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देश में गहरे आर्थिक सुधारों की जरूरत: सुस्त निवेश, बढ़ती असमानता और वैश्विक संकट

Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 14 Jun 2026 06:47 AM IST
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सार
आर्थिक चुनौतियों के मद्देनजर पिछले कुछ दिनों में अर्थशास्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। आवश्यकता है उनको अमल में लाने की, लेकिन गहरे आर्थिक सुधार होने की मुझे उम्मीद कम ही दिखाई देती है।
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आर्थिक सुधारों की जरूरत - फोटो : ANI

विस्तार

पिछले एक साल में यह स्पष्ट हो गया है कि देश की अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं है। रुपया कमजोर पड़ता गया, विदेशी निवेश वापस लौट रहा है और घरेलू निजी निवेश सुस्त है। उपभोग की मांग कमजोर बनी हुई है, विनिर्माण क्षेत्र में ठहराव आ चुका है और अमीर तथा सामान्य वर्ग के बीच आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से पैदा हुई चुनौतियों के कारण प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखी गई। शेयर बाजार का माहौल इन तमाम समस्याओं को प्रतिबिंबित कर रहा था और प्रमुख सूचकांक लगभग वहीं खड़े थे, जहां वह दो वर्ष पहले थे।


इन सब चुनौतियों की समझ ने पेशेवर अर्थशास्त्रियों को लगातार लेख लिखने के लिए प्रेरित किया है, जिनमें वे मोदी सरकार से आग्रह कर रहे हैं कि वह समस्याओं की गंभीरता को स्वीकार करें और आवश्यक सुधारों की शुरुआत करें। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद ऐसे लेखों की संख्या और बढ़ गई है। इस संघर्ष ने तेल, गैस, उर्वरक तथा अन्य वस्तुओं के वैश्विक बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिससे भारत का व्यापार संतुलन प्रभावित हुआ है और कई क्षेत्रों में कमी की स्थिति बनी है। युद्ध के कारण विदेशों से आने वाली धनराशि (रेमिटेंस) भी घटी है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।


अर्थशास्त्रियों द्वारा सुझाए गए सुधारों में सीमा शुल्क, कर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की कार्यप्रणाली को कम मनमाना और कम प्रतिशोधात्मक बनाना, स्वास्थ्य और शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय बढ़ाना, श्रम-प्रधान विनिर्माण को प्रोत्साहित करना, निवेशकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना ताकि केवल कुछ चुनिंदा उद्योगपति ही लाभकारी परियोजनाओं पर कब्जा न कर सकें। उर्वरक और बिजली सब्सिडी को कम करना, भाजपा-शासित और गैर-भाजपा-शासित राज्यों के बीच भेदभाव समाप्त करना तथा आर्थिक मंत्रालयों में कार्यरत कमजोर प्रदर्शन करने वाले नेताओं और नौकरशाहों के स्थान पर अधिक सक्षम और योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति करना शामिल है।

देश के प्रमुख नीति-अर्थशास्त्रियों के सुझावों का उद्देश्य जाति, लिंग, धर्म, क्षेत्र या राजनीतिक विचारधारा से परे सभी भारतीयों के कल्याण और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करना है। इन सुझावों में मैं अपना एक और प्रस्ताव जोड़ना चाहूंगा- हमारी हवा, पानी, मिट्टी और वनों के लगातार हो रहे क्षरण को रोकने की आवश्यकता है। अब प्रश्न यह है कि क्या केंद्र सरकार इन सिफारिशों को स्वीकार करेगी और उन पर गंभीरता से अमल करेगी? मेरा मानना है कि यदि हम उन दो व्यक्तियों की प्राथमिकताओं पर नजर डालें, तो जो इस सरकार में सबसे अधिक प्रभाव रखते हैं-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह-तो इसका उत्तर संभवतः ‘न’ होगा।

मुझे प्रधानमंत्री तीन प्रमुख महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित लगते हैं। पहली महत्वाकांक्षा है किसी भी कीमत पर और जितना संभव हो सके, सत्ता में बने रहना। वे स्वयं उस 75 वर्ष की आयु सीमा को पार कर चुके हैं, जिसे उन्होंने कभी अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भेजने के लिए एक मानदंड के रूप में स्थापित किया था। इसके बावजूद, उम्र बढ़ने और ऊर्जा में स्वाभाविक कमी आने के बाद भी, सत्ता छोड़ने के कोई संकेत दिखाई नहीं देते। वे लगातार चौथी बार लोकसभा चुनाव जीतने की आकांक्षा रखते हैं, जिससे वे जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ सकें।

दूसरी महत्वाकांक्षा अपने व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द बने महिमामंडन को और अधिक मजबूत करना है। पेट्रोल पंपों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, ट्रेनों और केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले अनेक सार्वजनिक स्थलों पर उनकी तस्वीरों की व्यापक मौजूदगी इसका उदाहरण है।

तीसरी महत्वाकांक्षा एक हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना है, चाहे वह व्यावहारिक रूप में हो या संवैधानिक रूप में। वर्ष 2014 में उन्होंने ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया था, लेकिन मेरा मानना है कि बाद में वे उस आदर्श से दूर हो गए। अब वे खुद को हिंदू समाज के नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में उनकी केंद्रीय भूमिका और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर चलाए गए व्यापक प्रचार अभियान इसके उदाहरण हैं।

नरेंद्र मोदी की इन तीन महत्वाकांक्षाओं में से अमित शाह दो को पूरी तरह साझा करते हैं-पहली, राजनीतिक शक्ति का विस्तार और दूसरी, हिंदू बहुसंख्यकवादी विचारधारा को आगे बढ़ाना। चुनावी रणनीति और प्रबंधन में उनकी बढ़ती सक्रियता तथा शासन-प्रशासन में उनका बढ़ता प्रभाव यह संकेत देता है कि वे अब स्वयं को केवल मोदी के विश्वस्त सहयोगी के रूप में नहीं, बल्कि उनके संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में भी देखते हैं। मोदी की तरह अमित शाह भी हिंदू राष्ट्र के पक्षधर हैं। वह मुसलमानों की आलोचना करते हैं और ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो उनके संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप नहीं मानी जाती। दोनों नेताओं ने अपनी राजनीतिक शक्ति को बनाए रखने और उसका विस्तार करने के लिए चार उपाय अपनाए हैं। पहला, हिंदू वोट बैंक का निर्माण करना है। हिंदुओं के बीच यह आशंका पैदा की गई है कि वह मुस्लिम अल्पसंख्यकों की वजह से खतरे में पड़ सकते हैं। दूसरा, नकद सहायता योजना शुरू करके महिलाओं, किसानों और अन्य वर्गों को नियमित आर्थिक सहायता देना है। भले ही यह राशि बहुत बड़ी न हो, लेकिन इससे लोगों में यह भावना बनती है कि सरकार उन्हें कुछ न कुछ लाभ तो दे ही रही है। तीसरे उपाय में चुनाव आयोग और प्रवर्तन निदेशालय जैसी संस्थाओं का उपयोग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया गया है। चौथा,  चुनिंदा उद्योगपतियों कोे रियायतें और सरकारी अनुबंध दिए हैं। बदले में वह भाजपा को मोटा फंड देते हैं।

अमेरिका के एक पूर्व व्यापार प्रतिनिधि ने अपने संस्मरण में लिखा कि भारत को पंद्रह बड़े उद्योगपति चलाते हैं। बाद में उनके एक भारतीय मित्र ने उन्हें सुधारा और कहा कि वास्तव में प्रभावशाली लोग केवल सात ही हैं। संख्या चाहे कुछ भी हो, मेरा कहना यह है कि भारत में पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों को ही मिलता है।

जून, 2013 में कांग्रेस केंद्र के साथ-साथ 14 राज्यों में सत्ता में थी, जबकि भाजपा केवल चार राज्यों में। तेरह वर्ष बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। भाजपा लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीत चुकी है और अब 22 राज्यों में सत्ता में है, जबकि कांग्रेस केवल पांच राज्यों तक सिमट गई है। यह असाधारण बदलाव आंशिक रूप से कांग्रेस के कमजोर नेतृत्व का परिणाम है, लेकिन उससे कहीं अधिक भाजपा की उस राजनीतिक रणनीति का, जिसे मोदी और शाह ने विकसित किया। मोदी-शाह की शक्ति के इस केंद्रीकरण को प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश और तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ के विस्तार ने भी मदद पहुंचाई है। कई समाचार एंकर सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष पर हमलावर रहते हैं और सरकार को जवाबदेह ठहराने का काम नहीं करते।

फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर रही है। यदि खाड़ी क्षेत्र का युद्ध लंबा खिंचता है और तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो अर्थव्यवस्था में और भी गंभीर गिरावट हो सकती है। ऐसे समय में अर्थशास्त्रियों द्वारा सुझाए गए सुधार न केवल प्रासंगिक बल्कि अत्यंत आवश्यक प्रतीत होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार उन्हें लागू करने की इच्छा रखती है?
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