, ‘शिक्षा, काम, स्वतंत्रता।’ ये तीनों मांगें ऐसे मूलभूत मानवाधिकार हैं, जिन्हें दुनिया के अधिकांश लोग स्वाभाविक मानते हैं। लेकिन, अफगानिस्तान की अनेक महिलाओं को इन्हीं अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर अपनी जान तक देनी पड़ रही है।


यह दृश्य नया नहीं है। कुछ वर्ष पहले ईरान में महसा अमीनी की मृत्यु के बाद लाखों महिलाएं सड़कों पर उतर आई थीं। उन पर आरोप था कि उन्होंने अनिवार्य हिजाब ‘ठीक तरह से नहीं पहना’ था। उनकी मृत्यु ने पूरे देश में ‘महिला, जीवन और स्वतंत्रता’ से जुड़े ऐतिहासिक आंदोलन को जन्म दिया। उस आंदोलन को दबाने के प्रयास में सैकड़ों लोग मारे गए। अफगानिस्तान व ईरान की राजनीतिक व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं हैं। पर, दोनों मामलों में एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है-महिलाओं के पहनावे को राज्य के नियंत्रण का विषय बना दिया गया है। जब राज्य किसी वयस्क महिला को यह बताने लगे कि उसे क्या पहनना चाहिए, तब आमतौर पर शिक्षा, रोजगार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार भी धीरे-धीरे सीमित होने लगते हैं।


अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा लगभग पूरी तरह बंद कर दी गई है। अनेक कार्यक्षेत्रों में महिलाओं के काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है और सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति सीमित कर दी गई है। संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों ने बार-बार इन नीतियों की आलोचना की है। लेकिन, इस कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है। वह है महिलाओं का प्रतिरोध। ईरान की तरह अफगानिस्तान की सड़कों पर और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मुस्लिम महिलाओं का एक वर्ग यह कह रहा है कि हम अपने जीवन के बारे में निर्णय स्वयं लेंगे। हम शिक्षा, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता चाहते हैं। उन्होंने यह दिखा दिया है कि महिलाओं का अपना संघर्ष ही दरअसल बदलाव की सबसे शक्तिशाली प्रेरक शक्ति है।

मेरी सोच यह है कि स्त्री-विरोध, भेदभाव और हिंसा के विरुद्ध मुस्लिम महिलाओं को ही सबसे सशक्त आवाज बनकर उभरना होगा। कोई भी पहनावा यदि स्वेच्छा से पहना जाए, तो वह अलग बात है। पर, यदि राज्य, परिवार, समाज या धार्मिक पुलिस उसे जबरन थोपे, तो फिर वह व्यक्तिगत पसंद नहीं रह जाती, इसके बजाय वह स्वतंत्रता का प्रश्न बन जाती है।

इतिहास में हर बड़ा सामाजिक परिवर्तन कुछ साहसी लोगों के विरोध से शुरू हुआ है। आज अफगानिस्तान की वे महिलाएं, जो गोलियों के सामने भी ‘शिक्षा, काम, स्वतंत्रता’ का नारा लगा रही हैं, वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दुनियाभर की महिलाओं की स्वतंत्रता के इतिहास में एक नया अध्याय लिख रही हैं। मेरा प्रश्न यह है कि क्या कोई स्त्री हिजाब, नकाब या बुर्का स्वेच्छा से पहनती है? मैं उस संस्कृति के विरुद्ध हूं, जो महिलाओं के पहनावे को धार्मिक कर्तव्य बना देती है और अपराधबोध या भय के जरिये उन्हें नियंत्रित करती है। वास्तविक स्वतंत्रता तो तभी आएगी, जब कोई महिला बिना किसी धार्मिक, सामाजिक या सरकारी दबाव के अपने वस्त्र स्वयं चुन सकेगी। यदि इस तरह का माहौल बनता है, तो स्वतंत्र और दबाव-मुक्त परिस्थितियों में हिजाब, बुर्का या नकाब पहनने वाली मुट्ठीभर महिलाएं ही होंगी। कोई महिला यदि फैशन, मौसम या व्यक्तिगत पसंद के कारण अपने बाल ढकना चाहे, तो यह उसका अधिकार है, लेकिन बाल ढकने को नैतिक या धार्मिक अनिवार्यता के रूप में थोपे जाने का मैं घोर विरोध करती हूं। मेरे विचार में हिजाब, बुर्का और नकाब के पीछे तर्क नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक षड्यंत्र और गहरा स्त्री-विरोध मौजूद है।

अपने जीवन को जोखिम में डालकर सड़कों पर उतर आना कोई सहज काम नहीं है। ईरान की लड़कियां जानती थीं कि विरोध की कीमत भयानक हो सकती है। वे जानती थीं कि गिरफ्तारी, यातना और यहां तक कि मौत की सजा भी उन्हें मिल सकती है। फिर भी, उन्होंने विद्रोह किया। सड़कों पर हिजाब जलाकर उन्होंने यह घोषणा की कि अब वे भय को स्वीकार नहीं करेंगी। अफगानिस्तान की महिलाओं की स्थिति तो और भी कठोर है। वर्षों से उन्हें शिक्षा, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता से वंचित रखा गया है। फिर भी आज वे भी सड़कों पर उतर आई हैं। वे जानती हैं कि यह रास्ता चुनना महंगा पड़ सकता है। अफगानिस्तान जैसे गहरे स्त्री-विरोधी और दमनकारी वातावरण में किसी महिला का विरोध केवल एक महिला का विरोध नहीं होता, बल्कि वह लाखों महिलाओं की आवाज बन जाता है। ये स्त्रियां दुनिया को संदेश देना चाहती हैं कि वे अब उत्पीड़न, भेदभाव और अपमान का जीवन स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे शिक्षा, काम, स्वतंत्रता और इन्सान की तरह जीने का अधिकार चाहती हैं। अफगानिस्तान और ईरान की सड़कों पर खड़ी होकर अपने अधिकारों की मांग करने वाली महिलाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक स्वतंत्र और समान अधिकारों वाले समाज का सपना गढ़ रही हैं। शिक्षा, काम और स्वतंत्रता की मांग के लिए जिन्होंने अपने जीवन को जोखिम में डालकर सड़कों पर उतरने का साहस दिखाया है, उनके प्रति मेरा गहरा सम्मान है। जिस देश में महिलाओं की आवाज दबाने का प्रयास किया जाता है, वहां विरोध करना असाधारण साहस का परिचायक है।

किसी भी राज्य, सरकार या धार्मिक प्राधिकरण को यह अधिकार नहीं है कि वह लोगों के मूलभूत अधिकारों की मांग का उत्तर गोलियों से दे। शिक्षा, काम और स्वतंत्रता मांगना अपराध नहीं है; बल्कि उस मांग को कुचलने के लिए क्रूरता और बर्बरता का सहारा लेना अपराध है। अफगानिस्तान की सड़कों पर खड़े होकर आज जो लोग ‘शिक्षा, काम, स्वतंत्रता’ का नारा लगा रहे हैं, वे केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ रहे हैं। वे उन वंचित, अपमानित, उपेक्षित और तिरस्कृत महिलाओं की ओर से भी बोल रहे हैं, जो इन्सानी अधिकारों से वंचित हैं। स्वतंत्रता का संघर्ष लंबा हो सकता है, पर इतिहास इस बात का साक्षी है कि मनुष्य की मुक्ति की आकांक्षा को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। आज अफगानिस्तान की महिलाओं का संघर्ष किसी ड्रेस कोड के विरुद्ध नहीं है, बल्कि महिलाओं पर धार्मिक और राजनीतिक प्रभुत्व के विरुद्ध है। उनका संघर्ष मूलतः इन्सान की तरह जीने का संघर्ष है।                                
edit@amarujala.com
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